शुक्रवार, 12 मई 2017

ज़िंदादिली

ज़िंदगी को जिया हर हाल में खुलके
काँटे मिले या फूल कहाँ कोई गिला किया

ख़ुशियाँ मिली के ग़म सोचा नहीं कभी
आब ऐ हयात मान कर हमने ज़हर पिया

जन्नत का ख़्वाब देखना फ़ितरत नहीं मेरी
जो मिल गया उसी को मुक़्क़दर बना लिया

तू साथ चल रहा है तो किस बात की कमी
चलते हुए ख़ारों पे गुलिस्ताँ खिला लिया।(आशा)

मंगलवार, 9 मई 2017

था मेरा

ज़िक्र मेरा था अफ़साना भी मेरा
फिर भी नदारद था फ़साना मेरा

शोहरात का क़िस्सा बड़ा ज़ालिम है
आज जो तेरा है वो कभी था मेरा

जिसकी हसरत में मारे मारे फिरते हो
वो बेवफ़ा कभी हमदर्द था मेरा

छांव में जिसकी तुझको सुकून मिलता है
ग़ौर से देख ज़रा वो दामन है मेरा. ....(आशा)

माँ

नयन दिया सपनो की बाती
थपकी दे ठंडी पवन सुलाती
माँ की एक घुड़की थी काफ़ी
सुबह स्कूल जाना है, सो जाओ
माँ एक बार फिर डाँटो ना....
खींच कर गोदी में ज़बरन
तेल लगा चोटी बाँधो ना
बाल रूखे है फूस जैसे
सब गिर जाएँगे तब समझेगी !
ख़ुद ही लगाती हूँ जब तेल
बालों में अब कभी
बहुत याद आती हो तुम
सच कहा था तुमने माँ
चोटी भी आधी हो गयी
ना रही वो शैतानिया
ना ही अब मैं वो रही
ना तुम हो अब पास मेरे
तेरी गुड़िया की शादी हो गयी
नींद तो अब भी है,आँखों में
ठंडी पवन भी है ज्यूँ की त्युँ
खो गया बचपन वो मेरा
वो बेफ़िक्री भी कहीं खो गयी
समय बदला,मैं भी बदली
देख माँ कितनी बड़ी मैं हो गयी
बिन किसी के कहे चुपचाप
देखो आज ख़ुद ही सो गयी....(आशा)