शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

बरखा और मैं ....

सुबह आँख खुली तो आँगन
रिमझिम फुहारों से सराबोर
मन के भीतर बैठी छोटी आशा
मचल उठी,ज़िद्दी जो है इतनी
अजब ग़ज़ब नशा सा तारी
और फिर क़दम ख़ुद ब ख़ुद
ले गए बरखा की फुहारों में
तन भीगा,मन भीगा,
भीगे जज़्बात,मचलने
लगे बरखा के गीत होंठों पे
शायद मयूर थी पिछले जन्म में
थिरकती बूँदे गुनगुनाने लगी
पकड़ के आँचल हवायें
मुझसे बतियाने लगी
जाने कितने नए पुराने
नग़मे थिरक उठे होंठों पे
बिन बात ही मुस्कुराने लगी
आँगन में नाचती बूँदे
मचा रही थी बवाल
बाँवरी होके उन संग
मैं भी तूफ़ान बन गयी
भूल के उम्र की सरहद
बचपन में जा पहुँची
और भूल के दुनियादारी
अपने से हो के बेख़बर
समेटने लगी अँजुरी भर भर
मोती की लड़ियाँ.........(आशा)

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