मंगलवार, 10 अगस्त 2010

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ.........

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..
वो जो छोटा सा वक्त बीतेगा नितांत एकाकी,
उस विरह की टीस,मन का खालीपन, बैचैनी
सब संभाल सहेज कर रखूंगी तुम्हे दिखने को
नयनो से जो गिरेंगे अश्रु,माला में गूँथ लूँगी
जब आओगे जयमाल सा पहना दूंगी
प्रति क्षण याद करुँगी तुम्हारी हंसी
और उस हंसी की गूंज में व्यर्थ हो जायेगा,
ये जो विरह है तिरोहित हो जायेगा..
तुम्हारी सुगंध जो बस चुकी है मुझ में
उसी में खोके तुम को पाऊँगी
आज तुम जाओ, पर जल्दी आना
बहुत अधिक प्रतीक्षा नहीं कर पाऊँगी..
अब जाओ नहीं तो......
मन कहीं फिर न पिघलने लगे
और बन जाऊं बेडी तुम्हारे पांवों की
आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें