सोमवार, 12 अगस्त 2019

ज़िन्दगी

गड़ती है नए क़िस्से
कभी ख़ामोश रहती है
कभी तूफ़ाँ मचा देती
कभी बस यूँही तकती है
अजब अन्दाज़ है तेरा
ग़ज़ब की धाक रखती है
समझना ज़रा मुश्किल
सरल सी तेरी हस्ती है
कभी फूलों की डाली है
कभी काँटों की झाड़ी है
चहकती चिड़ियों सी फिरे
कभी बुत सी तू ठहरी है
कभी मीठी कभी कड़वी
कभी चंचल गिलहरी है
कभी थाली सी उथली है
कभी सागर सी गहरी है
ख़ुशियों की वजह है तू
कभी ग़म की गठरी है
गरजती है, कभी बिन बात
कभी यूँही बरसती है
कभी ख़ुश होके तू झूमे
कभी यूँही तरसती है
लगता है मुझे अक्सर के
तू ज्यूँ सावन की बदरी है ....(आशा)

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