शनिवार, 5 मार्च 2011

सम्भावनाये…


सम्भावनाये तलाशती है राहे,
सफल होने की चाहे…
कीमत कोई भी हो चलेगी
पर सफलता तो मिलेगी…
भागती सड़के पथरीली निगाहे
भीढ़ के बीच पिसती चाहे…
बंद दरवाजों से झांकती
साथ किसी का मांगती
पिंजरे के पंछी की आहे
बेबस बचपन की मासूम निगाहें…
संसार का सूनापन झेलते
अपना बुढापा ठेलते
अकेलेपन का दंश झेलते
जी रहे दो बूढे शरीर
सूनी है उनकी निगाहे
कौन सुनेगा उनकी आहे…
मोहब्बत का नहीं है वक़्त
दौलत की हवस तारी है
जरुरत नहीं महबूब की
बस सिक्कों से यारी है
सूना है दिल, सूनी है बाहे
जाने क्या ढूंढती निगाहे
भटकता बचपन ढूंढता है
सकूं नशे के सीने में,
माँ बाप तलाश रहे
वैभव खून पसीने में
टूटा घर बिखरते रिश्ते
घुटती सांसे,दम तोड़ती आशाये
अंत फिर भी वही
सम्भावनाये तलाशती है राहे,
सफल होने की चाहे…

अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल.............


 अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल,
जाने कौन से मोड़ पर खडी है मौत…… 
दस्तक सी देती रहती है 
हर वक्त दरवाजे पर,
पलकों के गिरने उठने की
जुम्बिश भी सिहरा देती है….
धड़कने बजती है कानो में 
हथगोलों की तरह,
हलकी आहटें भी थर्राती है जिगर ……
लेकिन जिन्दगी है के,
रुकने का नाम ही नहीं लेती,
दहशतों के बाज़ार में
करते है सांसो का सौदा….
टूटती है, पर बिखरती नहीं 
हर ठोकर पे संभलती है,
पर कब तक ??? कहाँ तक???????
क्यूंकि अब घर से निकलना हो गया मुश्किल 
जाने कौन से मोड़ पे खडी है मौत……..

डर से जकड़ी है हवा,
दूर तक गूंजते है सन्नाटे…
खुदा के हाथ से छीन कर
 मौत का कारोबार, 
खुद ही खुदा बन बैठे है लोग….
मुखौटों के तिल्लिस्म में 
असली नकली कौन पहचाने
अपने बेगानों की पहचान में 
ख़त्म हो रही है जिन्दगी …
अब लोग दूजों की 
ख़ुशी में ही मुस्कुरा लेते है,
घर जले जो किसी का तो
,दिवाली मना लेते है….
खून से दूजों के खेल लेते है होली,
ओढ़ा कर नया कफन 
किसी को वो ईद मना लेते है……..
क्यूंकि घर से निकलना हो गया है मुशकिल 
जाने कौन से मोड़ पर खड़ी है मौत…..


शुक्रवार, 4 मार्च 2011

बदलती हवाएं...........

हवाओं ने रुख बदला है संभालो
अँधेरा चारों ओर देखो फ़ैल रहा है
जता दिया हमे बादल ने घुमड़ कर  
मौसम बदल रहा है,दिल डोल रहा है!!!

जागो अब अपनी सुध लो यारो  
पुराने सारे साए धुंधलाने लगे है
जिन ठूंठों के सहारे चढ़ रही थी
लहराती बेलें वो अब चटकने लगे हैं

सन्नाटे आगाज़ हैं नए तूफान के
समंदर भी भीतर भीतर खौल रहा है
गुलिस्तान उजड़ने की देहलीज़ पर है
उड़ गयी कोयले, शाखों पे उल्लू बोल रहा है

मजधार में नावों को डुबो रहा है माज़ी
घर को हमारे देखो कोतवाल लूट रहा है
किस पे करें भरोसा, कोई ये बताये
देखो जिधर हर कोई मुह मोड़ रहा है

दूर परदेश में छुपायी है दौलते
घर में है मुफलिसी ये कौन देख रहा है
हाकिम ही है बेबस जब अपने वतन में
अब कौन होगा रहनुमा दिल ये सोच रहा है...




 

बुधवार, 2 मार्च 2011

मेरी बिटिया....

सूने से आँगन में बैठी
जाने क्या देख रही थी मै
ठहरे पानी की झील में ज्यूँ 
कंकड़  फ़ेंक  रही थी मै

छम से आई एक परी
चमका एक सितारा धीरे से 
मीठी सी बोली में उसने
माँ मुझे पुकारा धीरे से 

उसकी मुस्कानों के मोती
जब बिखरे मेरे जीवन में
चटकी कलियाँ खुशियों की
मेरे मन के उपवन में

अज़ब गज़ब सी एक सिहरन
ठंडक सी पहुची सीने में
हलचल,हड़कंप मचा घर में
रफ़्तार सी आई जीने में

जादू था उसकी पलकों में
मै मन्त्र मुग्ध हो बैठ गयी
वो स्वांस समीर समाहित हो 
ह्रदय में गहरे पैठ गयी

दिन भर उसको तक कर भी
ह्रदय नहीं भरता मेरा
उसकी छवि देख अचंभित
इस जग का चतुर चितेरा

मधुर गीत सी किलकारी
झरनों सी कलकल करती
उसकी सरल मधुर हंसी
जीवन में नव रंग भरती

वो ठुमक ठुमक जब चलती 
रुनझुन सी बजती आंगन में 
उसकी काली काली आँखे
ज्यूँ भंवरे डोले मधुबन में

अब दिन भर उसको तकती हूँ
बस उसकी सुनती रहती हूँ
उसमे खुद को फिर पाया है
अब सपने बुनती रहती हूँ


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