शनिवार, 11 अप्रैल 2015
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015
यूँही आज कल
यूँही आज कल पता नहीं कहाँ हूँ खोई सी
अलसायी सी जिंदगी उबासी ले रही है ।
क्यों उँगलियाँ इतनी अशक्त लगने लगी हैं
कलम भी उठाना भारी हो गया आज कल ।
सोचों पर भी पड़े हैं ताले, सन्नाटे गूंज रहे है
किसी अनजान सी राह पर डगमगाते कदम ।
दिमाग में बज रहा कोई अधूरा गीत बेआवाज़
धुंध सी छायी हैचारों ओर, उलझा सा है मन ।
धुंधलायी सी नज़रें गुमनाम ख़ामोशी लबों पर
यूँ के जैसे मदहोश दीवानगी के आगोश में गुम
कोई मुसाफिर भटकता फिर रहा हो वीराने में ।
मन की अँधेरी गुफा में गुर्राते हैं अनगढ़ ख्याल
और भागती फिर रही हूँ कान में उंगली दिये।
ऐसा क्यों है मत पूछना, मुझे खुद नहीं पता ।
तुम समझ पाओ तो मुझको भी बताना प्लीज। … आशा
अलसायी सी जिंदगी उबासी ले रही है ।
क्यों उँगलियाँ इतनी अशक्त लगने लगी हैं
कलम भी उठाना भारी हो गया आज कल ।
सोचों पर भी पड़े हैं ताले, सन्नाटे गूंज रहे है
किसी अनजान सी राह पर डगमगाते कदम ।
दिमाग में बज रहा कोई अधूरा गीत बेआवाज़
धुंध सी छायी हैचारों ओर, उलझा सा है मन ।
धुंधलायी सी नज़रें गुमनाम ख़ामोशी लबों पर
यूँ के जैसे मदहोश दीवानगी के आगोश में गुम
कोई मुसाफिर भटकता फिर रहा हो वीराने में ।
मन की अँधेरी गुफा में गुर्राते हैं अनगढ़ ख्याल
और भागती फिर रही हूँ कान में उंगली दिये।
ऐसा क्यों है मत पूछना, मुझे खुद नहीं पता ।
तुम समझ पाओ तो मुझको भी बताना प्लीज। … आशा
शनिवार, 21 दिसंबर 2013
माँ की दुविधा
सोच रही हूँ तुमसे कुछ कहूँ,सुनोगे बेटा
माँ हूँ,पर डरती हूँ नए ज़माने के नए सलीकों
नए सवालों से,थोडा तुम्हारी उठती उम्र और
अपनी पुरानी पड़ती सोच का भी डर है.....
जानते हो, जब तुमने पहली बार मेरी कोख में
करवट ली थी,धीमे से कई अनदेखे ख़्वाब,
अनघड ख्वाइशों ने भी ली थी अंगड़ाई दिल में
और तबसे ही सपनो के ताने-बाने बुनती रही हूँ|
तबसे अबतक हर दिन कभी तुम्हेँ, डाक्टर,कभी
इंजीनियर,कभी आर्किटेक्ट तो कभी सीए बनाती
कभी सजाती फ़ौजी वर्दी तो कभी पुलिस यूनिफार्म
तो कभी बना तुम्हे पाइलेट सपनो के जहाज उडाती,
और तुम अपनी तुतली जुबान से कहते हर बार
माँ जो तुम कहोगी कर जाऊंगा,एक बार बड़ा होने दो
फिर देखना तुमको राज करूँगा,मैं बस हंस देती.....
जानती हूँ तुम आज भी अपनी बात पर कायम हो,
मैं तुम्हारी पहली चाहत हूँ आज भी,हर बात पर
अब भी तुम सबसे पहले "माँ"ही पुकारते हो.… :-)
और निहाल हो जाती हूँ तुम्हारी पुकार पर
फिर भी जाने क्यूँ एक अंजाना सा डर, डराता है
तुम कहीं भटक ना जाओ दुनिया कि चकाचौंध मैं
सोच के ही मन मेरा घबराता है......
आँचल से बांधे रखना चाहती हूँ तुम्हें। …।
तुम खड़े हो बचपन और जवानी की देहलीज़ पर
जहाँ एक खुला आसमान है उड़ने को
असीम सम्भावनाये बाँहे पसारे खड़ी हैं
पर साथ ही अनजानी भूलभुलैयाँ भी है
तुम छूना चाहते हो अपना क्षितिज़
अपने ही प्रयासों से,गर्वित हूँ लेकिन
सशंकित भी हूँ,क्या तुम सही चुनाव कर पाओगे??
