बुधवार, 4 अगस्त 2010

मन -मौसम

मौसम……….

सोच रही हूँ कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल
सुबह सुबह की बारिश में भीगते
तन के साथ मन भी भीगा
भीगे जज्बात ,ख्याल
भीगे सपने,और जाने क्यूँ
बिन कारण भीग गयी आँखे
बरखा ने धो डाला हर अवसाद
तन के साथ साथ मन की तपन भी
भीगा मेरा मौन,भीगा एकांत
बहार की भांति ही भीतर खिल उठा
मन का उपवन,भंवर डोले डार डार
सपनो की तितलियों ने किया फिर से श्रृंगार
जाने कैसे हो गए इतने परिवर्तन
बहुत सोचा,फिर भी न जान पाई
जाने कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल...

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