मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ज्वालामुखी..........

जब कभी लगने लगता है

बस अब सब ठीक है

शांति है चारो ओर

ना कोई कोलाहल

ना कोई बैचैनी

ना कोई शोर,

तभी अचानक

जाने कैसे फट पड़ता है

कोई सुप्त ज्वालामुखी

और बहा ले जाता है

हर ख़ुशी,हर हंसी

अपने उबलते लावे से

झुलसा देता है,सब

कलियाँ कुम्हला जाती है

पंछी भूल जाते है उड़ना

रन-बिरंगी तितलियाँ भी

फिर कहाँ नज़र आती है

आज फिर सब ओर शांति है

ना कोई कोलाहल,ना कोई शोर

खिली है कलियाँ,तितलियाँ भी है

पंछी उड़ रहे है डाल डाल

लगता है फिर कहीं दूर

धरती की कोख में

अंगडाईयां ले रहा है

खौल रहा है कोई,ज्वालामुखी..........

सोमवार, 27 सितंबर 2010

कल बदल तो नहीं जाओगे??

तुम सदेव रहोगे पास,
दे कर ये विश्वास,सच कहो,
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?
मेरे ह्रदय की वीणा के तार
...करते है मधुर पुकार

प्रेम की मीठी गुंजार
पायल की झंकार
सब तुम से है प्रियतम
सच कहो आज इक बार
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?
संदेह का ये बादल
बन नाग डसे हर पल
जाने क्या होगा कल
क्यूँ जीवन में है हलचल
सच कहो आज इक बार
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?

रविवार, 26 सितंबर 2010

चुपके से ...........

धूप का इक उजला सा टुकड़ा 
आंगन में उतरा चुपके से 
आँख का आंसू मोती बनके 
गालो पर ढलका चुपके से 
फूलों की खुशबु ले हवा चली,  
चली मगर बिलकुल चुपके से 
भवरो ने भी रस की गागर  
छलकायी लेकिन चुपके से 
मन का पंछी दूर गगन में 
उड़ता फिरता,पर चुपके से
मेरे नैना तुझको तकते,
बने चकोर मगर चुपके से
तेरी यादे रहती संग में
हरदम करती तंग चुपके से
राते तारे गिन-गिन काटी   
चाँद जला संग में चुपके से
बादल के संग आँखे रोई
सावन भी रोया चुपके से 
हमने तेरी हर बात कही
रातो में तकिये को चुपके से
तू क्या रातों को सोता है?
जाग रही हूँ मै चुपके से
नींद अगर आएगी मुझको 
तुम तब ख्वाबो में आना,सुनो मगर आना चुपके से....

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

विरह वेला……………


स्वप्न सजे जिन आँखों में,तुम कैसे उनको मून्दोगी
प्रिय जब मै समीप न हूँ,सच कहना क्या तुम रो दोगी?
मोती जो ढलके गालों पर,उनका तुम हार बना लेना
जब वापस लौट के आऊं,जयमाल सा मुझे पहना देना
तेरी सारी पीड़ा को मै,ह्रदय में अपने छुपा लूँगा
अधरों पर तेरे बरबस ही मुस्कान के फूल खिला दूंगा..
तुम विरह को समझो तप अपना मै वरदानों सा आऊंगा
आंचल में तेरे दुनिया भर की खुशियाँ मै रख जाऊंगा…
बस कुछ दिन और प्रिये तुम को ये विरह की पीड़ा सहनी है
फिर तो जीवन भर जीवन में मधुमास की वेला रहनी है..

ये ही तो प्यार होता है…




जानते हो तुम जब भी रूठ जाते हो
उस वक़्त मेरा क्या हाल होता है
साँस चलती है पर,जीते जी मर जाती हूँ
पर सच कहो क्या तुम को करार होता है.
दम सा घुटता है, हर पल बेक़रार रहती हूँ
तुमको भी तो अज़ब सा खुमार होता है
सारी कोशिशे होती है तुम्हे मानाने की
तुम को भी तो इसका ही इंतजार होता है
रात को जो नींद मेरी उड़ाती है तो
सपनो पे तुम्हारे भी तो वार होता है
मौन की कैद में गर मै छटपटाती हूँ
मूक उस वक़्त तुम्हारा भी तो संसार होता है
तेरी हलकी सी हंसी से मै खिल उठती हूँ
मेरे मुस्कुराने का तुम्हे भी तो इंतजार होता है
जब जानते हो सब तो रुठते क्यूँ हो?????
लोग कहते है की ये ही तो प्यार होता है…

सोमवार, 20 सितंबर 2010

जिंदगी मान लिया तुझको ऐ यारा हमने ....