कहीं ठोकर तो नहीं खाओगे????
माँ हूँ,पर डरती हूँ नए ज़माने के नए सलीकोंनए सवालों से,थोडा तुम्हारी उठती उम्र और
अपनी पुरानी पड़ती सोच का भी डर है.....
जानते हो, जब तुमने पहली बार मेरी कोख में
करवट ली थी,धीमे से कई अनदेखे ख़्वाब,
अनघड ख्वाइशों ने भी ली थी अंगड़ाई दिल में
और तबसे ही सपनो के ताने-बाने बुनती रही हूँ|
तबसे अबतक हर दिन कभी तुम्हेँ, डाक्टर,कभी
इंजीनियर,कभी आर्किटेक्ट तो कभी सीए बनाती
कभी सजाती फ़ौजी वर्दी तो कभी पुलिस यूनिफार्म
तो कभी बना तुम्हे पाइलेट सपनो के जहाज उडाती,
और तुम अपनी तुतली जुबान से कहते हर बार
माँ जो तुम कहोगी कर जाऊंगा,एक बार बड़ा होने दो
फिर देखना तुमको राज करूँगा,मैं बस हंस देती.....
जानती हूँ तुम आज भी अपनी बात पर कायम हो,
मैं तुम्हारी पहली चाहत हूँ आज भी,हर बात पर
अब भी तुम सबसे पहले "माँ"ही पुकारते हो.… :-)
और निहाल हो जाती हूँ तुम्हारी पुकार पर
फिर भी जाने क्यूँ एक अंजाना सा डर, डराता है
तुम कहीं भटक ना जाओ दुनिया कि चकाचौंध मैं
सोच के ही मन मेरा घबराता है......
आँचल से बांधे रखना चाहती हूँ तुम्हें। …।
तुम खड़े हो बचपन और जवानी की देहलीज़ पर
जहाँ एक खुला आसमान है उड़ने को
असीम सम्भावनाये बाँहे पसारे खड़ी हैं
पर साथ ही अनजानी भूलभुलैयाँ भी है
तुम छूना चाहते हो अपना क्षितिज़
अपने ही प्रयासों से,गर्वित हूँ लेकिन
सशंकित भी हूँ,क्या तुम सही चुनाव कर पाओगे??
कहीं ठोकर तो नहीं खाओगे????
शनिवार, 18 मई 2013
तेरे जाने का ग़म ....
टीस सी उठती रही रह-रह कर
रिसती रही पलके,छलकता रहा
दर्द का दरिया .....
यादों का खंज़र कुरेदता रहा
दिल की हर परत,तेरी शरारतें,
अठखेलियाँ,तेरी मुस्कान और
धीरे से कहना चची- जान,
धड़कनों में बजती रही तेरी आवाज़......
खामोश सिसकियाँ,थर्राती रही
मजबूर साँसे फिर भी चलती रही
रात भी थोड़ी सहमी सी थी
जैसे उसे भी डस गया था
तेरे जाने का ग़म .....
जानता है क्या कितने दिन हुए
तू सो गया बेखबर,बेसुध,और
जगती रही कई जोड़ी आखें
कई रातों तक तेरे जगने की
राह देखती रही,आस का दिया जलाए ......
पर आज अजब रात आई है
जाग तो आज भी रही हैं दर्ज़नो आँखें
तेरे लिए रात भर लेकिन बिना कोई आस,
ख़त्म हो गया हर-एक- इंतजार .....
चमकीला सूरज फिर आया
लेकिन मेरे घर का अँधेरा
जस का तस….बल्कि थोड़ा गहराया सा-----
और सुबह एक दम रीती खुरदरी ......
बिदाई की बेला जो है,आँख फिर पिघल रही है ..... (आशा)
बुधवार, 24 अप्रैल 2013
ग्रहण
सम्भवतः आजकल मेरी सोच
पर भी लग गया है ग्रहण
अथवा थम गयी है गति
ह्रदय के स्पंदन की ....
मस्तिष्क का दिन-रात
सोचना कहाँ गया ?
जम गयी है संवेदनाये
तभी तो न कोई विचार
न कोई अभिव्यक्ति न ही
कोई विरोध दर्ज कर रही हूँ
जबकि कितना कुछ घट रहा है
आस-पास ,बिलकुल मेरे सामने
और मैं मौन हूँ ,
किस तरह हर बात पर
भड़क उठती थी, कितने
सवाल मथते थे,कितनी
उन्मादिनी हो उठती थी
शब्दों की नदी घुमड़ उठती थी
किन्तु अब सब शांत है ,और
मैं उलझी हूँ इसी उहापोह में
आखिर हुआ क्या है ?
