दिल के शहर में आज
बरसी नयनो की बदरी
सूखा ख़तम हो गया
सब धुला धुला साफ़ साफ़
सब का किया धरा दिल से माफ़
काट छाँट रही हूँ,खरपतवार
चुन चुन के फ़ेंक रही हूँ सारे
गिले, शिकवे, शिकायतें
और तोड़ दी नफरतों की दिवार
अब हसरतों ने नयी शक्ल इख़्तियार की है
सपनों की नयी फसल हमने तैयार की है
एक नया आफताब टांग लिया
थोडा सा साफ़ आसमान मांग लिया
उजाले फिर से फैल गए
अब फूल खिलेंगे…….क्यूंकि,
दिल के शहर में आज
बरसी नयनो की बदरी
सूखा ख़तम हो गया
सोमवार, 6 सितंबर 2010
तुम बिन ………
तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन
एकाकी,अधूरी सी,मुरझाई सी,श्रापग्रस्त
अप्सरा सी जो अपना बनवास काट रही है..
तुमको सोचती तुमको महसूस करती हुयी
तनहा स्याह रातों के अकेलेपन से लडती
अपनी नियति को कोसती,किसी तरह
अपना समय बिताती हूँ,दिन तो कट जाता है
पर रात से डर जाती हूँ ,स्वप्न में देखती हूँ प्रिय तुम को
कल्पनो में तुम को लाती हूँ,तुम पास लगते हो
कभी समझ के तकिये को तुम,शर्मा जाती हूँ
तो कभी झगड़ने लगती हूँ इस कदर की मत पूछो
सारे गिले शिकवे उसे सुनती हूँ,और कभी
समझ के तुम्हारा चौड़ा सीना,उसमे सिमट जाती हूँ
पर जब टूटता है स्वप्न,नयन भर जाते है
कुछ अटक सा जाता है,साँस भी रुकने लगती है
दिल की धड़कन बहुत जोर से बजती है
तनहाइयाँ बन के नाग मुझ को डसती है और मै,
फिर से खो जाती हूँ विरह की गहरी कन्दरा में क्यूंकि,
तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन ………
एकाकी,अधूरी सी,मुरझाई सी,श्रापग्रस्त
अप्सरा सी जो अपना बनवास काट रही है..
तुमको सोचती तुमको महसूस करती हुयी
तनहा स्याह रातों के अकेलेपन से लडती
अपनी नियति को कोसती,किसी तरह
अपना समय बिताती हूँ,दिन तो कट जाता है
पर रात से डर जाती हूँ ,स्वप्न में देखती हूँ प्रिय तुम को
कल्पनो में तुम को लाती हूँ,तुम पास लगते हो
कभी समझ के तकिये को तुम,शर्मा जाती हूँ
तो कभी झगड़ने लगती हूँ इस कदर की मत पूछो
सारे गिले शिकवे उसे सुनती हूँ,और कभी
समझ के तुम्हारा चौड़ा सीना,उसमे सिमट जाती हूँ
पर जब टूटता है स्वप्न,नयन भर जाते है
कुछ अटक सा जाता है,साँस भी रुकने लगती है
दिल की धड़कन बहुत जोर से बजती है
तनहाइयाँ बन के नाग मुझ को डसती है और मै,
फिर से खो जाती हूँ विरह की गहरी कन्दरा में क्यूंकि,
तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन ………
सूरज ……
एक दिन रोक के रास्ता सूरज का,धीमे से
मैंने कहा,एक बात कहूँ बुरा तो न मानोगे
क्यूँ नहीं थोडा बैठ लेते इस बरगद कि छाँव
थोड़ी ही दूर पे है मेरा भी गाँव,रुको
कुछ देर बतिया लो बहुत चलते हो
थक गए होगे,न हो तो थोडा सुस्ता लो
सूरज हंसा और बोला,तुम्हारा शुक्रिया
पर रुक नहीं पाउँगा,मैने फिर से पूछा,
सूरज क्या थकता नहीं कभी तू
कभी नहीं चाहता तेरा मन कि,
आज घर बैठूं थोडा सुस्ता लूँ
चलो आज छुट्टी मै भी मना लूँ??
