शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

आज व्यस्त हूँ.........

सुनो कुछ ना कहना 
आज बहुत व्यस्त हूँ
खो गयी थी जाने कब से 
पुरानी सी कई कहानियाँ
उन्हें ही ढूंढ रही हूँ
कई सारी धरोहरे 
कई सारी अमानते
आज तो ढूंढनी ही है
ठान लिया है मैंने 
और इसी धुन में मस्त हूँ... 

सारा घर छान मारा है
कोना कोना बुहारा है
ढूंढ निकाली है बहुत सारी
यादों की कतरने  
धूल में लिपटे कुछ
अधूरे सपने भी मिले है
रख के उन्हें कोने में 
मै भूल गयी थी !!!

थोड़ी सी शिकायते,शिकवे
लिपटे मिले है एक पुराने  
बक्से में रख के छोड़ दिया था
या कहो,इनसे नाता तोड़ दिया था
थोड़े आंसू भर के रखे थे
उस नीली शीशी में कभी
सोचा था असमान को उधार दे दूंगी
पर भूल गयी और जाने कितने 
सावन यूँ ही रीते बीत गए......

एक रेशमी रुमाल में सहेजी हुयी 
करीने से रखी हंसी भी मिली 
इसे चुपके से बिना बताये किसीको
सहेज संभल कर रखा था,
जाने कब इसकी जरूरत  पड़ जाये!!
आजकल माहौल जरा ख़राब चल रहा है
क्या मौके पे मिली है,चस्पा कर ली है 
अब होंठ बरबस मुस्कुरा रहे है

पुरानी डायरी में रखे मिले है
कुछ सूखे फूल, अब भी महक बाकी है
सारा कमरा  महक उठा है 
रूमानी सा  हो गया है आलम
पुरानी ग़ज़लों की एक किताब
जाने कहाँ रख छोड़ी थी,
चलो आज मिल ही गयी...

सोच रही हूँ फिर से झाड़-पौंछ कर
सँभाल, सहेज कर रख दूँ इन्हें
अनमोल खज़ाना है
कोई देखे इससे पहले समेट दूँ
सारी यादों की बना लूँ अल्बम 
अधूरे सपनो को पूरा करने की
ढूंढ निकलूं कोई तरकीब
आंसू उधार सावन को दे आऊं
शिकवे शिकायते तो फिर से
बंद कर दूंगी,या फ़ेंक ही देती हूँ


सूखे फूलों की पंखुड़ियों का
इत्र बना के रखूंगी
तुम आओगे पास जब भी
धीरे से महकने लगूंगी
गुलाबों की तरह,तुम्हे भी महका दूंगी
पुरानी गज़ले कितनी रूमानी है
याद है तुम-हम हाथों में हाथ लिए
मूंद के आँखे पहरों बिता देते थे
फिर से निकालो थोडा सा वक़्त कभी
सुनेंगे वही ग़ज़ल इक साथ फिरसे..


पर इस वक़्त नहीं ,क्यूंकि 
आज बहुत व्यस्त हूँ
खो गयी थी जाने कब से 
पुरानी सी कई कहानियाँ
उन्हें ही ढूंढ रही हूँ
कई सारी धरोहरे 
कई सारी अमानते
आज तो ढूंढनी ही है
ठान लिया है मैंने 
और इसी धुन में मस्त हूँ... 



शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

मै नारी....

थक गयी हूँ देते हुए अग्निपरीक्षा
त्रेता से कलयुग आगया
राम बदले रावण बदले
परिस्थितियां बदली
बदले मेरे कर्तव्य,अधिकार
समय कि सान पर तेज हो गयी
तीखी रस्मो कि तलवार
पर अगर नहीं बदली कोई
तो वो है मेरी नियति
आज भी मेरी पवित्रता 
क्यूँ मोहताज़ है अग्नि परीक्षा की
क्या कभी परखा है तुमने  
मेरे ह्रदय की निर्मलता को
क्यूँ मेरे संस्कारो की उज्वलता   
नहीं देख पाती आँखे तुम्हारी
मेरे ह्रदय में हरदम लहलहाता 
स्नेह का दरिया,क्यूँ नहीं दिखता
क्या उसकी बुँदे कभी नहीं भिगोती
जब भी कभी संकट आया तुम पर 
सदैव  ढाल बन खड़ी हुयी हूँ
लेकिन जब मेरी बारी आती है 
लेके आवरण रीति रिवाजों का
समाज की मर्यादा की देके दुहाई 
मजबूर किया देने को अग्नि परिक्षा..............

