शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

पगली सांझ......

कोहरे के घुघट में छिप कर
सांझ सलोनी कहाँ चली
किस से छुपती फिरती है
जाना तुझको कौन गली

चाँद पिया से मिलना तेरा
बहुत कठिन है अलबेली
उसको कब तेरी परवाह है
उसकी तो रात सहेली


डूबा रहता हरदम उसमे
ओढ़े  तारों की चादर
तू नादान फिरे क्यूँ इत-उत
हो कर यूँ पगली,कातर

प्रेम तेरा कोई समझ न पाए
तू मीरा सी दीवानी
दर दर फिरती मारी मारी
ना अपनी न बेगानी.....



गुरुवार, 10 नवंबर 2011

कभी कभी जाने क्यूँ......

कभी कभी जाने क्यूँ
एक अजीब सी ख़ामोशी
फैल जाती है चारों ओर
सारा आलम यूँ लगता है,
जैसे सर्दियों की अलसुबह
कोहरे की चादर में लिपटा
उबासियाँ लेता सुस्त सबेरा.....
मन ही मन चलती है
सवालों की आँधी सी
लेकिन एक शब्द भी 
आकार नहीं ले पाता
कहना चाहती हूँ,बहुत कुछ
लेकिन,जाने क्यूँ आवाज़ 
कहीं ठहर सी जाती है.....
सन्नाटों के शोर में दबके
रह जाती है हर बात औ'
सांस घुटने लगती है
बैचैनी जीने नहीं देती,
लगता है की हर ओर बस 
एक उदास मंजर फैला है
जैसे सर्दियों की भीगी
शामें दम तोड़ती है.. खो जाती हैं
कोहरे की घनी चादर में...... 








बुधवार, 7 सितंबर 2011

कल्पनाये...............

पंख कहाँ से मिलते हैं
कल्पनाये कैसे उड़ती है
अक्सर सोचती हूँ बैठे-बैठे
जाने क्यूँ इनकी उड़ाने
इतनी बेलोस होती हैं

जाने कितने इन्द्रधनुष
पार ये कर जाती है
कितने ही पर्वतों को
कदमो पे ले आती हैं
बड़ी बेखोफ़ होती हैं

हजारों रूप धरती  हैं
कई नक़्शे बदलती है
कोई भी रोक ना पाए
कहाँ कब किसकी सुनती हैं
बड़ी मुहज़ोर होती हैं....

कभी बादल पे जा बैठें
कभी तैरें हवाओं में 
संभाले ये ना संभले
उड़ जाये फिजाओं में
बड़ी बेफिक्र होती है..

समंदर की गहराई 
या फलक की ऊँचाई
कहीं कुछ नहीं मुश्किल
जहाँ जी चाहे ये जाये
किसी के हाथ ना आये
बड़ी मदहोश होती हैं............



--
ASHA

रविवार, 4 सितंबर 2011

जब तुम पास नहीं होते.....


सुनो,जब तुम पास नहीं होते
तब भी मेरे साथ ही होते हो

जैसे असमान के आगोश में
चाँद हमेशा कायम है,फिर
चाहे रोज़ दिखे न दिखे.....

हर वक़्त महसूस करती हूँ

जबअँधेरे घेरने लगते हैं,
सन्नाटे डराने लगते हैं
सूनापन डसता है नाग बनके
उसी वक्त याद तुम्हारी
तुम्हे पास मेरे ले आती है
और जगमगा जाता है
तेरे नूर से मेरा वजूद...


जब तुम पास नहीं होते
मेरी अमावस होती है,औ'
जब भी होती है अमावस
रात की गाढ़ी स्याही फैलती है
सारे आलम को आगोश में ले
अँधेरे के चाबुक चलाती है,
अपना साया भी तब पास
नहीं होता,बेगाना माहौल
जी कितना घबराता है,क्यूंकि
अमावस में चाँद नहीं दिखता

चाँद चाहे गुम हो अंधेरों में
तब भी उसका वजूद होता है...
चांदनी चाहे ना बिखेर पाए
तब भी वो वहीँ,मौजूद होता है....
ठीक उसी तरह जैसे तुम
पास हो या ना हो,शामिल होते हो,
मेरी हर साँस में बनके ख़ुश्बू
नस नस में बहता है लहू के संग
अहसास तुम्हारी मौजूदगी का
और फिर वो बेबस तन्हाई
अपना सा मुँह लेके रह जाती है...........................तन्हा,अकेली..


शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मेरा हर दिन.....

नित नए संकल्प लिए
उगता है मेरा हर दिन
और ह्रदय में उमड़ते
नित नए बवंडर
विचारों की बरसात में
भीगती,खयाली पुलाव
पकाती,खुद ही मुस्कुराती
जाने कितने स्वप्न बुनती हूँ
कुछ खुशियों के महकते फूल,
थोड़े आंसू,थोड़े गम के कांटे
सारा दिन पलकों से चुनती हूँ
भागती फिरती हूँ,अनजानी सी 
अनकही बाते जाने कैसे सुनती हूँ
लोग कहते है,तुम पगली हो
मान लेती हूँ चुपसे,औ 
इस तरह पल-पल सरकता है
मन मेरा रेत सा दरकता है
अनबुझ पहेली सी मैं दिखती हूँ
बीत जाती है मेरी हर साँझ
यूँ ही आहिस्ता -आहिस्ता
फिरसे कल दिन उगेगा मेरा
लिए नए सकल्प,नए बवंडर........

