शनिवार, 2 सितंबर 2017

बोलो ना .....

कुछ शबनमी ख्वाब,
खारे आंसू,मीठी हंसी 
कुछ शरारत,बांकपन
नजाकत थोड़ी,
थोड़ी नरमी,
नमी मोहब्बत की,
आँखों में छुपा रखी है,
बरसों से
निगेहबानी में तुम्हारी रहे
महफूज़ ये दौलत ता-उम्र
ये दिल की चाहत है......
बोलो क्या संभाल पाओगे?(आशा)


तू तो ऐसा न था.....

ख्वाबों पे तेरे हक हमेशा मानते रहे
तू नींदों से भाग जाने लगा,तू तो ऐसा न था..
तेरे ख्याल से रोशन रहती है जिंदगी
तू चिराग खुद बुझाने लगा,तू तो ऐसा न था...
जी लेते हम ये सोच के,तू हमकदम तो है
तू मुड़ के दूर जाने लगा,तू तो ऐसा न था.....
रूठा नहीं है, मायूस है ये जानती हूँ मैं
पर आँख भी चुराने लगा, तू तो ऐसा न था.....
एक बार कह के देख,तेरे जानिब न आयेंगे
पर बात कब से बनाने लगा,तू तो ऐसा न था...
दिल तेरा दुखा है,कसक मुझ को भी हुयी है
पर अश्क भी छुपाने लगा,तू तो ऐसा न था..(आशा)

घुटन

जब घुटन बढ़ जाती है, 
थम जाती है हवा, रुक 
जाती है थिरकन पत्तों की
घिर जाती है घनघोर घटा
सारी कायनात थम सी जाती है
ज्यूँ साज़िशन किसिने तोड़ दिया
धरती का असमां से रिश्ता
तब बरस जाती है बदरी
लरज़ गरज के झमाझम
और धुल जाती है फ़िज़ा
घुल जाती है घुटन
लहक उठती है धरती
झूम जाता है गगन
ऐसा सावन में अक्सर होता है(आशा

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

जीवन धन

अगर कभी माँगना होता 
कोई वरदान मुझे तो सिवा तुम्हारे 
और क्या माँगती मैं ईश्वर से 
मेरे सारे पुण्यों का प्रतिफल तुम हो
जीवन की सबसे अनमोल धरोहर
मेरा कोहिनूर हो तुम,
आज ही के दिन मैं बनी थी माँ
जीना सीखा था फिरसे
और तबसे अबतक सिर्फ़
वक़्त बदला,पर मैं बस माँ ही रह गयी
तेरी नींद सोयी तेरी नींद जागती रही
तू हँसी तो मैं भी हँसी,बस तेरी ही
ख़ुशियाँ ईश्वर से माँगती रही,,
और अब ये हाल है मेरा के तुझसे अलग
मेरा वजूद दिखता ही नहीं मुझको,                                          
सुन मैं बताती हूँ,
मेरी आँखों में जो ये चमक है ना
वो तुम हो
मेरे होंठों की मुस्कान भी तुम हो
जो कभी कभी यूँही झूमने सी लगती हूँ ना
वो भी तो तेरी ही सोहबत में होता है,
जबसे तू आयी कहाँ ज़रूरत रही
के कोई हो सहेली, तू ही तो है मेरी हमराज़
मेरी हर उलझन, परेशानी का इलाज
मेरी वक़ील डॉक्टर शोपिंग पार्ट्नर
लड़ती भी हूँ तो तुझसे प्यार भी
तुझसे ही करती हूँ
ना हो यक़ीं तो पूछो ईशान से,
सुनो बहुत प्यारी लगती हो
जब लग जाती हो गले से
चूमती हो मुझे माँ कभी मौम्मी
कहती हो,
किसी अल्हड़ लता सी लिपटती हो
मुझसे
या यूँही अनजाने खींचती हो
मेरे गाल, अठखेलियाँ करती हो,
पता है किसी नटखट गुड़िया सी लगती हो
खींच कर आँचल में छुपा लेना चाहती हूँ
फिर से गोद में भर के चूमना चाहती हूँ
बेतहाशा तुम्हें
पर रुक जाती हूँ ,अब तुम बड़ी हो गयी हो
डॉक्टर साहिबा
लेकिन मेरा दिल ये मनाने को राज़ी ही नहीं होता
मुझे तो आज भी वही विभूति दिखती छोटी सी
दूर से अपनी बड़ी बड़ी काली आँखों से
मुझे देखती टुकुर टूकुर,
नीली लेस वाली फ़्राक़ में लिपटी
माँ फिर बलिहारी जाती है अपनी गुड़िया पर
पता है तुम्हें, हर साल इस दिन मैं फिर उन्ही लमहों को जीती हूँ
और ख़यालों में अपने फिर अपनी छोटी सी
नन्ही परी को थाम लेती हूँ
लगा लेती हूँ सीने से तुझे
जाने क्यूँ आँख भर आती है
फिर लरज उठता है आँचल मेरा
और मैं फिर मैं कहाँ रह जाती हूँ...(आशा)

