शनिवार, 28 जुलाई 2018

चक्की

दिमाग़ में अविरल चलती
रहती है चक्की सोचों की
जाने कितनी बातें, यादें
कौन कौन से ख़याल
बेहिसाब अनघड़ सवाल
पिसते रहते है दिन रात
और इन सब की पिसावन
धूल बन के छाई रहती है
हर वक़्त मुझ पर, और
दम घुटने सा लगता है
साँस यूँ रुकती है मानो
दमे का दौरा पड़ा हो
कानो में बजती हैं सीटियाँ सी
ये धूल फैलती जाती है
ढांप लेती है वजूद मेरा
जैसे घने कोहरे में लिपटी
सुबह धुँधली सी अलसायी सी
अपने आप में गुम मैं भी
रहती हूँ कुछ सुस्तायी सी
कभी मन करता है काश
थोड़ी देर को ठहर जाए
कभी तो रुक जाए.....
इसकी घर्र घर्र कैं कैं
और एक रात सो पाऊँ
सकून की नींद,
ना कोई ख़्वाब, ना ख़याल
बिना किसी ख़लल
बस एक रात........(आशा)

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