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मौन....

अभिव्यक्त कर देना स्वयं को 
कब इतना सरल हुआ है....
फिर इतना रुचिकर भी तो नहीं है
ये विषय....इसलिए 
मौन ही श्रेयकर साधन है
स्वयं की अभिव्यक्ति का
तुमसे स्नेह करने वाले 
मौन को पढ़ लेंगे खुद ही
और बाकि बिना कोई अपवाद
चुपचाप आगे निकल जायेंगे....

--
ASHA

बुधवार, 31 अगस्त 2011

तन्हा.... चांदनी

ईद का चाँद रोशन है,
आसमान की गोद में 
वो मुस्कुरा रहा है
चमका के सितारे और
मेरी पलकें नम है,होंठों 
पे हंसी सज़ा रखी है
सब है यहाँ पास मेरे लेकिन,
मेरी चांदनी तन्हा है,
बहुत दूर मेरे आँचल से 
औ' ईद का चाँद रोशन है........


अभी बढ़ेगी चमक उसकी
और फिर मेरा घर ही नहीं
पूरी दुनिया रोशन होगी
मेरी छोटी सी किरण बढ़ेगी
औ' चाँद बनके चमकेगी पर, 
अभी वक़्त बहुत है बाकि
तब तलक दूर कहीं
मेरी चांदनी है तन्हा
बहुत दूर मेरे आँचल से 
और ईद का चाँद रोशन है.........

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विभूति....

       विभूति....

आज तुम अट्ठारह की हो जाओगी
एक नया दौर है जीवन का ये भी
अब नए अधिकार, और कर्तव्य 
नया आकाश उड़ने को पाओगी


तुम बढ़ी हो,बदला है समय,
और साथ ही बढ़ी है ये माँ भी,
तुम्हारे साथ साथ बढ़ता रहा है 
मातृत्व मेरा,परिपक्व हुआ है...

तुम्हारे जनमते ही,जन्मी थी 
एक स्त्री से माँ बनी थी
जैसे पर्वतों से गिरता झरना 
नदी बन जाता है,गहरा जाता है....

नन्ही परी सी तुम आई 
और मै बदल गयी थी
जैसे सूरज की पहली किरण
पड़ते ही रात बदल जाती है दिन में.....

समय का भान ही कहाँ हुआ
कल की बात लगती है
जब तुम ठुमकती रहती थी
आँगन में चहकती थी,

पकड़ उंगली मेरी चलती थी
या इशारों पर मुझको चलाती थी...
कितने सवाल होते थे तुम्हारे
और उन सवालों से मैं 
कितना हैरान हो जाती थी..

सवाल आज भी है पर अब 
जवाब तुम स्वयं ढूंढ़ लेती हो
हैरान आज भी होती हूँ मैं
जब तुम मेरे सवालो को भी हल कर देती हो...

युवा होती तुम्हारी पीढ़ी से डरती हूँ....
बहुत तेज रफ़्तार है,तुम्हारी
आज भी तुम्हे रखना चाहती हूँ
बाँध कर आँचल में अपने
पर नयी मंजिल है अब तुम्हारी....

एक नयी दिशा मिली है तुम्हे
उसी राह पर बढ़ती जाओ, 
स्वप्न जो भी हो तुम्हारे पूरे हों,
एक नया विस्तार पाओ..........

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

गांधी और अन्ना ......


मैंने पढ़ा किताबो में बस
गाँधी ने स्वतंत्रता दिलाई थी
एक अहिंसा के हथियार से 
अंग्रेजों की नींद उड़ाई थी

इक चादर,इक लाठी ले बापू
जब जिस ओर निकलते थे
गांधी टोपी पहने लाखों
उनके संग संग चलते थे 

गाँधी के पीछे सर्वस्व छोड़ 
जन-सैलाब उमड़ता था
तब सोचा करती थी पहरों 
कैसे उनमे इतना जोश 
उमड़ता था.........

कैसे त्याग सभी वैभव,सुख
तन-मन को अर्पण करते थे
कैसे बापू की इक बोली पर
सब उनके पीछे चलते थे

घर,परिवार से पहले देश है 
कैसे ये भाव ह्रदय समाता था
हर आपद को हंस कर सहना 
कैसे इतना संयम आता था 
 
क्या गाँधी थे कोई जादूगर
सम्मोहन कोई करते थे
कैसे सारे लोग उनकी ओर
यूँ सम्मोहित से तकते थे

आज मिले उत्तर सारे,कैसे 
अलख अनोखा जागा था 
कैसे इक बापू से डर कर 
फिरंगी देश से भागा था 

फिर गाँधी जन्मा भारत में
नाम है अन्ना हजारे..
धर्म,जाति,मज़हब के बंधन
तोड़ के संग आये सारे

तब अनशन और सत्याग्रह से
फिरंगी को देश से भगाया था
बच्चा बच्चा बन गाँधी
तब सड़को पर आया था.

