सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

वैचारिकी: यादों के ऊँचे बबूल.....

वैचारिकी: यादों के ऊँचे बबूल.....: "यादों के ऊँचे बबूल उग आये है दिल की पथरीली जमीन पर साया ढूंडती हसरते,तड़पते जज़्बात,चुनते है ख़ार अब दिन रात जिक्रे मोहब्बत जो कभी होता है ..."

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