ठीक-ठीक पता नहीं चल रहा
क्या कोई सुलझा पायेगा ये गुत्थी ......(आशा)
पर भी लग गया है ग्रहण
अथवा थम गयी है गति
ह्रदय के स्पंदन की ....
मस्तिष्क का दिन-रात
सोचना कहाँ गया ?
जम गयी है संवेदनाये
तभी तो न कोई विचार
न कोई अभिव्यक्ति न ही
कोई विरोध दर्ज कर रही हूँ
जबकि कितना कुछ घट रहा है
आस-पास ,बिलकुल मेरे सामने
और मैं मौन हूँ ,
किस तरह हर बात पर
भड़क उठती थी, कितने
सवाल मथते थे,कितनी
उन्मादिनी हो उठती थी
शब्दों की नदी घुमड़ उठती थी
किन्तु अब सब शांत है ,और
मैं उलझी हूँ इसी उहापोह में
आखिर हुआ क्या है ?
ठीक-ठीक पता नहीं चल रहा
क्या कोई सुलझा पायेगा ये गुत्थी ......(आशा)
गुरुवार, 7 मार्च 2013
स्त्री दिवस
आज आप सब मिल कर
मना रहे हैं स्त्री दिवस
मुबारक हो ये दिन आपको
लेकिन क्षमा करें ,
मैं नहीं मनाती, और ना ही
खुद को मोहताज़ मानती हूँ
किसी एक दिन के लिए
मैं स्त्री हूँ जन्म से और
मेरा हर दिन स्त्री दिवस है
हर दिन को मानती हूँ
पूरे हर्षोल्लास के साथ
फिर क्यूँ आप सब मानते हैं
स्त्री दिवस सिर्फ एक दिन ...........??
मना रहे हैं स्त्री दिवस
मुबारक हो ये दिन आपको
लेकिन क्षमा करें ,
मैं नहीं मनाती, और ना ही
खुद को मोहताज़ मानती हूँ
किसी एक दिन के लिए
मैं स्त्री हूँ जन्म से और
मेरा हर दिन स्त्री दिवस है
हर दिन को मानती हूँ
पूरे हर्षोल्लास के साथ
फिर क्यूँ आप सब मानते हैं
स्त्री दिवस सिर्फ एक दिन ...........??
सोमवार, 11 फ़रवरी 2013
चला चल मुसाफिर .......
कठिन तेरी राहे ,है अन्जान मंजिल
तूफां में सकीना, बहुत दूर साहिल
ना रुकना कभी तू ,ना झुकाना कभी तू
सपनो की गठरी को लादे चला चल
चला चल मुसाफिर तू यूँही चला चल
मुश्किल में साया भी छोड़ दे साथ प्यारे
फिर क्यूँ किसीका तू रास्ता निहारे
कर खुद पे भरोसा,मेहनत से मत डर
मगन अपनी धुन में तू गाता चला चल
चला चल मुसाफिर तू यूँही चला चल
हालातों की आंधी तुझे गर डराए
दुनिया तेरे पथ में कांटे बिछाए
कोई भी हो मुश्किल मत हार हिम्मत
कमर बांध प्यारे तू बढ़ता चला चल
चला चल मुसाफिर तू यूँही चला चल
ये दस्तूर दुनिया का सदियों पुराना
बढे जो भी आगे खींचे पीछे जमाना
रोते हुओं को न कोई चुप कराये
हंसते हुओं को भी ये जाने रुलाना
पीके हरेक आंसू,मुस्कुराता चला चल
चला चल मुसाफिर तू यूँही चला चल
सूरज अकेला ही चलता है प्यारे
उजाले से उसके रोशन सब नज़ारे
तू उड़ बनके आंधी,बरस बनके बरखा
चमक बन के सूरज,निखरता चला चल
खुद अपने दम पर संवारता चला चल
चला चल मुसाफिर तू यूँही चला चल ...... (आशा)
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खुद में मस्त हूँ,मलँग हूँ मैं मुझको बहुत पसंद हूँ बनावट से बहुत दूर हूँ सूफियाना सी तबियत है रेशम में ज्यूँ पैबंद हूँ... ये दिल मचलता है क...
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झूठ को सच,सच को झूठ बना दे खुली आँखों को नया ख़्वाब दिखा दे भूल जाए गुस्ताखियाँ,ज्यूँ हुई ही ना हों ऐ ख़ुदा इतना बेग़ैरत, बेज़ार बना दे ज़िस...
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