आज तोड़नी है फिर बेडी
हमको भ्रष्टाचार की 
अन्ना की आंधी से हिल गयी
चूले भ्रष्ट सरकार की 

मै भी अन्ना ये नारा 
जन जनने दोहराया है
एक परिवर्तन की आंधी बन 
अन्ना दिल्ली में आया है..................

बूढ़ी काया में जाने कैसे
इतना जोश समाया है
अन्ना के हठ से डर कर
हाकिम कदमो पे आया है

सदा वेश, सरल सी काया
अदभुद मुख पर तेज है 
अन्ना का संकल्प अनोखा
हम सबसे पहले देश है

जन लोकपाल बने कानून
यही एक जिद ठानी है
भ्रष्टाचार के दुश्शासन से
देश की लाज बचानी है

सोमवार, 15 अगस्त 2011

अब क्या होगा आगे..........


एक अदना सा अन्ना
चाहे बंद हो भ्रष्टाचार
एक हूँक जनता ने मारी
डोल गयी सरकार,
जगाई अलख अनोखी
निडर भीड़,निशस्त्र खड़ी
हाकिम बांचे क़ानूनी पोथी
नया सा नियम बनाया
साथ जो चले चार जन
पकड़ के उन्हें मंगाया
जेल सारे भर जाये
पर संकल्प यही है मन में
हम भ्रष्टाचार मिटाए
बड़ी अब भीड़ है भारी
सादा वेश,सरल सी भाषा
द्रढ़ संकल्प धारी
ज्यूँ बापू फिर से आया
अनशन का हथियार अनोखा
जनता को फिर से थमाया
धीमा सा स्वर मन भाए
वो चल पड़े जिस राह अकेले
जन सैलाब उमड़ता जाये
उड़ी है नींदे हाकिम की
अन्ना तेरा शांति व्रत
इनको कभी ना भाया
दिन आज़ादी के हाकिम ने
सब को यूँ धमकाया
करो मत हल्ला-गुल्ला
कुछ ना होगा भूखे रह कर
मिलेगा हथकड़ी का छल्ला
ठूँसा जेल में सबको
जनता को ठगना यूँ फिरसे
भरी पड़ेगा अबतो
के जागी जनता सारी
लगता है हुयी फिरसे
आपातकाल की तैयारी......

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

आज मै हूँ बौराई....


पड़े बहुत से पोथीपत्रे ,
पढ़े बहुत से लेख...
सच की करते बाते सारे,
बस सच का ही उपदेश...
चहरे पे शीतलताई,
नयन में क्यूँ चतुराई 
मै मूरख समझ ना पायी,
आखिर क्या है सच्चाई.....

मिले बहुत से ज्ञाता गुरु 
मिले महान समाज सुधारक
दिन जनों के दुःख हरता
अनाथ जनों के पालक
मगर है बड़ी कठिनाई
कि बिगड़ी बन ना पायी....

नारी का सम्मान बचाते
लड़ते सब कुप्रथा से
भूर्ण हत्या के विरोध में
नित दिन अनशन करते
भाषण देते घर घर जा कर
बेटी साक्षात् लक्ष्मी मायी,
निज कुल को बस एक कुलदीपक
लक्ष्मी की चाह ना भाई, 

पर नारी है एक खिलौना
निज घरनी सम्मानित
सीता हो या हो पांचाली
सदा हुयी अपमानित
दूजे की बहन भौजाई
कहाँ परवाह है भाई......

शासन हो सब रीती निति संग
यदि हम विपक्ष में बैठें...
सत्ता सुख पाते ही यारो 
नोटों के तकिये पे लेटे..
नशा ये गज़ब है भाई..
सारी दुनिया बौराई....

आँख मूंद बैठा है हाकिम
डाकू बन बैठे रखवाले
सच्चों का है जीना दूभर
दुश्मन को रखा संभाले
वो खाता दूध मलाई
अज़ब ये खेल है भाई......

भांति-भांति के करतब जग में
गजब के कलाकार सब भाई
मुह में राम बगल में छुरी
कितनी सुन्दरता से छुपायी...
ये दुनिया की चतुराई 
कुछ भी समझ ना आई....

आज मै हूँ बौराई,मेरी बुद्धि चकराई
अज़ब तमाशा करे ये दुनिया,
बेबस रब की खुदाई,
गांधारी की पट्टी बांधी
कुछ ना दे सुझाई,
तुम्ही बताओ,किस दर जाऊं,
किसकी करूँ दुहाई...

--
ASHA



गुरुवार, 14 जुलाई 2011

बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं...........





बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं
कहीं उगती है,उखाड़ी जाती है
कही और लगायी जाती हैं
अपनी जमीन से जुदा हो के भी 
अपनी उर्वरता कहाँ खोती हैं
बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं
 
दूसरी जमीन को भी अपना लेती हैं
देके अपना सर्वस्व सब को सुख देती हैं
बस चाहती हैं थोडा सा स्नेह 
और कहाँ किसी से कुछ लेती हैं 
बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं

दूजे घर में बस जाती है खुशबु जैसी
अपनी पहचान हंस के खोती हैं 
छोड़ती है जब अपना घर आंगन
हंसते हैं लब,आँख बहुत रोती है
बेटियाँ धान की पौध जैसी होती हैं.........

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

,ना जानू........