कभी तो थकता होगा तू भी
अपनी इस अनवरत यात्रा से
कभी तो तेरे घोड़े भी देखते होंगे
आशा भरी दृष्टि से तेरी ओर…
थोडा सा रुकने सुस्ताने को मन नहीं करता क्या?
सुन क्या तेरे घरवाले कभी नहीं चाहते
के तू उनके साथ बिताये पल चार
कोई बात कहे मीठी सी,बच्चो को करे प्यार
सुन के सूरज मुस्काया और बोला
मन कि छोडो,उसकी तो अपार है माया
उसकी लगा सुनाने तो कुछ नहीं हो पायेगा
इतने सालो से जो चल रहा है,मेरा तप टूट जायेगा.
अगर मै रुक गया तो धरती भी रुक जाएगी
रुक जायेंगे ये रात दिन,मौसम,ऋतुये
तब तुम सब कहाँ ठोर पाओगे
अपने लिए नहीं सदैव तुम्हारे लिए चलता हूँ
सर्दी हो या गर्मी बस परोपकार के लिए ही जलता हूँ
सूरज हूँ मै, चलना और जलना यही मेरी नियति है
हम सब को जो चलाती है,सबकी माँ प्रकृति है
अपनी मा के नियम नहीं तोड़ सकता
कुछ भी हो चलना नहीं छोड़ सकता……
मैंने कहा,एक बात कहूँ बुरा तो न मानोगे
क्यूँ नहीं थोडा बैठ लेते इस बरगद कि छाँव
थोड़ी ही दूर पे है मेरा भी गाँव,रुको
कुछ देर बतिया लो बहुत चलते हो
थक गए होगे,न हो तो थोडा सुस्ता लो
सूरज हंसा और बोला,तुम्हारा शुक्रिया
पर रुक नहीं पाउँगा,मैने फिर से पूछा,
सूरज क्या थकता नहीं कभी तू
कभी नहीं चाहता तेरा मन कि,
आज घर बैठूं थोडा सुस्ता लूँ
चलो आज छुट्टी मै भी मना लूँ??
कभी तो थकता होगा तू भी
अपनी इस अनवरत यात्रा से
कभी तो तेरे घोड़े भी देखते होंगे
आशा भरी दृष्टि से तेरी ओर…
थोडा सा रुकने सुस्ताने को मन नहीं करता क्या?
सुन क्या तेरे घरवाले कभी नहीं चाहते
के तू उनके साथ बिताये पल चार
कोई बात कहे मीठी सी,बच्चो को करे प्यार
सुन के सूरज मुस्काया और बोला
मन कि छोडो,उसकी तो अपार है माया
उसकी लगा सुनाने तो कुछ नहीं हो पायेगा
इतने सालो से जो चल रहा है,मेरा तप टूट जायेगा.
अगर मै रुक गया तो धरती भी रुक जाएगी
रुक जायेंगे ये रात दिन,मौसम,ऋतुये
तब तुम सब कहाँ ठोर पाओगे
अपने लिए नहीं सदैव तुम्हारे लिए चलता हूँ
सर्दी हो या गर्मी बस परोपकार के लिए ही जलता हूँ
सूरज हूँ मै, चलना और जलना यही मेरी नियति है
हम सब को जो चलाती है,सबकी माँ प्रकृति है
अपनी मा के नियम नहीं तोड़ सकता
कुछ भी हो चलना नहीं छोड़ सकता……
रविवार, 5 सितंबर 2010
तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………
तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ
जानती हूँ ये सुनते ही रूठ जाओगे
नज़र चुरा के मुह फेर लोगे चुपचाप
भीतर ही भीतर कहीं टूट जाओगे
सुनो,जानते क्यूँ नहीं मिलना चाहती?
