शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

पगली सांझ......

कोहरे के घुघट में छिप कर
सांझ सलोनी कहाँ चली
किस से छुपती फिरती है
जाना तुझको कौन गली

चाँद पिया से मिलना तेरा
बहुत कठिन है अलबेली
उसको कब तेरी परवाह है
उसकी तो रात सहेली


डूबा रहता हरदम उसमे
ओढ़े  तारों की चादर
तू नादान फिरे क्यूँ इत-उत
हो कर यूँ पगली,कातर

प्रेम तेरा कोई समझ न पाए
तू मीरा सी दीवानी
दर दर फिरती मारी मारी
ना अपनी न बेगानी.....



गुरुवार, 10 नवंबर 2011

कभी कभी जाने क्यूँ......

कभी कभी जाने क्यूँ
एक अजीब सी ख़ामोशी
फैल जाती है चारों ओर
सारा आलम यूँ लगता है,
जैसे सर्दियों की अलसुबह
कोहरे की चादर में लिपटा
उबासियाँ लेता सुस्त सबेरा.....
मन ही मन चलती है
सवालों की आँधी सी
लेकिन एक शब्द भी 
आकार नहीं ले पाता
कहना चाहती हूँ,बहुत कुछ
लेकिन,जाने क्यूँ आवाज़ 
कहीं ठहर सी जाती है.....
सन्नाटों के शोर में दबके
रह जाती है हर बात औ'
सांस घुटने लगती है
बैचैनी जीने नहीं देती,
लगता है की हर ओर बस 
एक उदास मंजर फैला है
जैसे सर्दियों की भीगी
शामें दम तोड़ती है.. खो जाती हैं
कोहरे की घनी चादर में......