संग बरखा के मैं भी बरसी
जाने कब से थी यूँ तरसी
नयन लगाये होड़ मेघ संग
नयनो से क्यूँ बरसा निर्झर,
उमड़ी घटा क्यों सावन की, ना जानू


मन चूर नशे में डोल रहा 
चहुँ ओर फिरूँ बहकी-बहकी 
पवन करे सरगोशी मुझसे 
बिन बात रहूँ लहकी-लहकी 
दीवानापन तारी ये कैसा,ना जानू....

सादी सी,बेरफ्तार जिंदगी
क्यूँकर इतनी तेज़ हुयी?
सुलझी,सीधी सी लट मेरी
काहे  लोहे की ज़ंजीर हुयी
इनमे उलझी कितनी बाते,ना जानू...

सावन बरसे रिम-झिम आँगन
मन मदहोश, शीतल हर धड़कन
पवन चले धीमे से छूकर तन 
महका कैसे सारा मौसम,ना जानू...

भीगी रुत में भीगे नैना
दिन गीले से,सीली रैना
क्यूँ ना मन ये पाए चैना
बना पपीहा किसे पुकारे,ना जानू.......

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

अक्सर सोचती हूँ......

जब भी बरसे आब,आसमां से टप-टपा-टप
मन मेरा क्यूँ भीग जाता है,अचानक
मिट्टी से उठती हुयी सोंधी महक
क्यूँ मेरी साँसों को महकाती है बरबस

भीगती डालों से टपकता,थिरकता पानी 
क्यूँ  मेरी अल्को में ठहर सा जाता है
पत्तियों का धुला सा सब्ज़ आँचल
क्यूँ मेरी पलकों पे लहक सा जाता है

भीगते पंछी जब झटकते हैं अपनी पाँखे
टूटती मोती की लड़ियाँ क्यूँ देखती है आँखे
काले बादल ओढ़ कर आये जो परी आसमानी
झट से कैसे धरती ओढ़े चुनर धानी...

जादू अज़ब,बाते गज़ब,है कौन जो करता है सब
सोचती रहती हूँ पहरों अकेली,कोई तो सुलझाओ ये पहेली 
झड़ी सवालों की भी ज्यूँ बारिश की बूंदे
भीगती हूँ इनमे अक्सर नयन मूंदे 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

ये बादल......

बहुत दिनों बाद बरसा ये बादल
बड़ा ही ढीठ है मनमर्जी करता है
लाख मनाया कितनी अर्जी दी
पर किसी के कहे ये कुछ करता है....

अपनी धुन में उडाता फिरता है
आवारगी में अपनी खुश रहता है
बिगड़े तो दुनिया उजाड़ कर रख दे
वरना कब किसी से कुछ कहता है

सावन में रिमझिम झूम के बरसे
भादो में खाली झीलें भरता है
धरती की प्यास बुझे एक पल में
यूँही जी भर के जब बरसता है

मनमोजी है ये जोगी की तरह
कभी यहाँ तो वहां डेरा 
बांध सकता है कौन इसको कहीं
शाम दिल्ली की तो अवध का सवेरा




सोमवार, 30 मई 2011

जिंदगानी की कहानी कहो कैसे सुनाऊ???



जिंदगानी की कहानी
कहो कैसे सुनाऊ?
रंग रूप इसका कैसे बताऊ?
कई रंग इसके,कई ढंग इसके
कहो किस तरह से तुम को दिखाऊं….
कभी रेल सी पटरी पे भागी जाती,
और बैलगाड़ी सी कभी रुकती
कभी चलती,हिचकोले खाती
मद्धम मद्धम चलती जा रही जिंदगी…
कभी सावन की रिमझिम फुहारों सी मदमस्त,
कभी बसंत की बयार सी शीतल,
तो कभी कभी जेठ के अंधड़ भी है जिंदगी…
नदिया की कलकल,झरनों की छम छम
सागर की कहानी,लहरों की जुबानी
तो कभी कभी बाढ़ का पानी भी है जिंदगी…..
कभी साफ़ असमान,कभी बादल घनेरे
कभी सूरज ,कभी चाँद ,कभी बस अँधेरे
उजाले कभी, कभी धुंध गहरी
कभी सर्द शामे,कभी तपती दुपहरी
अनोखी अदा से ये चल रही है,
पल पल रंग बदल रही है
अभी तक इसे मैंने जाना नहीं है
कहना कभी इसने माना नहीं है
करूं लाख कोशिश ये रूकती नहीं है..
मेरी जिद के आगे भी झुकती नहीं है..
अब तुम ही कहो कैसे इसको मनाऊं,
जिंदगानी की कहानी
कहो कैसे सुनाऊ?

गुरुवार, 26 मई 2011

आओ चुगली चुगली खेलें ....

