बुधवार, 7 सितंबर 2011

कल्पनाये...............

पंख कहाँ से मिलते हैं
कल्पनाये कैसे उड़ती है
अक्सर सोचती हूँ बैठे-बैठे
जाने क्यूँ इनकी उड़ाने
इतनी बेलोस होती हैं

जाने कितने इन्द्रधनुष
पार ये कर जाती है
कितने ही पर्वतों को
कदमो पे ले आती हैं
बड़ी बेखोफ़ होती हैं

हजारों रूप धरती  हैं
कई नक़्शे बदलती है
कोई भी रोक ना पाए
कहाँ कब किसकी सुनती हैं
बड़ी मुहज़ोर होती हैं....

कभी बादल पे जा बैठें
कभी तैरें हवाओं में 
संभाले ये ना संभले
उड़ जाये फिजाओं में
बड़ी बेफिक्र होती है..

समंदर की गहराई 
या फलक की ऊँचाई
कहीं कुछ नहीं मुश्किल
जहाँ जी चाहे ये जाये
किसी के हाथ ना आये
बड़ी मदहोश होती हैं............



--
ASHA

रविवार, 4 सितंबर 2011

जब तुम पास नहीं होते.....


सुनो,जब तुम पास नहीं होते
तब भी मेरे साथ ही होते हो

जैसे असमान के आगोश में
चाँद हमेशा कायम है,फिर
चाहे रोज़ दिखे न दिखे.....

हर वक़्त महसूस करती हूँ

जबअँधेरे घेरने लगते हैं,
सन्नाटे डराने लगते हैं
सूनापन डसता है नाग बनके
उसी वक्त याद तुम्हारी
तुम्हे पास मेरे ले आती है
और जगमगा जाता है
तेरे नूर से मेरा वजूद...


जब तुम पास नहीं होते
मेरी अमावस होती है,औ'
जब भी होती है अमावस
रात की गाढ़ी स्याही फैलती है
सारे आलम को आगोश में ले
अँधेरे के चाबुक चलाती है,
अपना साया भी तब पास
नहीं होता,बेगाना माहौल
जी कितना घबराता है,क्यूंकि
अमावस में चाँद नहीं दिखता

चाँद चाहे गुम हो अंधेरों में
तब भी उसका वजूद होता है...
चांदनी चाहे ना बिखेर पाए
तब भी वो वहीँ,मौजूद होता है....
ठीक उसी तरह जैसे तुम
पास हो या ना हो,शामिल होते हो,
मेरी हर साँस में बनके ख़ुश्बू
नस नस में बहता है लहू के संग
अहसास तुम्हारी मौजूदगी का
और फिर वो बेबस तन्हाई
अपना सा मुँह लेके रह जाती है...........................तन्हा,अकेली..


शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मेरा हर दिन.....

नित नए संकल्प लिए
उगता है मेरा हर दिन
और ह्रदय में उमड़ते
नित नए बवंडर
विचारों की बरसात में
भीगती,खयाली पुलाव
पकाती,खुद ही मुस्कुराती
जाने कितने स्वप्न बुनती हूँ
कुछ खुशियों के महकते फूल,
थोड़े आंसू,थोड़े गम के कांटे
सारा दिन पलकों से चुनती हूँ
भागती फिरती हूँ,अनजानी सी 
अनकही बाते जाने कैसे सुनती हूँ
लोग कहते है,तुम पगली हो
मान लेती हूँ चुपसे,औ 
इस तरह पल-पल सरकता है
मन मेरा रेत सा दरकता है
अनबुझ पहेली सी मैं दिखती हूँ
बीत जाती है मेरी हर साँझ
यूँ ही आहिस्ता -आहिस्ता
फिरसे कल दिन उगेगा मेरा
लिए नए सकल्प,नए बवंडर........

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मौन....

अभिव्यक्त कर देना स्वयं को 
कब इतना सरल हुआ है....
फिर इतना रुचिकर भी तो नहीं है
ये विषय....इसलिए 
मौन ही श्रेयकर साधन है
स्वयं की अभिव्यक्ति का
तुमसे स्नेह करने वाले 
मौन को पढ़ लेंगे खुद ही
और बाकि बिना कोई अपवाद
चुपचाप आगे निकल जायेंगे....

--
ASHA

बुधवार, 31 अगस्त 2011

तन्हा.... चांदनी

ईद का चाँद रोशन है,
आसमान की गोद में 
वो मुस्कुरा रहा है
चमका के सितारे और
मेरी पलकें नम है,होंठों 
पे हंसी सज़ा रखी है
सब है यहाँ पास मेरे लेकिन,
मेरी चांदनी तन्हा है,
बहुत दूर मेरे आँचल से 
औ' ईद का चाँद रोशन है........