बेसबब नही तेरे साथ वक़्त गुज़ारा हमने
लम्हा लम्हा अपना ऐसे भी सँवारा हमने


माना की बेवफा है तू फिर भी जाने क्यूँ
जिंदगी मान लिया तुझको ऐ यारा हमने 


दोस्त बनके वफादार हो जाये ये मुमकिन है...
यही सोच कर तुझे फिर से पुकारा हमने 


प्यार के नाम पर दुनिया करती है सौदा...
इसलिए दोस्ती के रिश्ते को संवारा हमने 


तू हमेशा सोचता है बस  खुद की ही तरह 
सोचने को तेरे एक नया अंदाज़ उभारा हमने 


जानते है कि हम नहीं मिलेंगे कभी फिर भी 
 क्यूँ किया वस्ल का सौ बार इशारा हमने 


दिल ही तो है आखिर, कर बैठा  नादानी 
बड़ी मुश्किल से  इसे, मुश्किलों से उबारा हमने 


आइने में भी दिखता है हमे अक्स तेरा अब तो... 
मुद्दतों  से कहाँ खुद को निहारा हमने....
.

वृक्ष तुम ऐसे क्यूँ हो?

वृक्ष तुम ऐसे क्यूँ हो? बोलो ना,

जैसे समाधिस्त कोई जोगी

झूमता भक्ति के रस में

या फिर कोई भोगी

लहकता रहता मद में



अपनी ही धुन में रहते हो

कोई सींचे तुम्हे प्यार से

तुम निस्पृह खड़े रहते हो

मार के पत्थर कोई राह में

तोड़ डाले फल तुम्हारे

उसको भी कहाँ कुछ कहते हो



काट डाले शाखे तुम्हारी

छिन्न -भिन्न कर दे

ख़ाल तुम्हारी नोच ले

तुम को जख्म दे

चुप चाप सहे जाते हो

कोई विरोध,जरा सा भी क्रोध

क्यूँ नहीं आता तुम्हे

बेपरवाह खड़े रहते हो



काट दे गर तन को तुम्हारे

फिर से क्यूँ उग आते हो

देने को इन नाशुक्रो को

फिर से फल, औषधि,छाया

जाने क्या है तुम्हारे दिल में

अब तक समझ न आया

क्यूँ इतना परोपकार करते रहते हो



सुनो वृक्ष ये जग बड़ा स्वार्थी

नहीं समझेगा तुम्हारा प्रेम

तुम्हारी भावना,व्रत और नेम

सुनो थोड़े से स्वार्थी हो जाओ

वरना ये सब मिल कर

अस्तित्व तुम्हारा मिटा देंगे

भूल जायेंगे तुम्हारे उपकार

तुम्हे जड़ से ही मिटा देंगे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

दूब

सुनो मै दूब हूँ,हरी भरी
धरती की गोद में,सुरक्षित
तुम रोज़ मुझे रोंदते हो
अस्तित्व मेरा मिटाने
 को जाने कितनी बार
जड़ मेरी खोदते हो
पर मै फिर उग आती हूँ
तुम क्यूँ नहीं समझते
पेड़ों  को काटना आसान
दूब को मिटाना नामुमकिन
तुम जितना मिटाओगे
मै फिर से  उग आउंगी
नयी आभा,नया रूप लिए
सहने को तुम्हारी नफरत
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित
अभिमान नहीं मुझ में तनिक भी
सब के सामने झुक जाती हूँ
पर अपने मन की व्यथा
कहाँ किसी को बताती हूँ
चुप रहना, सब कुछ सहना
नियति मेरी, स्वाभाव मेरा
लेकिन फिर भी सुनो नादाँ
सह नहीं पाओगे अभाव मेरा
मै तपस्विनी, तप मेरा जीवन
परोपकार से ही खुश रहती हूँ
जितना चाहे काटो छांटो मुझको
कुछ कहाँ किसी को कहती हूँ
पर सुनो जितना भी काटोगे
उतनी तेजी से उग आउंगी
तुम लाख करो जतन मिटाने का
छोड़ कभी ना जाउंगी
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित
धरती मेरी माँ जैसी
हर सुख दुःख की साथी है
सब रोंद गए और छोड़ दिया
पर माँ क्या छोड़ के जाती है?
तन से मन से हम जुड़े हुए
तुम कैसे मुझे मिटाओगे
प्रयत्न तुम्हारे सब निष्फल
हर और मुझे ही पाओगे
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित.......

