बुधवार, 31 अगस्त 2011

तन्हा.... चांदनी

ईद का चाँद रोशन है,
आसमान की गोद में 
वो मुस्कुरा रहा है
चमका के सितारे और
मेरी पलकें नम है,होंठों 
पे हंसी सज़ा रखी है
सब है यहाँ पास मेरे लेकिन,
मेरी चांदनी तन्हा है,
बहुत दूर मेरे आँचल से 
औ' ईद का चाँद रोशन है........


अभी बढ़ेगी चमक उसकी
और फिर मेरा घर ही नहीं
पूरी दुनिया रोशन होगी
मेरी छोटी सी किरण बढ़ेगी
औ' चाँद बनके चमकेगी पर, 
अभी वक़्त बहुत है बाकि
तब तलक दूर कहीं
मेरी चांदनी है तन्हा
बहुत दूर मेरे आँचल से 
और ईद का चाँद रोशन है.........

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विभूति....

       विभूति....

आज तुम अट्ठारह की हो जाओगी
एक नया दौर है जीवन का ये भी
अब नए अधिकार, और कर्तव्य 
नया आकाश उड़ने को पाओगी


तुम बढ़ी हो,बदला है समय,
और साथ ही बढ़ी है ये माँ भी,
तुम्हारे साथ साथ बढ़ता रहा है 
मातृत्व मेरा,परिपक्व हुआ है...

तुम्हारे जनमते ही,जन्मी थी 
एक स्त्री से माँ बनी थी
जैसे पर्वतों से गिरता झरना 
नदी बन जाता है,गहरा जाता है....

नन्ही परी सी तुम आई 
और मै बदल गयी थी
जैसे सूरज की पहली किरण
पड़ते ही रात बदल जाती है दिन में.....

समय का भान ही कहाँ हुआ
कल की बात लगती है
जब तुम ठुमकती रहती थी
आँगन में चहकती थी,

पकड़ उंगली मेरी चलती थी
या इशारों पर मुझको चलाती थी...
कितने सवाल होते थे तुम्हारे
और उन सवालों से मैं 
कितना हैरान हो जाती थी..

सवाल आज भी है पर अब 
जवाब तुम स्वयं ढूंढ़ लेती हो
हैरान आज भी होती हूँ मैं
जब तुम मेरे सवालो को भी हल कर देती हो...

युवा होती तुम्हारी पीढ़ी से डरती हूँ....
बहुत तेज रफ़्तार है,तुम्हारी
आज भी तुम्हे रखना चाहती हूँ
बाँध कर आँचल में अपने
पर नयी मंजिल है अब तुम्हारी....

एक नयी दिशा मिली है तुम्हे
उसी राह पर बढ़ती जाओ, 
स्वप्न जो भी हो तुम्हारे पूरे हों,
एक नया विस्तार पाओ..........

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

गांधी और अन्ना ......


मैंने पढ़ा किताबो में बस
गाँधी ने स्वतंत्रता दिलाई थी
एक अहिंसा के हथियार से 
अंग्रेजों की नींद उड़ाई थी

इक चादर,इक लाठी ले बापू
जब जिस ओर निकलते थे
गांधी टोपी पहने लाखों
उनके संग संग चलते थे 

गाँधी के पीछे सर्वस्व छोड़ 
जन-सैलाब उमड़ता था
तब सोचा करती थी पहरों 
कैसे उनमे इतना जोश 
उमड़ता था.........

कैसे त्याग सभी वैभव,सुख
तन-मन को अर्पण करते थे
कैसे बापू की इक बोली पर
सब उनके पीछे चलते थे

घर,परिवार से पहले देश है 
कैसे ये भाव ह्रदय समाता था
हर आपद को हंस कर सहना 
कैसे इतना संयम आता था 
 
क्या गाँधी थे कोई जादूगर
सम्मोहन कोई करते थे
कैसे सारे लोग उनकी ओर
यूँ सम्मोहित से तकते थे

आज मिले उत्तर सारे,कैसे 
अलख अनोखा जागा था 
कैसे इक बापू से डर कर 
फिरंगी देश से भागा था 

फिर गाँधी जन्मा भारत में
नाम है अन्ना हजारे..
धर्म,जाति,मज़हब के बंधन
तोड़ के संग आये सारे

तब अनशन और सत्याग्रह से
फिरंगी को देश से भगाया था
बच्चा बच्चा बन गाँधी
तब सड़को पर आया था.

