सोमवार, 30 अगस्त 2010

पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?



पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?
भूल गयी मै तबसे हंसना
आँख रोज भर आती है
सच कहती हूँ पापा,एकदम
पंजीरी अब नहीं भाती है
मिल न पाऊ,मै अब तुमसे
हो कितने हम मजबूर गए
पापा क्यूँ तुम मुझसे दूर गए?
क्या याद नहीं आती मेरी
क्यूँ भूल गए अपनी लाडो को
देख नहीं सकते थे जिसको,गुमसुम
उसको रोता कैसे छोड़ गए
पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?
कोई नहीं सुनता मेरी ज़िद
जैसे पापा तुम सुनते थे
मेरी रहो के कांटे भी
तुम पलको से चुनते थे
क्यूँ छोड़ अकेला मुझे दिया
क्यूँ तोड़ के हर दस्तूर गए
पापा तुम मुझसे क्यूँ दूर गए?
कितनी सुन्दर दिखती थी माँ
बड़ा सा टीका एक लगाती थी
भर हाथ पहने थी चूड़ियाँ
तुम को वो कितना भाती थी
माँ की टूटी सभी चूड़ियाँ
ले माँ का क्यूँ सिंदूर गए
पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता ....

कल की खबर थी की सुप्रीम कोर्ट  में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया की उनको उत्तर प्रदेश में हो रहे स्मारकों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं है| खबर सुन कर थोड़ी देर सोचों में पड़ गयी,और फिर समझ आया की भाई उन्हें आपत्ति हो भी तो क्यूँ कर हो|

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता की मायावती जी नॉएडा को या लखनऊ के  हरे भरे बागों को पत्थर के हाथियों से पाट दें, अथवा अपनी और अन्य   महापुरुषों की मूर्तियों से सजा कर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दे| जी हाँ उन्हें फर्क भी पड़े तो क्यूँ पड़े,वे तो आकर रहने वाले है नहीं वहां|  उनके लिए तो नयी दिल्ली के विशिष्ट स्थान घने पेड़ों की छाँव में आरक्षित है| उन्हें फर्क पड़ता है तो बस इस बात से कि,कहीं मायावती जी रूठ गयी तो अगले चुनावो में  मुश्किलें बढ़ जाएँगी...

फर्क पड़ता है तो हम जैसे आम लोगों को पड़ता है| जिनकी मेहनत कि कमाई टैक्स के रूप में लेकर ये पत्थर के मसीहा  खड़े किये जा रहे है| फर्क पड़ता है तो हमे पड़ता है जिनके बच्चों के घूमने और खेलने कि जगह छिन  कर ये पथरीले लोग बैठा दिए गए है|

अब भी कल कि सी बात लगती है,जब दुल्हन बन  नॉएडा आई थी......यहाँ कि हरियाली, खुला सा माहौल, बड़े बड़े उद्यान,पक्षी विहार और प्रदुषण से मुक्त हवा....यूँ लगा जैसे सपना जी रही हूँ| हाँ ये ठीक है कि सुविधाए थोड़ी कम थी लेकिन, वो इतना नहीं खलती थी| सुबह कि स्वच्छ हवा,साँझ  की ताज़ी पवन , किल्लोल करते रंग बिरंगे पंछी....मोर उड़ कर घर की मुंडेरों पर बैठ जाते थे|

जब बच्चे हुए तो उन्हें लेके अक्सर हम नंदन कानन, चले जाते थे वहां बने शेर ,चीतों के आकार देख कर बच्चे खूब खुश होते थे| इतने सुंदर और बड़े उद्यान में घूमते, खेलते वक़्त कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था|सुंदर फूलों की छठा अदभुद  अहसास जगाती थी|कभी कभी हम कालिंदी कुञ्ज भी जाया करते थे|कल कल करती यमुना और खुबसूरत नज़ारे|अब सब यादों में ही रह गया लगता है|
अब तो जैसे ही सेक्टर -१५ के करीब आईये ,शक सा होने लगता है की आप नॉएडा में है या जयपुर की सैर पर निकले है| लाल पत्थरों  की चारदीवारी में घिरा नंदन कानन अपने खंडित रूप पर लज्जित सा चुपचाप सर झुकाए दिख जाता है| बड़ी बड़ी मूर्तियाँ आवरण ओढ़े  खड़ी दिखती है| हालाँकि शिल्प कला का अदभुद दर्शन है ये स्मारक |