अभी बढ़ेगी चमक उसकी
और फिर मेरा घर ही नहीं
पूरी दुनिया रोशन होगी
मेरी छोटी सी किरण बढ़ेगी
औ' चाँद बनके चमकेगी पर, 
अभी वक़्त बहुत है बाकि
तब तलक दूर कहीं
मेरी चांदनी है तन्हा
बहुत दूर मेरे आँचल से 
और ईद का चाँद रोशन है.........

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विभूति....

       विभूति....

आज तुम अट्ठारह की हो जाओगी
एक नया दौर है जीवन का ये भी
अब नए अधिकार, और कर्तव्य 
नया आकाश उड़ने को पाओगी


तुम बढ़ी हो,बदला है समय,
और साथ ही बढ़ी है ये माँ भी,
तुम्हारे साथ साथ बढ़ता रहा है 
मातृत्व मेरा,परिपक्व हुआ है...

तुम्हारे जनमते ही,जन्मी थी 
एक स्त्री से माँ बनी थी
जैसे पर्वतों से गिरता झरना 
नदी बन जाता है,गहरा जाता है....

नन्ही परी सी तुम आई 
और मै बदल गयी थी
जैसे सूरज की पहली किरण
पड़ते ही रात बदल जाती है दिन में.....

समय का भान ही कहाँ हुआ
कल की बात लगती है
जब तुम ठुमकती रहती थी
आँगन में चहकती थी,

पकड़ उंगली मेरी चलती थी
या इशारों पर मुझको चलाती थी...
कितने सवाल होते थे तुम्हारे
और उन सवालों से मैं 
कितना हैरान हो जाती थी..

सवाल आज भी है पर अब 
जवाब तुम स्वयं ढूंढ़ लेती हो
हैरान आज भी होती हूँ मैं
जब तुम मेरे सवालो को भी हल कर देती हो...

युवा होती तुम्हारी पीढ़ी से डरती हूँ....
बहुत तेज रफ़्तार है,तुम्हारी
आज भी तुम्हे रखना चाहती हूँ
बाँध कर आँचल में अपने
पर नयी मंजिल है अब तुम्हारी....

एक नयी दिशा मिली है तुम्हे
उसी राह पर बढ़ती जाओ, 
स्वप्न जो भी हो तुम्हारे पूरे हों,
एक नया विस्तार पाओ..........

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

गांधी और अन्ना ......


मैंने पढ़ा किताबो में बस
गाँधी ने स्वतंत्रता दिलाई थी
एक अहिंसा के हथियार से 
अंग्रेजों की नींद उड़ाई थी

इक चादर,इक लाठी ले बापू
जब जिस ओर निकलते थे
गांधी टोपी पहने लाखों
उनके संग संग चलते थे 

गाँधी के पीछे सर्वस्व छोड़ 
जन-सैलाब उमड़ता था
तब सोचा करती थी पहरों 
कैसे उनमे इतना जोश 
उमड़ता था.........

कैसे त्याग सभी वैभव,सुख
तन-मन को अर्पण करते थे
कैसे बापू की इक बोली पर
सब उनके पीछे चलते थे

घर,परिवार से पहले देश है 
कैसे ये भाव ह्रदय समाता था
हर आपद को हंस कर सहना 
कैसे इतना संयम आता था 
 
क्या गाँधी थे कोई जादूगर
सम्मोहन कोई करते थे
कैसे सारे लोग उनकी ओर
यूँ सम्मोहित से तकते थे

आज मिले उत्तर सारे,कैसे 
अलख अनोखा जागा था 
कैसे इक बापू से डर कर 
फिरंगी देश से भागा था 

फिर गाँधी जन्मा भारत में
नाम है अन्ना हजारे..
धर्म,जाति,मज़हब के बंधन
तोड़ के संग आये सारे

तब अनशन और सत्याग्रह से
फिरंगी को देश से भगाया था
बच्चा बच्चा बन गाँधी
तब सड़को पर आया था.

आज तोड़नी है फिर बेडी
हमको भ्रष्टाचार की 
अन्ना की आंधी से हिल गयी
चूले भ्रष्ट सरकार की 

मै भी अन्ना ये नारा 
जन जनने दोहराया है
एक परिवर्तन की आंधी बन 
अन्ना दिल्ली में आया है..................

बूढ़ी काया में जाने कैसे
इतना जोश समाया है
अन्ना के हठ से डर कर
हाकिम कदमो पे आया है

सदा वेश, सरल सी काया
अदभुद मुख पर तेज है 
अन्ना का संकल्प अनोखा
हम सबसे पहले देश है

जन लोकपाल बने कानून
यही एक जिद ठानी है
भ्रष्टाचार के दुश्शासन से
देश की लाज बचानी है

मैं...

  खुद में मस्त हूँ,मलँग हूँ मैं मुझको बहुत पसंद हूँ बनावट से बहुत दूर हूँ सूफियाना सी तबियत है रेशम में ज्यूँ पैबंद हूँ... ये दिल मचलता है क...