बुधवार, 8 जुलाई 2020

माँ

माँ वाक़िफ़ है रग रग से
समझती है हर कारगुज़ारी
वो भोली, नादान नहीं होती
जितना तुम समझते हो,
उतनीअनजान नहीं होती।
चुप रहती है देख कर भी
सभी नदानियाँ तुम्हारी,
जितना भी तुम छुपा लो,
वो सब जान लेती है।
शैतानियों से तुम्हारी
वो पशेमान नहीं होती
डाँटेगी,डपटेगी,डराएगी
कभी उमेठेगी कान भी
सहला देगी फिर माथा
प्यार से पुचकार भी लेगी।
बस यूँही बिन बात कभी
परेशान नहीं होती।
माँ वाक़िफ़ है रग रग से तुम्हारी(आशा

वक़्त

उड़ जाता है,जाने कैसे फ़ुर्र
क्या वक़्त के पँख होते हैं,
हैरान तकती हुँ, ढूँढती हूँ
पर हाथ नही कुछ आता
बस भौचक रह जाती हुँ
पकड़ना चाहती हूँ इसे
पर क्या पकड़ूँ, और कैसे
ना वक़्त दिखता है,ना उसके पँख...(आशा)


नारी

तुम ख़ूबसूरत हो, बहुत ख़ूबसूरत
अद्भुत संयोजन स्नेह और संयम का
समय के साथ निखर गयी हो
पूर्ण कांतिमय कमलिनी सी
समय ने पोषित किया नारीत्व तुम्हारा
सुनो अब तुम हो परिपूर्ण नारी
तुम आधार हो सृष्टि का सारी
मातृत्व की गरिमा से आलोकित
तुम्हारे लहराते केशों में बसी
हुयी महक अब दीवाना नहीं बनाती
ना अब तुम्हारी देह किसी को करती
है अब उत्तेजित,
नयन भी राह नहीं भटकाते,
स्पर्श तुम्हारा नहीं सुलगाता अग्नि
तन मन में वासना नहीं जगाता
अपितु अब तुम गरिमामयी व्यक्तित्व
की स्वामिनी साक्षात देव स्वरूपिणी
ममता का झरना नयनों से बरसाती
अपने स्पर्श मात्र से त्रिशित हृदयो
को शीतलता पहुँचाती, आँचल की
छांव में सबको समेटती हुयी चलती हो
जीवन के अनुभवों की थाती संभाले
बिखराती मुस्कानों के मोती, रेशम
की डोरी सी सबको सहेजती समेटती
पोषित करती,क्षमा और प्रेम का
अद्भुत संयोजन बन सहज भाव से
जीवन के हर उतार चढ़ाव को देखती
निर्बाध नदी सी गहरी और शीतल
स्वयंसिद्धा सर्व व्यापिनि, माँ हो
नारी तुम अद्भुत कृति ईश्वर की...,


मसला ज़रूरी है

शाम थोड़ी तनहा सी थी
अलसायी सी, चुपचाप
दिन भर धूप की तपिश से
झुलसी पांखे सहलाते पंछी
लौट रहे थे घरोंदों में अपने
आवारा फिरती गाय बैठ गयी
उस घने पीपल की छाँव में
जुगाली करती अपनी दिन
भर की थकान को उतारती
ज्यूँ पीपल से बतियाने लगी थी
मोड़ पे जमने लगी थी बैठक
गली के कुत्तों की, बहस जारी
मुद्दा फिर वही रोटी का
दफ़्तर से घर लौटते शर्मा जी
झुंझलाए से,शायद दिन अच्छा
नहीं गया होगा उनका...
तभी पड़ोस के रिकी की बॉल
टकरायी टिम्मी की खिड़की से
छनाक ! और अब सब गूंज उठा
सारा मोहल्ला जाग गया
शाम का सूनापन जैसे कहीं भाग गया
हमारे यहाँ ज़िंदगी के लिए
कोई ना कोई मसला ज़रूरी है.......(आशा)

पर्फ़ेक्ट पार्ट्नर

सुनो तुम पर्फ़ेक्ट नहीं हो
कितनी कमियाँ उफ़्फ़
क्या बताऊँ और क्या नहीं
तुम ऐसा नहीं करते
तुम वैसा नहीं करते
कितनी कमियाँ गिनाऊँ
जाओ पता है मुझे, तुम्हें
ढंग कुछ भी नहीं आता ।
लेकिन सुनो आता तो
मुझे भी नहीं सब कुछ
कितनी झल्ली सी हूँ
कितना हड़बड़ायी सी
रहती हुँ हर वक़्त
अपने आप में गुम
अरे अब क्या बताऊँ
के किस कदर
बेतरतीबी से भरी ।
क्या हल निकालें
कुछ सोचो ज़िंदगी
पर्फ़ेक्शन से कैसे गुज़ारें।
तो ऐसा करते हैं चलो
तुम मुझे झेल लो
मैं तुमसे निभा लूँगी
तुम कमा के लाना
मैं घर सम्भालूँगी
हम दोनो अधूरे मिलकर
एक पूर्ण अंक बन जाएँगे....(आशा)

गुरुवार, 7 मई 2020

आज सुबह ……….