आओ चुगली चुगली खेलें 
जिसके मुकाबिल आना मुश्किल  
चुगली में उसकी जां लेलें 
आओ चुगली चुगली खेले

मन को भाए,खुस पुस बाते
गुप चुप अँखियाँ मुस्काएं 
सिरा पकड़ ले एक छोटा सा
पूरी रामायण लिख जाए

मन भावन अति लगे बुराई
जब दूजे की हो टांग खिंचाई
मधुरस बरसे चुगली में ऐसा
ज्यूँ मुंह में घुल जाए खताई

निंदा रस का स्वाद निराला
नशा अनोखा चढ़ता
जीभ चलाना शगल सलोना
अब इसमे अपना क्या घटता
क्यूँ वो इतना ऊँचा हमसे
खींचो टांग गिराओ धम्मसे
उसकी कमीज सफ़ेद क्यूँ भाई
आओ ढंग से करे धुलाई

खुद को बदलना मुश्किल भईया
क्यूँ ना दूजे की परत उधेड़े
अज़ब ठण्ड सी पड़े कलेजे
जब बातों में उसे थपेड़े

आओ मिलकर बैठे यारो
दिल के जख्मो को सेले
आओ चुगली चुगली खेले
आओ चुगली चुगली खेलें








शुक्रवार, 20 मई 2011

माँ ...

जब कभी भी घेरते है अँधेरे हालातों के 
तू सूरज सी नज़र आती है अब भी माँ
उलझनों में अपनी जब भटकती हूँ
तू नयी राह दिखाती हैअब भी माँ 

तपती दोपहर में साए की तरह
छुपाती है आँचल में अब भी माँ 
ऊँची लहरों में किनारे की तरह
पास बुलाती है मुझे अब भी माँ 

मुश्किलों की आँधियों से सदा
तू मुझको बचाती हैअब भी माँ 
खो के धीरज जो घबरा जाऊं 
एक नया जोश दिलाती हैअब भी माँ


रात दिन दूर तुझसे हूँ बेशक 
तेरी दुआओं में हूँ अब भी माँ 
सहला जाती यूँही ख्यालों में 
तेरी ठंडी नर्म हथेली अब भी माँ

जब भी हो जाता उदास ये दिल
बहला जाती है तू अब भी माँ
नींद जब देर तक नहीं आती
याद आती है तेरी थपकी माँ 

जब देखती हूँ अपनी बिटिया को
खयालो में तू ही मुस्कुराती है माँ
इस तरह शामिल है मेरे वजूद में तू  
मुझमें में भी तू ही नज़र आती है माँ ....


बुधवार, 18 मई 2011

उजली सुबह.........

मेरे बेहिसाब सवाल यूँ उड़ गए 
तुम्हारी एक चुप की आंधी में,
ज्यूँ हवा में अक्सर उड़ जाया करते हैं 
सूखे घास के तिनके,कागज़ की चिंन्दियाँ

होंठों से बहती गीतों की नदी
जाने कब से बहना भूल गयी
अब अक्सर बहा करते हैं 
आँखों से  नमकीन झरने

फिर भी बेसाख्ता दिल धड़क ही जाता है
कम्बखत भूलता ही नहीं नाम तेरा
हर वक़्त तेरे ही कलाम गुनगुनाता है
सच है दिल पे किसी का जोर नहीं

ख्वाब अब अक्सर आते है
ज्यूँ रेतीले अंधड़....
उनसे छुपने की खातिर
कब से नहीं सोयी आँखे

फिर भी कहीं दूर से आता
ठंडी पवन का झोंखा
सहला गया जख्मो को
दे गया दिलासा दिल को
मत घबरा रात बस ढलने को है
वो दूर आ रही है एक उजली सुबह.........

बुधवार, 11 मई 2011

तुम को ही चाहूंगी.......

कब कहा फूल ने माली से
बस मुझे ही सींचो,सम्भालो
भूल कर सारे चमन को
बस मुझे ही तुम निहारो

कब कहा पंछी ने डाली से
मुझे ही करने दो बसेरा
तेरी पात-पात पर बस
सदा रहे अधिकार मेरा

कब कहा किरणों ने सूरजसे
उजाले थाम लो,यूँ ना बिखेरो
ओट में बादल की छुप जाओ 
आगोश में हमको भी लेलो

पर्वतो ने कब कहा नदियों से
दूर मुझसे तुम ना जाओ
गोद मेरी मेरी रहो महफूज
ना प्यास दुनिया की बुझाओ

कब कहा पेड़ो ने हवा से
तुम हो बस मेरी ही थाती
लहकती फिरती हो चहुँ ओर
पत्तियों में क्यूँ ना समाती

कब कहा मैंने तुम्हे,
बस मुझको ही चाहो 
भूल जाओ सब को
बस मुझको सराहो

तुम प्रखर सूरज हो
कैसे तुमको छुपाउंगी 
तुम हो झोखा  हवा का
कैसे तुमको बांध पाउंगी

बंधन में कभी तुमको 
रहना नहीं भाया
मगर क्यूँ भूल बैठे
मैं तुम्हारा ही हूँ साया

जहाँ भी तुम चलोगे 
साथ मै भी आउंगी
कोई भी आये तूफान 
साथ तेरा निभाउंगी
तुम मुझे चाहो ना चाहो 
मै सदा तुमको,
बस तुम को ही चाहूंगी.......





शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

चाँद................. रात

एक दिन अचानक चाँद खो गया
रात भौचक खड़ी थी,सन्नाटे ओढ़े
तारों में अज़ब सी खलबली  थी
सोचों में थे सब ये कैसे हो गया

चाँद रात से दिखा के बेरुखी
अमावस की चादर ओढ़ सो गया
अपनी चांदनी के उजाले समेटे
कहीं दूर,जा अंधेरो में खो गया

रात खामोश थी,ओंस के अश्क बहाती
अपनी गीली नज़रों से,देखती रही
चाँद का रूठना,और यूँ छुप जाना 
अपनी बेबसी पर कुछ और गहराती

चाँद को था यकीन, जब निकला था,
रात उस बिन रह न पायेगी
पकड़ कर बांह रोकेगी,हंस कर मनाएगी

इसी अहसास को थामे,वो घर छोड़ आया
रात के मासूम दिल को छन से तोड़ आया
लगाये सौ इलज़ाम,शिकायत लाख की
पर चाँद तुमने रात की कब परवाह की

कोई ना अब आवाज देता कहीं से
अकेला चाँद तन्हाई में रोता है
ढूँढता रहता है अपना वजूद हर पल
रात की याद में दामन भिगोता है

रात अब भी खड़ी है खामोश तारो को जलाये
चाँद की राह में अपनी पलकें बिछाए
लौटना खुद ही होगा चाँद को ये फैसला है
अकेली चल रही है दिल में पूरा हौसला है...



शनिवार, 5 मार्च 2011

सम्भावनाये…


सम्भावनाये तलाशती है राहे,
सफल होने की चाहे…
कीमत कोई भी हो चलेगी
पर सफलता तो मिलेगी…
भागती सड़के पथरीली निगाहे
भीढ़ के बीच पिसती चाहे…
बंद दरवाजों से झांकती
साथ किसी का मांगती
पिंजरे के पंछी की आहे
बेबस बचपन की मासूम निगाहें…
संसार का सूनापन झेलते
अपना बुढापा ठेलते
अकेलेपन का दंश झेलते
जी रहे दो बूढे शरीर
सूनी है उनकी निगाहे
कौन सुनेगा उनकी आहे…
मोहब्बत का नहीं है वक़्त
दौलत की हवस तारी है
जरुरत नहीं महबूब की
बस सिक्कों से यारी है
सूना है दिल, सूनी है बाहे
जाने क्या ढूंढती निगाहे
भटकता बचपन ढूंढता है
सकूं नशे के सीने में,
माँ बाप तलाश रहे
वैभव खून पसीने में
टूटा घर बिखरते रिश्ते
घुटती सांसे,दम तोड़ती आशाये
अंत फिर भी वही
सम्भावनाये तलाशती है राहे,
सफल होने की चाहे…

अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल.............


 अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल,
जाने कौन से मोड़ पर खडी है मौत…… 
दस्तक सी देती रहती है 
हर वक्त दरवाजे पर,
पलकों के गिरने उठने की
जुम्बिश भी सिहरा देती है….
धड़कने बजती है कानो में 
हथगोलों की तरह,
हलकी आहटें भी थर्राती है जिगर ……
लेकिन जिन्दगी है के,
रुकने का नाम ही नहीं लेती,
दहशतों के बाज़ार में
करते है सांसो का सौदा….
टूटती है, पर बिखरती नहीं 
हर ठोकर पे संभलती है,
पर कब तक ??? कहाँ तक???????
क्यूंकि अब घर से निकलना हो गया मुश्किल 
जाने कौन से मोड़ पे खडी है मौत……..

डर से जकड़ी है हवा,
दूर तक गूंजते है सन्नाटे…
खुदा के हाथ से छीन कर
 मौत का कारोबार, 
खुद ही खुदा बन बैठे है लोग….
मुखौटों के तिल्लिस्म में 
असली नकली कौन पहचाने
अपने बेगानों की पहचान में 
ख़त्म हो रही है जिन्दगी …
अब लोग दूजों की 
ख़ुशी में ही मुस्कुरा लेते है,
घर जले जो किसी का तो
,दिवाली मना लेते है….
खून से दूजों के खेल लेते है होली,
ओढ़ा कर नया कफन 
किसी को वो ईद मना लेते है……..
क्यूंकि घर से निकलना हो गया है मुशकिल 
जाने कौन से मोड़ पर खड़ी है मौत…..


शुक्रवार, 4 मार्च 2011

बदलती हवाएं...........

हवाओं ने रुख बदला है संभालो
अँधेरा चारों ओर देखो फ़ैल रहा है
जता दिया हमे बादल ने घुमड़ कर  
मौसम बदल रहा है,दिल डोल रहा है!!!

जागो अब अपनी सुध लो यारो  
पुराने सारे साए धुंधलाने लगे है
जिन ठूंठों के सहारे चढ़ रही थी
लहराती बेलें वो अब चटकने लगे हैं

सन्नाटे आगाज़ हैं नए तूफान के
समंदर भी भीतर भीतर खौल रहा है
गुलिस्तान उजड़ने की देहलीज़ पर है
उड़ गयी कोयले, शाखों पे उल्लू बोल रहा है

मजधार में नावों को डुबो रहा है माज़ी
घर को हमारे देखो कोतवाल लूट रहा है
किस पे करें भरोसा, कोई ये बताये
देखो जिधर हर कोई मुह मोड़ रहा है

दूर परदेश में छुपायी है दौलते
घर में है मुफलिसी ये कौन देख रहा है
हाकिम ही है बेबस जब अपने वतन में
अब कौन होगा रहनुमा दिल ये सोच रहा है...




 

बुधवार, 2 मार्च 2011

मेरी बिटिया....

