सोमवार, 12 अगस्त 2019

बदलाव

एक दिन अचानक यूँही
वक़्त की दहलीज़ पर छोड़
आयी थी कितना कुछ अनकहा
अपनी गुड़िया, माँ का आँचल
पापा का कन्धा, भाई बहन
कितना कुछ राह में छूट गया...
वो किताबों का ज़ख़ीरा,
रंग बिरंगी तितलियों वाली अल्बम
सब रह गया,और मैं चली गयी छोड़ कर....
सोचती हूँ आज भी तो हैराँ हो जाती हूँ
वो छोटे छोटे ख़्वाब, आरज़ू,लड़कपन
सब देहली पर चढ़ा दिए लाजों के साथ
अपने पीछे उलीच दिए अँजुरी भर भर
वो एक दुशाला खींच रहा था चुनर मेरी
उसके पीछे पीछे चली आयी आँखे मींचे
कुछ घबरायी, कुछ लजायी, अनजानो
के बीच अपना घर बसाने, झिझक कर
कांपते हाथों से सम्भाली नयी ज़िम्मेदारी
और बस!
तबसे अब तक वक़्त ही नहीं मिला
कभी मिला भी तो बिसरा दिया
हंस कर कभी दो आँसू बहाकर
ख़ुद को हर रोज़ बहला लिया
जब कभी बहुत जी चाहा तो
कग़ज का सीना चाक कर डाला
अब उम्र हो गयी और सपने बदल गए
बदल गए मेरे अहसास वक़्तके साथ
क्यूँकि अब मैं वो अल्हड़ लड़की नहीं
माँ हूँ, और माँ के सपने तो बसते हैं
अपने बच्चों की आँखो में......(आशा)Badlav

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