रविवार, 29 मार्च 2020

नमक तनहाइयों का काट रहा
धीरे धीरे इमारत-ऐ-ज़िंदगी
उम्र की परतें यूँ चढ़ रही है
नए मायने जीने के गढ़ रही हैं......(आशा)

हमसफ़र

आँखों  में इक सुरूर था 
हुआ तो कुछ ज़रूर था 
लहक रही थी वादियाँ 
मौसम भी कुछ मग़रूर था | 
 
धुप थोड़ी ज़र्द थी 
हवा भी थोड़ी सर्द थी 
कंधे  तेरा हाथ था 
नया नया वो साथ था | 

वादियाँ खिली सी थी 
औंस से धुली सी थी 
खोए से थे तुम और मैं 
बस धड़कनो का शोर था|| 

अफ़साने यूँ तो हज़ार थे
सुनने से कब गुरेज़ था 
महक सी थी फ़िज़ाओं में 
दिल इश्क़ से लबरेज़  था 

न वक़्त की थी बंदिशें 
न ज़िन्दगी  मुश्किलें 
न फ़िक्र नून तेल की 
न ज़िक्र किसी और का 

लबों पे बस तेरी बात थी 
तू मेरे,मैं तेरे साथ थी 
जब बने थे हमसफ़र 
ये उन दिनों की बात है....(आशा)