माँ

सूरज की पहली किरण
यूँ सहला गयी तन
ज्यूँ माँ  ने धीरे से 
कहा, उठो सुबह हो गयी..
एक मीठी सी महक
माँ के आँचल की
फ़ैल गयी फिजा में
मन मचल गया
माँ तेरी याद बरबस
नयन भिगो गयी....


मौसम

सोच रही हूँ कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल। 

सुबह सुबह की बारिश में भीगते
तन के साथ मन भी भीगा 
भीगे जज्बात ,भीगे ख्यालात 
भीगे सपने,और जाने क्यूँ
बिन कारण भीग गयी आँखे
बरखा ने धो डाला हर अवसाद
तन के साथ साथ मन की तपन भी
मिटा गयी रिमझिम बूँदेँ 
भीगा  मौन,भीगा एकांत
बाहर की भांति ,भीतर खिल उठा
मन का उपवन,भंवर डोले डार डार
सपनो की तितलियों ने किया फिर से श्रृंगार
बिन बात मुस्कुराने लगी  
कोई गीत गुनगुनाने लगी 
कोई बात नहीं हुयी नयी 
फिर भी नया सा लगा आँगन 
जाने कैसे हो गए इतने परिवर्तन
बहुत सोचा,फिर भी न जान पाई
जाने कभी कभी ये मौसम
कैसे बदल देता है माहौल .........आशा 

सवाल....

जब कभी होती है फुर्सत,
और दिल में होता है सकूँ
सोचती हूँ यूँ ही अक्सर  
जो हुआ, जो भी हुआ,वो 
क्यों हुआ, क्यूँकर हुआ 
हमतो चले थे तनहा घर से 
ये साथ कारवां -ऐ- सफर 
 कैसे हुआ  क्यूँकर हुआ। 

रंजिशें ज़माने ने पाली बहुत                 सवाल 
अपनी धुन में रहे मदमस्त 
बेफ़िक्र हम जीते रहे  
सोचते है अब,यूँही कभी 
इक उम्र गुजर जाने के बाद  
अपना यहाँ  गुजरो-बसर 
कैसे हुआ, क्यूँकर हुआ। 


कुफ्र से तोबा करुं ,कैसे करूँ ,
हो ही जाती है ख़ताएँ अक्सर 
इन्सां हूँ कोई फ़रिश्ता मैं नहीं
फिर भी सर झुकता है सज़दे  में 
अब ये बात और है, बन्दग़ी का 
यूँ मुझ पर असर हो तो गया पर 
कैसे हुआ, क्यों कर हुआ।

डूब जाएँ वो  के जो
जीने से आज़िज़ आये हों
हम जियेंगे बेफिक्र जब तक
नब्ज़ ये धीमी न हो
मौत की आँखों में आखें
डाल पूछेंगे सवाल
ख़त्म सफर-ऐ -ज़िन्दगी
हो तो गया पर क्यूँकर हुआ....(आशा)





मैं...

  खुद में मस्त हूँ,मलँग हूँ मैं मुझको बहुत पसंद हूँ बनावट से बहुत दूर हूँ सूफियाना सी तबियत है रेशम में ज्यूँ पैबंद हूँ... ये दिल मचलता है क...