सूने से आँगन में बैठी
जाने क्या देख रही थी मै
ठहरे पानी की झील में ज्यूँ 
कंकड़  फ़ेंक  रही थी मै

छम से आई एक परी
चमका एक सितारा धीरे से 
मीठी सी बोली में उसने
माँ मुझे पुकारा धीरे से 

उसकी मुस्कानों के मोती
जब बिखरे मेरे जीवन में
चटकी कलियाँ खुशियों की
मेरे मन के उपवन में

अज़ब गज़ब सी एक सिहरन
ठंडक सी पहुची सीने में
हलचल,हड़कंप मचा घर में
रफ़्तार सी आई जीने में

जादू था उसकी पलकों में
मै मन्त्र मुग्ध हो बैठ गयी
वो स्वांस समीर समाहित हो 
ह्रदय में गहरे पैठ गयी

दिन भर उसको तक कर भी
ह्रदय नहीं भरता मेरा
उसकी छवि देख अचंभित
इस जग का चतुर चितेरा

मधुर गीत सी किलकारी
झरनों सी कलकल करती
उसकी सरल मधुर हंसी
जीवन में नव रंग भरती

वो ठुमक ठुमक जब चलती 
रुनझुन सी बजती आंगन में 
उसकी काली काली आँखे
ज्यूँ भंवरे डोले मधुबन में

अब दिन भर उसको तकती हूँ
बस उसकी सुनती रहती हूँ
उसमे खुद को फिर पाया है
अब सपने बुनती रहती हूँ


.

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

आज व्यस्त हूँ.........

सुनो कुछ ना कहना 
आज बहुत व्यस्त हूँ
खो गयी थी जाने कब से 
पुरानी सी कई कहानियाँ
उन्हें ही ढूंढ रही हूँ
कई सारी धरोहरे 
कई सारी अमानते
आज तो ढूंढनी ही है
ठान लिया है मैंने 
और इसी धुन में मस्त हूँ... 

सारा घर छान मारा है
कोना कोना बुहारा है
ढूंढ निकाली है बहुत सारी
यादों की कतरने  
धूल में लिपटे कुछ
अधूरे सपने भी मिले है
रख के उन्हें कोने में 
मै भूल गयी थी !!!

थोड़ी सी शिकायते,शिकवे
लिपटे मिले है एक पुराने  
बक्से में रख के छोड़ दिया था
या कहो,इनसे नाता तोड़ दिया था
थोड़े आंसू भर के रखे थे
उस नीली शीशी में कभी
सोचा था असमान को उधार दे दूंगी
पर भूल गयी और जाने कितने 
सावन यूँ ही रीते बीत गए......

एक रेशमी रुमाल में सहेजी हुयी 
करीने से रखी हंसी भी मिली 
इसे चुपके से बिना बताये किसीको
सहेज संभल कर रखा था,
जाने कब इसकी जरूरत  पड़ जाये!!
आजकल माहौल जरा ख़राब चल रहा है
क्या मौके पे मिली है,चस्पा कर ली है 
अब होंठ बरबस मुस्कुरा रहे है

पुरानी डायरी में रखे मिले है
कुछ सूखे फूल, अब भी महक बाकी है
सारा कमरा  महक उठा है 
रूमानी सा  हो गया है आलम
पुरानी ग़ज़लों की एक किताब
जाने कहाँ रख छोड़ी थी,
चलो आज मिल ही गयी...

सोच रही हूँ फिर से झाड़-पौंछ कर
सँभाल, सहेज कर रख दूँ इन्हें
अनमोल खज़ाना है
कोई देखे इससे पहले समेट दूँ
सारी यादों की बना लूँ अल्बम 
अधूरे सपनो को पूरा करने की
ढूंढ निकलूं कोई तरकीब
आंसू उधार सावन को दे आऊं
शिकवे शिकायते तो फिर से
बंद कर दूंगी,या फ़ेंक ही देती हूँ


सूखे फूलों की पंखुड़ियों का
इत्र बना के रखूंगी
तुम आओगे पास जब भी
धीरे से महकने लगूंगी
गुलाबों की तरह,तुम्हे भी महका दूंगी
पुरानी गज़ले कितनी रूमानी है
याद है तुम-हम हाथों में हाथ लिए
मूंद के आँखे पहरों बिता देते थे
फिर से निकालो थोडा सा वक़्त कभी
सुनेंगे वही ग़ज़ल इक साथ फिरसे..


पर इस वक़्त नहीं ,क्यूंकि 
आज बहुत व्यस्त हूँ
खो गयी थी जाने कब से 
पुरानी सी कई कहानियाँ
उन्हें ही ढूंढ रही हूँ
कई सारी धरोहरे 
कई सारी अमानते
आज तो ढूंढनी ही है
ठान लिया है मैंने 
और इसी धुन में मस्त हूँ... 



शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

मै नारी....