मेरी इस जिद का कारण भी तुम ही हो
तुम से मिलूंगी तो खुद को रोक नहीं पाऊँगी
और दुनियादारी की रिवायते भी तो तोड़ नहीं पाऊँगी
लाख छुपाऊ अपनी बेकरारी, दुनिया वालों से
इन मुई आँखों को कैसे समझाउंगी
दिल की धड़कन अगर छुपा भी लूँ
इन आँखों को कहाँ छुपाउंगी
और तुम भी तो बेकरारी का दरिया हो क्या रोक पाओगे
अपने बेलोस जज़बातों की बाड़ को आने से
जानती हूँ अच्छे से की रोक नहीं पाओगे
खुद को भी रुसवा करोगे,और मुझ को भी बदनाम करके जाओगे
इसीलिए फिर से कहती हूँ मिलने की जिद न करो
तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………
मेरा महबूब ..
इश्क करने का दम भरते है वो जोर शोर से
पर महबूब की इक नज़र भी सह नहीं पाते…

राहे इश्क आसाँ नही समझाया था कई बार
पर महबूब की इक नज़र भी सह नहीं पाते…

राहे इश्क आसाँ नही समझाया था कई बार
पर इश्क की गलियों से दूर वो रह नहीं पाते
शमा की मानिंद जले उनकी याद में शब भर
अब जाने क्यूँ हाल-ऐ -दिल उनसे कह नहीं पाते.
उनके बिना जीना है नामुमकिन मेरे दोस्त
ये जानते है फिर भी उनसे कह नहीं पाते…
ये जानते है फिर भी उनसे कह नहीं पाते…
राहे वफ़ा पे चल तो पड़े है शौक से
पर छोटी सी भी ठोकर वो सह नहीं पाते..
पर छोटी सी भी ठोकर वो सह नहीं पाते..
रुसवाइयों को इश्क का इनाम जानिए
दीवानगी हमारी ये लोग सह नहीं पाते…
दीवानगी हमारी ये लोग सह नहीं पाते…
दिल दर्द से भरा है पर आँखे नहीं गीली,
उन्हें देखने की चाह में अश्क भी बह नहीं पाते.
वो सामने आजाये तो उठती नहीं नज़रे
गर दूर हो तो बिन उनके हम रह नहीं पाते….
गर दूर हो तो बिन उनके हम रह नहीं पाते….
.
जाने किस मोड़ पर खडी है मौत……
अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल,
जाने किस मोड़ पर खडी है मौत……
दस्तक सी देती रहती है हर वक्त दरवाजे पर,
पलकों के गिरने उठने की जुम्बिश भी सिहरा देती है….
धड़कने बजती है कानो में हथगोलों की तरह,
हलकी आहटें भी थर्राती है जिगर ……
लेकिन जिन्दगी है की रुकने का नाम ही नहीं लेती,
दहशतों के बाज़ार में करते है सांसो का सौदा….
टूटती है, पर बिखरती नहीं हर ठोकर पे संभलती है,
पर कब तक ??? कहाँ तक???????
क्यूंकि अब घर से निकलना हो गया मुश्किल
जाने कौन से मोड़ पे खडी है मौत……..
डर से जकड़ी है हवा,दूर तक गूंजते है सन्नाटे…
खुदा के हाथ से छीन कर मौत का कारोबार,
खुद ही खुदा बन बैठे है लोग….
मुखोटों के तिल्लिस्म में असली नकली कौन पहचाने
अपने बेगानों की पहचान में ख़त्म हो रही है जिन्दगी …
अब लोग दूजों की ख़ुशी में ही मुस्कुरा लेते है,
घर जले जो किसी का तो,दिवाली मना लेते है….
खून से दूजों के खेल लेते है होली,
ओढ़ा कर नया कफन किसी को वो ईद मना लेते है……..
क्यूंकि घर से निकलना हो गया है मुशकिल
जाने कौन से मोड़ पर खड़ी है मौत…..
बुधवार, 1 सितंबर 2010
ये बूढा ........
कोमल कली,सुंदर फूल
सोंधी माटी,महकती धूल
मनहर वसंत,शीतल बयार
कोयल की कूक, अपनों का प्यार
सब पास था कि अचानक.........
धमाको कीजैसे घटा घिर गयी,
जीवन से खुशियाँ क्यूँ फिर गयी,
नया सिंदूर, श्रृंगार क्यूँ रूठ गया
माओ की गोदी उजड़ गयी.......
नीरवता अब चीत्कार रही
रोते सियार,गंधाता रक्त
दो शीर्षों की लोलुपता में
लुटा चमन, हुआ सब ध्वस्त...
दो नाली चलती वहां दनदन
माँ की छाती यहाँ छलनी,
तोपों के गोले वहां गिरे,
लुट गयी यहाँ नवेली घरनी....
अब पूछो उन हत्यारों को
देश के कर्णधारों को
कौन माँ कहके बुलाएगा?
कौन राखी का मोल चुकायेगा,
उजड़ी मांगे ये सवाल करे,
उन्हें फिर से कौन सजायेगा...
गीध खड़े चौराहों पर
शाखों पर उल्लू बोल रहे,
इन स्वार्थ के पुतलों की
सच्चाई हम पर खोल रहे...
छै फुट का था लम्बा चौडा
क्या खूब था सजता वर्दी में,
दुलहन ले कर वो आया था
अभी तो पिछली सर्दी में..
छाती पर घाव है गोली के
सो गया भूल हर एक धंधा,
बेटे की अर्थी बूढा कन्धा
दो देशों का गोरख धंधा
आँखे फूटी रो रो करके
भटके दर दर बूढा अँधा
माँ की उजड़ी गोदी पूछे,
मेरा लाल कहाँ से आएगा
दुल्हन की आँखे खाली है
स्वप्न कौन दिखलायेगा
बहनों की राखी रोती है,
भाई अब नहीं आएगा
पिता का एक सवाल खडा
मुखाग्नि देगा कौन मुझे
क्यालावारिस ही मर जायेगा???????????
सोंधी माटी,महकती धूल
मनहर वसंत,शीतल बयार
कोयल की कूक, अपनों का प्यार
सब पास था कि अचानक.........
धमाको कीजैसे घटा घिर गयी,
जीवन से खुशियाँ क्यूँ फिर गयी,
नया सिंदूर, श्रृंगार क्यूँ रूठ गया
माओ की गोदी उजड़ गयी.......
नीरवता अब चीत्कार रही
रोते सियार,गंधाता रक्त
दो शीर्षों की लोलुपता में
लुटा चमन, हुआ सब ध्वस्त...
दो नाली चलती वहां दनदन
माँ की छाती यहाँ छलनी,
तोपों के गोले वहां गिरे,
लुट गयी यहाँ नवेली घरनी....
अब पूछो उन हत्यारों को
देश के कर्णधारों को
कौन माँ कहके बुलाएगा?
कौन राखी का मोल चुकायेगा,
उजड़ी मांगे ये सवाल करे,
उन्हें फिर से कौन सजायेगा...
गीध खड़े चौराहों पर
शाखों पर उल्लू बोल रहे,
इन स्वार्थ के पुतलों की
सच्चाई हम पर खोल रहे...
छै फुट का था लम्बा चौडा
क्या खूब था सजता वर्दी में,
दुलहन ले कर वो आया था
अभी तो पिछली सर्दी में..
छाती पर घाव है गोली के
सो गया भूल हर एक धंधा,
बेटे की अर्थी बूढा कन्धा
दो देशों का गोरख धंधा
आँखे फूटी रो रो करके
भटके दर दर बूढा अँधा
माँ की उजड़ी गोदी पूछे,
मेरा लाल कहाँ से आएगा
दुल्हन की आँखे खाली है
स्वप्न कौन दिखलायेगा
बहनों की राखी रोती है,
भाई अब नहीं आएगा
पिता का एक सवाल खडा
मुखाग्नि देगा कौन मुझे
क्यालावारिस ही मर जायेगा???????????
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