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

जरा बताओ तो !

क्या जानते हो तुम्हारी नर्म
ठण्डी हथेलियों में जादू है
कोई भी मुश्किल,परेशानी
जो बल डाल दे मेरी पेशानी पर
तुम्हारी ठण्डी छुवन से पल में 
गुल हो जाती है,कैसे होता है 
ये जादू जरा बताओ तो !
जब भी रखते हो इन्हें
धीरे से मेरी थकी आँखों पर
हर जलन मिट जाती है
भूल जाती हूँ सारे तनाव
और नींद कितनी चुपके से
मेरी आँखों में भर जाती है
कैसे तुम्हारी हथेलियों की 
ठंडक मेरे नसों में उतरती है
जरा बताओ तो !
सारी दुनिया की परेशानियाँ 
अपने माथे लेने का शौक 
जाने क्यूँ है मुझे?
औ " फिर उन परेशानियों के 
भंवर में घूमती रहती हूँ
खुद भी परेशान,तुम्हे भी सताती हूँ 
औ" फिर जब चलता है
तुम्हारी ठण्डी हथेलियों का जादू 
जाने सारी मुसीबतें
कहाँ मुह छुपा लेती है
सकून उतर आता है रूह में 
जिंदगी  आसन हो जाती है
कैसे होता है ये सब,
सोचती हूँ कभी कभी
तुम्हे पता है क्या?
जरा बताओ तो !





गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

स्वप्न परी...........


बहुत थकी हैं आँखे मेरी
स्वप्न परी तुम आओ,आओ धीरे से
स्वप्न कोई चंचल, मीठा सा
पलको पर रखा जाओ,आओ धीरे से

नयन मूंद बैठी हूँ तुम आओ धीरे से
इक मीठी सी थपकी दे आज सुलाओ
डाल उँगलियाँ उलझी अलकों में
सुलझा, सहला जाओ,आओ धीरे से 

क्लांत ह्रदय की हर एक लहर
तुमको बुला रही है,आओ धीरे से
आज ह्रदय की थकन मिटाओ
मन को बहला जाओ,आओ धीरे से

तुम इतनी सहृदय कैसे हो
मुझको बतलाओ धीरे से
अपनी ठंडी नरम हथेली
आँखों पर रख जाओ,धीरे से...........

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

मैंने तुमसे ये कब कहा...........


मैंने तुमसे ये कब कहा की तुम मुझे




बस मुझ को ही प्यार करो



तोड़ कर सारी रिवायते मुझको चाहो



सारी दुनिया को दरकिनार करो



कभी चाँद भी नहीं माँगा तुमसे



ना तारो की फरमाइश की



मैंने तो सिर्फ चाहा था तुम्हे



तुम्हारी हर खूबी और हर कमी



तुम्हारा गुस्सा,तुम्हारा प्यार



तुम्हारी नफरते,तुम्हारी चाहते



सब को अपना लिया था यूँ



जैसे तुमको अपनाया था




फिर तुम क्यूँ नहीं अपना लेते



मेरी हर खूबी ,हर कमी को



वैसे ही, जैसे मुझे अपना बनाया था कभी.....



.

मै उर्मिला.......

मै उर्मिला, सतत विरहिणी
किस अपराध का हूँ दंड पाती

प्रिय तुम कहते यदि स्नेह से

क्या तुम्हे मै समझ ना पाती

बिन मिले तुम वन गये औ

मै खड़ी थी ले दीप बाती



मदन मेरा शत्रु चिर का

आगया ले वसंत फिर से

पुष्प वन फिरसे खिले है

भवंर का झंकार फिरसे

विरह अग्नि दग्ध ह्रदय

चैन पाए भी तो कैसे



अगणित ऋतू आई गयी

मौन द्वार पर मै खड़ी हूँ

वे कर्मपथ पर चल रहे है

धर्मपथ पर मै खड़ी हूँ

नियति का खेल देखती हूँ

विरह अग्नि में जल रही हूँ



इतिहास भी तो मौन मुझ पर

कब कदर जानी किसी ने

वन तो मै संग जा ना पाई

कब बात मानी किसी ने

सब ठाठ-बाट इस महल के

क्यूँकर मुझे अब रास आयें

प्रिय वहां हो कष्ट में जब

क्यूँकर प्रिया फिर चैन पाए



धर्म अपना तुम निभाओ

मौन तप मै कर रही हूँ

लखन संग है राम के

मै प्रतीक्षारत यहाँ हूँ .......