सोमवार, 13 सितंबर 2010

मेरी कविता...जीवन मेरा




कवितायेँ मेरी जीवन मेरा,
कविताओ में ही जीती हूँ
शब्द पहनती,ओढ़ती हूँ
भावो को खाती पीती हूँ

सुख, दुःख की संगी साथी
कविताये मेरी सब कुछ है 
ये जीवन की गति मेरी
आधार न मेरा अब कुछ है  

मेरे आंसू,मेरी आहे
मुस्काने,मेरी चाहे
सब कविताओ में ढलते है 
सब खट्टे मीठे पल मेरे  
कविताओ में ही पलते है

जब टीस कोई तडपाती है
एक कविता बन जाती है
आंसू के मोती चुन चुन के 
सुन्दर माला गूँथ जाती है

खुशियों के फूल जो खिलते है
कविताओ में ही चुनती हूँ
जो भी जी में आजाये बस
कविताओ में ही बुनती हूँ

मेरे सुन्दर कोमल सपने
बेलोस यहाँ पर बढ़ते है
मेरे सारे अनघड अरमां
परवान यहीं पर चढ़ते है

ढूंढे कोई मुझ को गर
कविताओ में ही मिलती हूँ
अपनी हर बिखरी याद को
कविताओ में ही सिलती हूँ

कविता मेरी धड़कन जैसी
रुक जाएँ, मै रुक जाउंगी
कविता मेरा अंतिम ठौर 
अब और कहाँ मै जाउंगी






सोमवार, 6 सितंबर 2010

दिल के शहर में आज………

दिल के शहर में आज


बरसी नयनो की बदरी

सूखा ख़तम हो गया

सब धुला धुला साफ़ साफ़

सब का किया धरा दिल से माफ़

काट छाँट रही हूँ,खरपतवार

चुन चुन के फ़ेंक रही हूँ सारे

गिले, शिकवे, शिकायतें

और तोड़ दी नफरतों की दिवार

अब हसरतों ने नयी शक्ल इख़्तियार की है

सपनों की नयी फसल हमने तैयार की है

एक नया आफताब टांग लिया

थोडा सा साफ़ आसमान मांग लिया

उजाले फिर से फैल गए

अब फूल खिलेंगे…….क्यूंकि,

दिल के शहर में आज

बरसी नयनो की बदरी

सूखा ख़तम हो गया

तुम बिन ………

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन


एकाकी,अधूरी सी,मुरझाई सी,श्रापग्रस्त

अप्सरा सी जो अपना बनवास काट रही है..

