बुधवार, 6 अप्रैल 2016

मंज़िल तुम हो

जाने कितने अधूरे ख्वाबों की पोटली
कबसे थामे चलती रही सुभो-शाम ,
कहती भी क्या,और किससे कहती
कौन देता इन्हे नए आयाम।

सो चुप रहना ही श्रेयकर था
लेकिन मन की गहरी कन्दराओं में
गहरे कहीं वो ख्वाब पलते रहे
खुद ही  नए आकारों में ढलते रहे।

कभी कभी बड़ा सताते थे
मन को मथते थे दिमाग झन्नाते थे
खुद ही खुद को देती थी दिलासा
"इट्स  नॉट माय कप ऑफ़ टी"
कह के थपकी देके फिर सुला देती थी।

फिर तुम आई  जिंदगी में मेरी
मैं फिर से मुस्कुराने लगी
सपने जाने क्यों फिर सजाने लगी
खोल के बैठ गयी पोटली अपनी।

झाड़ पोंछ के सारे ख्वाब
करीने से फिर सजाने लगी
मुद्दते बीती सहेजते समेटते
कभी कभी घबराई भी
पर थमने नहीं दिया।

अब कुछ ख्वाब मंज़िल के करीब
नज़र आने लगे हैं मुकम्मिल से
गले में आला लटकाए जो तुम खड़ी
हो , वो मैं ही तो हूँ,हाँ वो मैं ही हूँ...
चहकती खिलखिलाती मुस्कुराती।





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