गुरुवार, 7 मई 2020

आज सुबह ……….



आज सुबह नहाते हुए
धो डाले सारे गम,अफ़सोस
नए कपड़ो सा ओढ़ लिया
प्यार,ख़ुशी और अपनापन
आखिर कब तक कोई
मनाये सोग अपनी अधूरी
ख्वाईशों,अधूरे सपनो का
सो छोड़ दिया उन्हें
केंचुली सा उतार दिया
और अब नए कलेवर में
नयी हसरतों का मजमा है
जिंदगी को देखने के लिए
नज़र पे आज नया चश्मा है
हसीन लग रही है……..?
या मान लिया है इसको हसीन…
चलो जो भी हुआ,भूल जाओ
नयी जिंदगी,नयी खुशियों
नयी उमंगों का जश्न मनाओ
जब तक ये बदल न जाये
फिर से अधूरेपन में….
कम से कम तब तक तो
ऐ दिल इनका लुत्फ़ उठाओ..
क्यूंकि आज सुबह नहाते हुए
धो डाले सारे गम,अफ़सोस
नए कपड़ो सा ओढ़ लिया
प्यार,ख़ुशी और अपनापन………

बुधवार, 6 मई 2020

…….मेरा प्यारा तकिया…….



आज सुबह यूँही तकिये को देखा
सलवटे हटाते हुए उसको सहलाया
और सोचा,कितना अपना है ये
मेरे हर सुख -दुःख का मौन सांझी
बिना कोई सवाल जवाब किए
जैसे भी रखती हूँ रहता है
आंसू हो मेरे या हंसी सब
जज्बातों को बाँट लेता है
ख़ुशी में इसे जोर से भींच लेती हूँ
गुस्से में जोर से इसको ही पटक देती हूँ
दुःख में छुपा के मुह इसको भिगो देती हूँ
कभी शर्मा के इसके ही दामन में सिमट जाती हूँ
पर कभी इसने कुछ नहीं कहा
चाहे जो भी किया मैंने इसका
सब चुपचाप मौन हो सहा
प्यार से सहलाया तो भी नहीं ये इतराया
पटक दिया जब जोर से ये नहीं गुस्साया
कितना सहा इसने,लेकिन अहसान नहीं दिखाया
सोच रही हूँ काश मै भी तकिया बन पाती
बाँट पाती किसी के गम, आंसू,खुशियाँ
और फिर भी खुद पे नहीं इतराती
लेकिन क्या ये मुमकिन है?

गंगा…



गंगा तुम पावन और पवित्र,
पर मानव का स्वभाव विचित्र,
तुम आई धरती पर धोने पाप
पर मिला तुम्हे कैसा संताप
मनुज ने तुम्हे भी मैला कर दिया,
अपना सारा कलुष भीतर तुम्हारे भर दिया
गंगा तुम कितनी धैर्यवान
पर मानव है बड़ा शैतान
परीक्षा तुम्हारे धैर्य की
पग पग पर लेता आया
बांध के तुम को बंधन में
देखो विजय पे अपनी हर्षाया…
गंगा तुम कितनी निर्मल
अन्न धन से भर दी धरती
मानव के स्वार्थ अगिनत है
मैले से तेरी गोद भर दी
तुम ने दिया आश्रय सबको
जो शरण तेरी आये निसहाय,
तुम सहनशक्ति की सीमा हो
हो मौन सह रही सब अन्याय
गंगा तुम जीवन देती हो
बदले में कुछ नहीं लेती हो
पर मानव के स्वार्थ अथाह
जाने क्या पाने की चाह
व्यर्थ भटकता रहता है
तुम क्रोध ना करना है धैर्यशील
आखिर वो तुम को माँ कहता है..