पत्थर के अनगिनित खम्भों पर अशोक की लाट के शेरों  की तरह हाथी दिखते है| बच्चो ने पूछा तो कह दिया बेटा ये बहन जी की लाट है| अब और कहूँ भी तो क्या कहूँ? 
इस जगह से निकलते हुए नाक पर रुमाल रख लेती हूँ ......अरे नहीं बदबू नहीं है...ये तो वो धूल है जो पत्थरो की कटाई और इमारती सामान से उठ रही है| आस पास के पेड़ भी अपनी आन सी खो रहे है| और इसके ठीक पीछे जो पक्षी विहार है,वह भी इसके दुश्प्रवाभव्  से अछूता नहीं है| हर सर्दी में हजारों विदेशी पंछी मीलों की यात्रा पूरी  करके यहाँ आया करते थे,और उस समय यहाँ की छठा ही निराली होती थी| तरह तरह के पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था|देशी विदेशी पंछियों की चहचाहट से पक्षी विहार गूंजता रहता था| घंटो बीत जाते थे पर मन नहीं भरता था| अक्सर हमलोग वहां घूमने जाया करते थे|
लेकिन इस सब धूल-धक्कड़ ,प्रदूषण के चलते वर्ष दर वर्ष उनकी संख्या भी घटी ही जा रही है| कितनी मधुर यादे है,अब भी कभी जाते है तो वहां का सूनापन  अजीब सी उदासी भर जाती है मन में|पर्यावरण विद लाख शोर मचाये,इस नक्कार खाने में उनकी आवाज किसको सुनाई दे रही है|  
  
अब इस दर्द को कोई और कैसे समझ सकता है.....ये तो हमारा दर्द है जिसे हम चुपचाप सह रहे है| केंद्र हो या राज्य सरकार, कोई भी कैसे इन भावनाओ को समझ पायेगे...क्यूंकि ये भाव तो किसी अपने की टूटन को बेबस हो के देखते रहने की मज़बूरी वाले है, और सरकारे कभी मजबूर नहीं हुआ करती.....   

शनिवार, 14 अगस्त 2010

जाने क्यूँ बारिश की बूंदे

जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे
जैसे ही बादल घिरते है
पागल सी हो जाती हूँ
निकल पड़ती हूँ,जाने क्यूँ
सारे काम धाम भूल समेटने
आंगन में गिरती बूंदों को
और खो जाती हूँ रिमझिम फुहारों में
एक नशा सा तारी रहता है
भूल जाती हूँ सब कुछ
अच्छा-बुरा,सही-गलत,
झूम उठती हूँ,बौरा जाती हूँ..
जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे
सब कहते है अब क्या बच्ची हो?
उन्हें कैसे समझाउं,दिल का बचपना
जो कभी गया ही नहीं,या जाने नहीं दिया
आज भी वो अल्हड,नटखट लड़की
जीती है,दिल के किसी कोने में
जो भीगना चाहती है,तब तक
जब तक बादल का दामन खाली न हो जाये
छप-छप करना चाहती है,जमा हुए पानी में
कागज़ की नाव भी तैराना चाहती है
भरना चाहती है अपनी अंजुरी में आसमान
आँखों से पी लेना चाहती हूँ
जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे..

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सावन तुम्हारी नक़ल करता है..

घनघोर घटा,सुरमई उजाला
धीमा सा माहोल,हलकी सी खुमारी
मौसम की रग़ रग़ में नशा है..
वैसे ही जैसे तुम अपनी मीठी मुस्कान
खामोश प्यार,और बेताब निगाहों से
भर देते हो मेरी रग़ रग़ में नशा
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर की
सावन तुम्हारी नक़ल करता है..
हलकी फुहारे जब भिगोती है तन
तपन हर लेती है तन और मन की
तेरी हर अदा मिलाती है सावन से
तू भी तो भिगोता है मुझे धीमे धीमे
अपने प्यार की बरखा में हर बार
और मै खोयी रहती हूँ बेहोश.....
सच कहो ना,ऐसा क्यूँ लगता है
जैसे तुम बादल बन के छाये हो मुझ पर
और मै प्यासी धरा तुम को पी रही हूँ
तुम में ही खो कर खुद को जी रही हूँ
जब से मिले हो रिमझिम फुहार
बन तेरा प्यार हर पल मुझे भिगोता है...
पल भर को भी हो दूर तू गर
सिसक सिसक मेरा दिल रोता है..
तेरी ठंडी हथेलियों की छुवन महसूस करती हूँ
जाऊ कहीं भी तेरी छाँव में ही चलती हूँ
जैसे सावन इस धरा का रूप खिलाता है
तू भी तो मुझको प्यार से यूँही सजाता है
अब कह दो एक बार दिल पे रख के हाथ
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर कि
सावन तुम्हारी नक़ल करता है.