आज सुबह नहाते हुए
धो डाले सारे गम,अफ़सोस
नए कपड़ो सा ओढ़ लिया
प्यार,ख़ुशी और अपनापन
आखिर कब तक कोई
मनाये सोग अपनी अधूरी
ख्वाईशों,अधूरे सपनो का
सो छोड़ दिया उन्हें
केंचुली सा उतार दिया
और अब नए कलेवर में
नयी हसरतों का मजमा है
जिंदगी को देखने के लिए
नज़र पे आज नया चश्मा है
हसीन लग रही है……..?
या मान लिया है इसको हसीन…
चलो जो भी हुआ,भूल जाओ
नयी जिंदगी,नयी खुशियों
नयी उमंगों का जश्न मनाओ
जब तक ये बदल न जाये
फिर से अधूरेपन में….
कम से कम तब तक तो
ऐ दिल इनका लुत्फ़ उठाओ..
क्यूंकि आज सुबह नहाते हुए
धो डाले सारे गम,अफ़सोस
नए कपड़ो सा ओढ़ लिया
प्यार,ख़ुशी और अपनापन………

बुधवार, 6 मई 2020

…….मेरा प्यारा तकिया…….



आज सुबह यूँही तकिये को देखा
सलवटे हटाते हुए उसको सहलाया
और सोचा,कितना अपना है ये
मेरे हर सुख -दुःख का मौन सांझी
बिना कोई सवाल जवाब किए
जैसे भी रखती हूँ रहता है
आंसू हो मेरे या हंसी सब
जज्बातों को बाँट लेता है
ख़ुशी में इसे जोर से भींच लेती हूँ
गुस्से में जोर से इसको ही पटक देती हूँ
दुःख में छुपा के मुह इसको भिगो देती हूँ
कभी शर्मा के इसके ही दामन में सिमट जाती हूँ
पर कभी इसने कुछ नहीं कहा
चाहे जो भी किया मैंने इसका
सब चुपचाप मौन हो सहा
प्यार से सहलाया तो भी नहीं ये इतराया
पटक दिया जब जोर से ये नहीं गुस्साया
कितना सहा इसने,लेकिन अहसान नहीं दिखाया
सोच रही हूँ काश मै भी तकिया बन पाती
बाँट पाती किसी के गम, आंसू,खुशियाँ
और फिर भी खुद पे नहीं इतराती
लेकिन क्या ये मुमकिन है?

गंगा…



गंगा तुम पावन और पवित्र,
पर मानव का स्वभाव विचित्र,
तुम आई धरती पर धोने पाप
पर मिला तुम्हे कैसा संताप
मनुज ने तुम्हे भी मैला कर दिया,
अपना सारा कलुष भीतर तुम्हारे भर दिया
गंगा तुम कितनी धैर्यवान
पर मानव है बड़ा शैतान
परीक्षा तुम्हारे धैर्य की
पग पग पर लेता आया
बांध के तुम को बंधन में
देखो विजय पे अपनी हर्षाया…
गंगा तुम कितनी निर्मल
अन्न धन से भर दी धरती
मानव के स्वार्थ अगिनत है
मैले से तेरी गोद भर दी
तुम ने दिया आश्रय सबको
जो शरण तेरी आये निसहाय,
तुम सहनशक्ति की सीमा हो
हो मौन सह रही सब अन्याय
गंगा तुम जीवन देती हो
बदले में कुछ नहीं लेती हो
पर मानव के स्वार्थ अथाह
जाने क्या पाने की चाह
व्यर्थ भटकता रहता है
तुम क्रोध ना करना है धैर्यशील
आखिर वो तुम को माँ कहता है..

रविवार, 29 मार्च 2020

नमक तनहाइयों का काट रहा
धीरे धीरे इमारत-ऐ-ज़िंदगी
उम्र की परतें यूँ चढ़ रही है
नए मायने जीने के गढ़ रही हैं......(आशा)

हमसफ़र

आँखों  में इक सुरूर था 
हुआ तो कुछ ज़रूर था 
लहक रही थी वादियाँ 
मौसम भी कुछ मग़रूर था | 
 
धुप थोड़ी ज़र्द थी 
हवा भी थोड़ी सर्द थी 
कंधे  तेरा हाथ था 
नया नया वो साथ था | 

वादियाँ खिली सी थी 
औंस से धुली सी थी 
खोए से थे तुम और मैं 
बस धड़कनो का शोर था|| 

अफ़साने यूँ तो हज़ार थे
सुनने से कब गुरेज़ था 
महक सी थी फ़िज़ाओं में 
दिल इश्क़ से लबरेज़  था 

न वक़्त की थी बंदिशें 
न ज़िन्दगी  मुश्किलें 
न फ़िक्र नून तेल की 
न ज़िक्र किसी और का 

लबों पे बस तेरी बात थी 
तू मेरे,मैं तेरे साथ थी 
जब बने थे हमसफ़र 
ये उन दिनों की बात है....(आशा)