थक गयी हूँ देते हुए अग्निपरीक्षा
त्रेता से कलयुग आगया
राम बदले रावण बदले
परिस्थितियां बदली
बदले मेरे कर्तव्य,अधिकार
समय कि सान पर तेज हो गयी
तीखी रस्मो कि तलवार
पर अगर नहीं बदली कोई
तो वो है मेरी नियति
आज भी मेरी पवित्रता 
क्यूँ मोहताज़ है अग्नि परीक्षा की
क्या कभी परखा है तुमने  
मेरे ह्रदय की निर्मलता को
क्यूँ मेरे संस्कारो की उज्वलता   
नहीं देख पाती आँखे तुम्हारी
मेरे ह्रदय में हरदम लहलहाता 
स्नेह का दरिया,क्यूँ नहीं दिखता
क्या उसकी बुँदे कभी नहीं भिगोती
जब भी कभी संकट आया तुम पर 
सदैव  ढाल बन खड़ी हुयी हूँ
लेकिन जब मेरी बारी आती है 
लेके आवरण रीति रिवाजों का
समाज की मर्यादा की देके दुहाई 
मजबूर किया देने को अग्नि परिक्षा..............

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

जरा बताओ तो !

क्या जानते हो तुम्हारी नर्म
ठण्डी हथेलियों में जादू है
कोई भी मुश्किल,परेशानी
जो बल डाल दे मेरी पेशानी पर
तुम्हारी ठण्डी छुवन से पल में 
गुल हो जाती है,कैसे होता है 
ये जादू जरा बताओ तो !
जब भी रखते हो इन्हें
धीरे से मेरी थकी आँखों पर
हर जलन मिट जाती है
भूल जाती हूँ सारे तनाव
और नींद कितनी चुपके से
मेरी आँखों में भर जाती है
कैसे तुम्हारी हथेलियों की 
ठंडक मेरे नसों में उतरती है
जरा बताओ तो !
सारी दुनिया की परेशानियाँ 
अपने माथे लेने का शौक 
जाने क्यूँ है मुझे?
औ " फिर उन परेशानियों के 
भंवर में घूमती रहती हूँ
खुद भी परेशान,तुम्हे भी सताती हूँ 
औ" फिर जब चलता है
तुम्हारी ठण्डी हथेलियों का जादू 
जाने सारी मुसीबतें
कहाँ मुह छुपा लेती है
सकून उतर आता है रूह में 
जिंदगी  आसन हो जाती है
कैसे होता है ये सब,
सोचती हूँ कभी कभी
तुम्हे पता है क्या?
जरा बताओ तो !





गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

स्वप्न परी...........


बहुत थकी हैं आँखे मेरी
स्वप्न परी तुम आओ,आओ धीरे से
स्वप्न कोई चंचल, मीठा सा
पलको पर रखा जाओ,आओ धीरे से

नयन मूंद बैठी हूँ तुम आओ धीरे से
इक मीठी सी थपकी दे आज सुलाओ
डाल उँगलियाँ उलझी अलकों में
सुलझा, सहला जाओ,आओ धीरे से 

क्लांत ह्रदय की हर एक लहर
तुमको बुला रही है,आओ धीरे से
आज ह्रदय की थकन मिटाओ
मन को बहला जाओ,आओ धीरे से

तुम इतनी सहृदय कैसे हो
मुझको बतलाओ धीरे से
अपनी ठंडी नरम हथेली
आँखों पर रख जाओ,धीरे से...........

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

मैंने तुमसे ये कब कहा...........


मैंने तुमसे ये कब कहा की तुम मुझे




बस मुझ को ही प्यार करो



तोड़ कर सारी रिवायते मुझको चाहो



सारी दुनिया को दरकिनार करो



कभी चाँद भी नहीं माँगा तुमसे



ना तारो की फरमाइश की



मैंने तो सिर्फ चाहा था तुम्हे



तुम्हारी हर खूबी और हर कमी



तुम्हारा गुस्सा,तुम्हारा प्यार



तुम्हारी नफरते,तुम्हारी चाहते



सब को अपना लिया था यूँ



जैसे तुमको अपनाया था




फिर तुम क्यूँ नहीं अपना लेते



मेरी हर खूबी ,हर कमी को



वैसे ही, जैसे मुझे अपना बनाया था कभी.....



.

मै उर्मिला.......

मै उर्मिला, सतत विरहिणी
किस अपराध का हूँ दंड पाती

प्रिय तुम कहते यदि स्नेह से

क्या तुम्हे मै समझ ना पाती

बिन मिले तुम वन गये औ

मै खड़ी थी ले दीप बाती



मदन मेरा शत्रु चिर का

आगया ले वसंत फिर से

पुष्प वन फिरसे खिले है

भवंर का झंकार फिरसे

विरह अग्नि दग्ध ह्रदय

चैन पाए भी तो कैसे



अगणित ऋतू आई गयी

मौन द्वार पर मै खड़ी हूँ

वे कर्मपथ पर चल रहे है

धर्मपथ पर मै खड़ी हूँ

नियति का खेल देखती हूँ

विरह अग्नि में जल रही हूँ



इतिहास भी तो मौन मुझ पर

कब कदर जानी किसी ने

वन तो मै संग जा ना पाई

कब बात मानी किसी ने

सब ठाठ-बाट इस महल के

क्यूँकर मुझे अब रास आयें

प्रिय वहां हो कष्ट में जब

क्यूँकर प्रिया फिर चैन पाए



धर्म अपना तुम निभाओ

मौन तप मै कर रही हूँ

लखन संग है राम के

मै प्रतीक्षारत यहाँ हूँ .......