मेरी कविताये

मेरी कविताये मात्र कविता ही नहीं है,
आइना है मेरी उन भावनाओ का,
जो अब तक सारे जहाँ की आँखों से दूर
मेरे मन की अँधेरी कन्द्राओ में छुपी हुयी..
वो कामनाये जो हौले से मुझे छू जाती है.
छूना गर चाहू तो बन तितली उड़ जाती हैं....
वो भावनाए, कामनाये ढल के शब्दों में
इक नदिया सी बह जाती हैं...
लाख भरु मुट्ठी में बूंदों सी बह जाती है..
देख अजनबी अनजाना छुईमुई सी मुरझाती हैं..
मेरी कविताये मात्र कविता ही नहीं है.........
ये तो वो धरोहर है,अहसासों की
जो अब तक है अनजानी,अनकही
अनसुनी,कुछ सुलझी,कुछ उलझी,
कुछ अल्हड़,कुछ शर्मीली,
कुछ खुली हुयी,कुछ छुपी हुयी
कुछ डरी हुयी, कुछ विद्रोही,
कुछ अलसाई, कुछ सोई सी...
अपने आप में खोई सी..
ले रूप कवित का आई हैं
सब से मिलने खुल कर खिलने..
स्वीकार ये मै करती हूँ फिरसे
हर शब्द लिखा है दिल से क्यूंकि....
मेरी कविताये मात्र कविताये नहीं है....

वो खोयी सी बचपन की गलियां...






बालों में चांदनी सी छिटकने लगी है



उम्र की फसल हौले से पकने लगी है
पर दिल अब भी भटकता है
मुड मुड़ के देखता है पीछे
वो खोयी सी बचपन की गलियां...

अभी भी वो गुडिया है मुझ को बुलाती
जिसकी शादी करनी थी बाकी..
वो हाथी,वो घोडे,वो सारे बाराती
वो प्यारा सा भालू था ढोल वाला
वो छोटा सा बंदर था बाजा बजाता
यादों में अब भी सभी घूमते है
कानो में धीरे से पूछते है..

डूबी हो अपनी दुनिया में ऐसे
हमको भुलाया,तो बोलो कैसे
तुम से ही तो थी हस्ती हमारी..
तुम जो गयी उजड़ी बस्ती हमारी

कोठरी में है गठरी गठरी में है हम
किसी को हमारी जरुरत नहीं है
तुम लौट एक बार आओ, और देखो
मनो धूल की परते हम पर जमी है..

मै चुपचाप अपने को बहला रही हूँ
अपने खिलोनो को सहला रही हूँ
तुम ही तो मेरे साथी थे पहले
तुम संग ही मेरे दिन थे रुपहले
तुम संग ही रोई हंसी भी थी तुम संग
तुम भी बस रंग गए थे मेरे रंग

मेरी गुडिया मुझ को बुला रही है
पर बालों की सफेदी डरा रही है
हंसते है बच्चे मेरे बचपने पर
उनकी हंसी मन ही मन रुला रही है..
काश वो बचपन फिर लौट आये
एक बार आकर फिर से न जाए
काश............................

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ.........

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..
वो जो छोटा सा वक्त बीतेगा नितांत एकाकी,
उस विरह की टीस,मन का खालीपन, बैचैनी
सब संभाल सहेज कर रखूंगी तुम्हे दिखने को
नयनो से जो गिरेंगे अश्रु,माला में गूँथ लूँगी
जब आओगे जयमाल सा पहना दूंगी
प्रति क्षण याद करुँगी तुम्हारी हंसी
और उस हंसी की गूंज में व्यर्थ हो जायेगा,
ये जो विरह है तिरोहित हो जायेगा..
तुम्हारी सुगंध जो बस चुकी है मुझ में
उसी में खोके तुम को पाऊँगी
आज तुम जाओ, पर जल्दी आना
बहुत अधिक प्रतीक्षा नहीं कर पाऊँगी..
अब जाओ नहीं तो......
मन कहीं फिर न पिघलने लगे
और बन जाऊं बेडी तुम्हारे पांवों की
आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