आज तोड़नी है फिर बेडी
हमको भ्रष्टाचार की 
अन्ना की आंधी से हिल गयी
चूले भ्रष्ट सरकार की 

मै भी अन्ना ये नारा 
जन जनने दोहराया है
एक परिवर्तन की आंधी बन 
अन्ना दिल्ली में आया है..................

बूढ़ी काया में जाने कैसे
इतना जोश समाया है
अन्ना के हठ से डर कर
हाकिम कदमो पे आया है

सदा वेश, सरल सी काया
अदभुद मुख पर तेज है 
अन्ना का संकल्प अनोखा
हम सबसे पहले देश है

जन लोकपाल बने कानून
यही एक जिद ठानी है
भ्रष्टाचार के दुश्शासन से
देश की लाज बचानी है

सोमवार, 15 अगस्त 2011

अब क्या होगा आगे..........


एक अदना सा अन्ना
चाहे बंद हो भ्रष्टाचार
एक हूँक जनता ने मारी
डोल गयी सरकार,
जगाई अलख अनोखी
निडर भीड़,निशस्त्र खड़ी
हाकिम बांचे क़ानूनी पोथी
नया सा नियम बनाया
साथ जो चले चार जन
पकड़ के उन्हें मंगाया
जेल सारे भर जाये
पर संकल्प यही है मन में
हम भ्रष्टाचार मिटाए
बड़ी अब भीड़ है भारी
सादा वेश,सरल सी भाषा
द्रढ़ संकल्प धारी
ज्यूँ बापू फिर से आया
अनशन का हथियार अनोखा
जनता को फिर से थमाया
धीमा सा स्वर मन भाए
वो चल पड़े जिस राह अकेले
जन सैलाब उमड़ता जाये
उड़ी है नींदे हाकिम की
अन्ना तेरा शांति व्रत
इनको कभी ना भाया
दिन आज़ादी के हाकिम ने
सब को यूँ धमकाया
करो मत हल्ला-गुल्ला
कुछ ना होगा भूखे रह कर
मिलेगा हथकड़ी का छल्ला
ठूँसा जेल में सबको
जनता को ठगना यूँ फिरसे
भरी पड़ेगा अबतो
के जागी जनता सारी
लगता है हुयी फिरसे
आपातकाल की तैयारी......

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

आज मै हूँ बौराई....


पड़े बहुत से पोथीपत्रे ,
पढ़े बहुत से लेख...
सच की करते बाते सारे,
बस सच का ही उपदेश...
चहरे पे शीतलताई,
नयन में क्यूँ चतुराई 
मै मूरख समझ ना पायी,
आखिर क्या है सच्चाई.....

मिले बहुत से ज्ञाता गुरु 
मिले महान समाज सुधारक
दिन जनों के दुःख हरता
अनाथ जनों के पालक
मगर है बड़ी कठिनाई
कि बिगड़ी बन ना पायी....

नारी का सम्मान बचाते
लड़ते सब कुप्रथा से
भूर्ण हत्या के विरोध में
नित दिन अनशन करते
भाषण देते घर घर जा कर
बेटी साक्षात् लक्ष्मी मायी,
निज कुल को बस एक कुलदीपक
लक्ष्मी की चाह ना भाई, 

पर नारी है एक खिलौना
निज घरनी सम्मानित
सीता हो या हो पांचाली
सदा हुयी अपमानित
दूजे की बहन भौजाई
कहाँ परवाह है भाई......

शासन हो सब रीती निति संग
यदि हम विपक्ष में बैठें...
सत्ता सुख पाते ही यारो 
नोटों के तकिये पे लेटे..
नशा ये गज़ब है भाई..
सारी दुनिया बौराई....

आँख मूंद बैठा है हाकिम
डाकू बन बैठे रखवाले
सच्चों का है जीना दूभर
दुश्मन को रखा संभाले
वो खाता दूध मलाई
अज़ब ये खेल है भाई......

भांति-भांति के करतब जग में
गजब के कलाकार सब भाई
मुह में राम बगल में छुरी
कितनी सुन्दरता से छुपायी...
ये दुनिया की चतुराई 
कुछ भी समझ ना आई....

आज मै हूँ बौराई,मेरी बुद्धि चकराई
अज़ब तमाशा करे ये दुनिया,
बेबस रब की खुदाई,
गांधारी की पट्टी बांधी
कुछ ना दे सुझाई,
तुम्ही बताओ,किस दर जाऊं,
किसकी करूँ दुहाई...

--
ASHA