तुमको सोचती तुमको महसूस करती हुयी

तनहा स्याह रातों के अकेलेपन से लडती

अपनी नियति को कोसती,किसी तरह

अपना समय बिताती हूँ,दिन तो कट जाता है

पर रात से डर जाती हूँ ,स्वप्न में देखती हूँ प्रिय तुम को

कल्पनो में तुम को लाती हूँ,तुम पास लगते हो

कभी समझ के तकिये को तुम,शर्मा जाती हूँ

तो कभी झगड़ने लगती हूँ इस कदर की मत पूछो

सारे गिले शिकवे उसे सुनती हूँ,और कभी

समझ के तुम्हारा चौड़ा सीना,उसमे सिमट जाती हूँ

पर जब टूटता है स्वप्न,नयन भर जाते है

कुछ अटक सा जाता है,साँस भी रुकने लगती है

दिल की धड़कन बहुत जोर से बजती है

तनहाइयाँ बन के नाग मुझ को डसती है और मै,

फिर से खो जाती हूँ विरह की गहरी कन्दरा में क्यूंकि,

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन ………

सूरज ……

एक दिन रोक के रास्ता सूरज का,धीमे से

मैंने कहा,एक बात कहूँ बुरा तो न मानोगे

क्यूँ नहीं थोडा बैठ लेते इस बरगद कि छाँव

थोड़ी ही दूर पे है मेरा भी गाँव,रुको

कुछ देर बतिया लो बहुत चलते हो

थक गए होगे,न हो तो थोडा सुस्ता लो

सूरज हंसा और बोला,तुम्हारा शुक्रिया

पर रुक नहीं पाउँगा,मैने फिर से पूछा,

सूरज क्या थकता नहीं कभी तू

कभी नहीं चाहता तेरा मन कि,

आज घर बैठूं थोडा सुस्ता लूँ

चलो आज छुट्टी मै भी मना लूँ??

कभी तो थकता होगा तू भी

अपनी इस अनवरत यात्रा से

कभी तो तेरे घोड़े भी देखते होंगे

आशा भरी दृष्टि से तेरी ओर…

थोडा सा रुकने सुस्ताने को मन नहीं करता क्या?

सुन क्या तेरे घरवाले कभी नहीं चाहते

के तू उनके साथ बिताये पल चार

कोई बात कहे मीठी सी,बच्चो को करे प्यार

सुन के सूरज मुस्काया और बोला

मन कि छोडो,उसकी तो अपार है माया

उसकी लगा सुनाने तो कुछ नहीं हो पायेगा

इतने सालो से जो चल रहा है,मेरा तप टूट जायेगा.

अगर मै रुक गया तो धरती भी रुक जाएगी

रुक जायेंगे ये रात दिन,मौसम,ऋतुये

तब तुम सब कहाँ ठोर पाओगे

अपने लिए नहीं सदैव तुम्हारे लिए चलता हूँ

सर्दी हो या गर्मी बस परोपकार के लिए ही जलता हूँ

सूरज हूँ मै, चलना और जलना यही मेरी नियति है

हम सब को जो चलाती है,सबकी माँ प्रकृति है

अपनी मा के नियम नहीं तोड़ सकता

कुछ भी हो चलना नहीं छोड़ सकता……

रविवार, 5 सितंबर 2010

तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………


तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ


जानती हूँ ये सुनते ही रूठ जाओगे

नज़र चुरा के मुह फेर लोगे चुपचाप

भीतर ही भीतर कहीं टूट जाओगे

सुनो,जानते क्यूँ नहीं मिलना चाहती?

मेरी इस जिद का कारण भी तुम ही हो

तुम से मिलूंगी तो खुद को रोक नहीं पाऊँगी

और दुनियादारी की रिवायते भी तो तोड़ नहीं पाऊँगी

लाख छुपाऊ अपनी बेकरारी, दुनिया वालों से

इन मुई आँखों को कैसे समझाउंगी

दिल की धड़कन अगर छुपा भी लूँ

इन आँखों को कहाँ छुपाउंगी

और तुम भी तो बेकरारी का दरिया हो क्या रोक पाओगे

अपने बेलोस जज़बातों की बाड़ को आने से

जानती हूँ अच्छे से की रोक नहीं पाओगे

खुद को भी रुसवा करोगे,और मुझ को भी बदनाम करके जाओगे

इसीलिए फिर से कहती हूँ मिलने की जिद न करो

तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………

मेरा महबूब ..

इश्क करने का दम भरते है वो जोर शोर से
पर महबूब की इक नज़र भी सह नहीं पाते…


राहे इश्क आसाँ नही समझाया था कई बार
पर इश्क की गलियों से दूर वो रह नहीं पाते

शमा की मानिंद जले उनकी याद में शब भर
अब जाने क्यूँ हाल-ऐ -दिल उनसे कह नहीं पाते.


उनके बिना जीना है नामुमकिन मेरे दोस्त
ये जानते है फिर भी उनसे कह नहीं पाते…
राहे वफ़ा पे चल तो पड़े है शौक से
पर छोटी सी भी ठोकर वो सह नहीं पाते..
रुसवाइयों को इश्क का इनाम जानिए
दीवानगी हमारी ये लोग सह नहीं पाते…
दिल दर्द से भरा है पर आँखे नहीं गीली,
उन्हें देखने की चाह में अश्क  भी बह नहीं पाते.
वो सामने आजाये तो उठती नहीं नज़रे
गर दूर हो तो बिन 
उनके हम  रह नहीं पाते….

.

जाने किस मोड़ पर खडी है मौत……


 अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल,

जाने किस मोड़ पर खडी है मौत…… 

दस्तक सी देती रहती है हर वक्त दरवाजे पर,
पलकों के गिरने उठने की जुम्बिश भी सिहरा देती है….
धड़कने बजती है कानो में हथगोलों की तरह,
हलकी आहटें भी थर्राती है जिगर ……
लेकिन जिन्दगी है की रुकने का नाम ही नहीं लेती,
दहशतों के बाज़ार में करते है सांसो का सौदा….
टूटती है, पर बिखरती नहीं हर ठोकर पे संभलती है,
पर कब तक ??? कहाँ तक???????
क्यूंकि अब घर से निकलना हो गया मुश्किल 
जाने कौन से मोड़ पे खडी है मौत……..
डर से जकड़ी है हवा,दूर तक गूंजते है सन्नाटे…
खुदा के हाथ से छीन कर मौत का कारोबार, 
खुद ही खुदा बन बैठे है लोग….
मुखोटों के तिल्लिस्म में असली नकली कौन पहचाने
अपने बेगानों की पहचान में ख़त्म हो रही है जिन्दगी …
अब लोग दूजों की ख़ुशी में ही मुस्कुरा लेते है,
घर जले जो किसी का तो,दिवाली मना लेते है….
खून से दूजों के खेल लेते है होली,
ओढ़ा कर नया कफन किसी को वो ईद मना लेते है……..
क्यूंकि घर से निकलना हो गया है मुशकिल 
जाने कौन से मोड़ पर खड़ी  है मौत…..


बुधवार, 1 सितंबर 2010

ये बूढा ........

कोमल कली,सुंदर फूल
सोंधी माटी,महकती धूल
मनहर वसंत,शीतल बयार
कोयल की कूक, अपनों का प्यार
सब पास था कि अचानक.........

धमाको कीजैसे घटा घिर गयी,
जीवन से खुशियाँ क्यूँ फिर गयी,
नया सिंदूर, श्रृंगार क्यूँ रूठ गया
माओ की गोदी उजड़ गयी.......

नीरवता अब चीत्कार रही
रोते सियार,गंधाता रक्त
दो शीर्षों की लोलुपता में
लुटा चमन, हुआ सब ध्वस्त...

दो नाली चलती वहां दनदन
माँ की छाती यहाँ छलनी,
तोपों के गोले वहां गिरे,
लुट गयी यहाँ नवेली घरनी....

अब पूछो उन हत्यारों को
देश के कर्णधारों को
कौन माँ कहके बुलाएगा?
कौन राखी का मोल चुकायेगा,
उजड़ी मांगे ये सवाल करे,
उन्हें फिर से कौन सजायेगा...

गीध खड़े चौराहों पर
शाखों पर उल्लू बोल रहे,
इन स्वार्थ के पुतलों की
सच्चाई हम पर खोल रहे...

छै फुट का था लम्बा चौडा
क्या खूब था सजता वर्दी में,
दुलहन ले कर वो आया था
अभी तो पिछली सर्दी में..

छाती पर घाव है गोली के
सो गया भूल हर एक धंधा,
बेटे की अर्थी बूढा कन्धा
दो देशों का गोरख धंधा
आँखे फूटी रो रो करके
भटके दर दर बूढा अँधा

माँ की उजड़ी गोदी पूछे,
मेरा लाल कहाँ से आएगा
दुल्हन की आँखे खाली है
स्वप्न कौन दिखलायेगा
बहनों की राखी रोती है,
भाई अब नहीं आएगा
पिता का एक सवाल खडा
मुखाग्नि देगा कौन मुझे
क्यालावारिस ही मर जायेगा???????????