mai aur tum

तू ही मेरी बात आज 
मान क्यूँ नहीं जाता?
जाने क्यूँ तेरी हर बात 
मै चुप हो के सुनती हूँ?
तू सोचने लगता है कि, 
चुप है तो सहमत है, लेकिन
मेरे दिल में उमड़ते,उठते
प्रतिरोध को समझ नहीं पाता है
क्यूँ चाहता है तेरी हर बात 
बिन कहे ही मेरी बात बन जाये
जबकि मेरे जज्बात कभी 
तू समझ भी नहीं पता
माहिर है बहुत तू दुनियादारी में
पर दिल को मेरे तो कभी तू पढ़ नहीं पाता
हर बार मेरी हार तेरी जीत होती है
तू जीत कर भी जश्न क्यूँ मुझसे ही है चाहता
जो ख्वाब तेरे है वो तेरी आँखों में है
पर क्यूँ तू मेरी हकीकत भी देख नहीं पाता
मै जोड़ती हूँ हर रिश्ता मोहब्बत की डोर से
तू हर बार इसी कमजोरी का फायदा है उठाता
ये नहीं कहती की संगदिल है तू,फिर भी
मेरी हालत क्यूँ कभी जान नहीं पाता.. ...
कहीं ऐसा तो नहीं जानना ही नहीं चाहता!!!!!!!!!!!

मै थी,हूँ,और हमेशा रहूंगी…

जब लगने लगे कि कोई साथ नहीं


पलट के देखना एक बार…..

साथ तुम्हारे मै थी,हूँ,और हमेशा रहूंगी…



रोक ले जब आंधियां रास्ता तुम्हारा,

छूटने लगे कही दूर किनारा..दिखे न कोई सहारा….

बस बढाना हाथ एक बार…

साथ तुम्हारे मै थी,हूँ और हमेशा रहूंगी..



सोचो को अपनी दे दो विराम…

छोड़ के सारी परेशानियां करो विश्राम…

नयन मूंद देखो स्वप्न अभिराम….

क्यूंकि समेटने को तुम्हारी तकलीफे तमाम

वही, कही पास तुम्हारे…

मै थी,हूँ और हमेशा रहूंगी…..

बुधवार, 4 अगस्त 2010

ओ मेरे प्रिय !

प्रिय तुम हो आधार मेरा
बांसुरी सी खोखली हूँ..
फूंख तेरी प्राण मेरा...
निष्प्राण तुम बिन मै पड़ी हूँ
तुम अचल हो गिरी उतंग
अत्यंत ऊँचे तुम खड़े हो..
मै धरा की धूल हूँ प्रिय
चरणों में पड़ी लोटती हूँ...
अग्नि का है तेज तुम में
सूर्य सम प्रिय तुम प्रखर हो
हिमाद्री की शीतल लहर मै
शीत निंद्रा में घुली हूँ..
जलधि सम गाम्भीर्य तुम में
ओज की प्रतिमूर्ति तुम हो
मै चपल चंचल सरित सी
सतत इत- उत डोलती हूँ
तुम पवन का प्रवाह हो प्रिय
संजीवनी हो तुम ह्रदय की
मै निरंतर तुम में समाहित
अस्तित्व अपना खोजती हूँ..
प्रिय तुम हो आधार मेरा
बांसुरी सी खोखली हूँ..
फूंख तेरी प्राण मेरा...
निष्प्राण तुम बिन मै पड़ी हूँ....

मन -मौसम

मौसम……….

सोच रही हूँ कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल
सुबह सुबह की बारिश में भीगते
तन के साथ मन भी भीगा
भीगे जज्बात ,ख्याल
भीगे सपने,और जाने क्यूँ
बिन कारण भीग गयी आँखे
बरखा ने धो डाला हर अवसाद
तन के साथ साथ मन की तपन भी
भीगा मेरा मौन,भीगा एकांत
बहार की भांति ही भीतर खिल उठा
मन का उपवन,भंवर डोले डार डार
सपनो की तितलियों ने किया फिर से श्रृंगार
जाने कैसे हो गए इतने परिवर्तन
बहुत सोचा,फिर भी न जान पाई
जाने कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल...