बुधवार, 24 अप्रैल 2013

ग्रहण

सम्भवतः आजकल मेरी सोच 
पर भी लग गया है ग्रहण 
अथवा थम  गयी है गति 
ह्रदय के स्पंदन की ....
मस्तिष्क का दिन-रात 
सोचना कहाँ गया ?
जम गयी है संवेदनाये 
तभी तो न कोई विचार
न कोई अभिव्यक्ति न ही 
कोई विरोध दर्ज कर रही हूँ 
जबकि कितना कुछ घट रहा है 
आस-पास ,बिलकुल मेरे सामने 
और मैं मौन हूँ ,
किस तरह हर बात पर 
भड़क उठती थी, कितने 
सवाल मथते थे,कितनी 
उन्मादिनी हो उठती थी 
शब्दों की नदी घुमड़ उठती थी 
किन्तु अब सब शांत है ,और 
मैं  उलझी हूँ इसी उहापोह में 
आखिर हुआ  क्या है ?
ठीक-ठीक पता नहीं चल रहा  
क्या कोई सुलझा पायेगा ये गुत्थी ......(आशा)