शनिवार, 2 सितंबर 2017

हम आज सच कहें......

क्या सच में चाहते हो कि हम आज सच कहें
सच से तो दूर दूर तक नाता नहीं तुम्हारा.....

तनहाइयों से गहरा नाता जुड़ा हमारा...
जिक्र कही भूले से भी आता नहीं तुम्हारा.
.
अब ज़िन्दगी में कोई दखल नहीं तुम्हारा

बदले है रास्ते जो,अब फिर न मुड़ सकेंगे 

इंतज़ार


कुछ कहना चाहते पर सुनते नहीं वो बात
हम दिल की कह रहे वो है जाने किस ख़्याल में
आँखे तरस गयी मेरी के उनको देख लूँ
उनको नहीं परवाह के हम है किस हाल में
सवालों ने हम को घेरा है इस कदर ऐ दोस्त
के जिंदगी निकल गयी जवाबो की तलाश में
साँसे हमारी डूब रही है फ़िक्र में उनकी
वो मस्त है कहीं दूर दुनियादारी के बवाल में

नक़ाब......

दर्द की हद को जब चाहा महसूस करें
चुनके गुलशन से एक गुलाब तोड़ लिया
लोग समझे के हमने फूल चुने अपने लिए
वो क्या जाने काँटों से नाता जोड़ लिया
दिल के रिसते हुए ज़ख़्म कब दिखाये हमने
रूख-ऐ-रोशन पे लिबास-ऐ-हँसी ओढ़ लिया।(आशा)    

दुनियादारी....

इम्तिहान वक़्त के हज़ार,
हज़ार सितम दुनिया के,
फिर भी टूटती नहीं, 
जाने किस मिट्टी से बनी है ।
कोशिशें लाख की समझाने की,
समझती ही नहीं,
जाने क्यूँ इतनी ढीठ,
इतनी ज़िद्दी, के फिर भी तनी है।
चाहती क्या है आख़िर,
कुछ समझ नहीं आता,
रस्सियाँ जल गयी 

लेकिन बल नहीं जाता,
आज़माती है रोज़ 

क़िस्मत को नए तरीक़े से,
नासमझ है, 

जाने कब समझेगी दुनियादारी!!! (आशा)

बोलो ना .....

कुछ शबनमी ख्वाब,
खारे आंसू,मीठी हंसी 
कुछ शरारत,बांकपन
नजाकत थोड़ी,
थोड़ी नरमी,
नमी मोहब्बत की,
आँखों में छुपा रखी है,
बरसों से
निगेहबानी में तुम्हारी रहे
महफूज़ ये दौलत ता-उम्र
ये दिल की चाहत है......
बोलो क्या संभाल पाओगे?(आशा)


तू तो ऐसा न था.....

ख्वाबों पे तेरे हक हमेशा मानते रहे
तू नींदों से भाग जाने लगा,तू तो ऐसा न था..
तेरे ख्याल से रोशन रहती है जिंदगी
तू चिराग खुद बुझाने लगा,तू तो ऐसा न था...
जी लेते हम ये सोच के,तू हमकदम तो है
तू मुड़ के दूर जाने लगा,तू तो ऐसा न था.....
रूठा नहीं है, मायूस है ये जानती हूँ मैं
पर आँख भी चुराने लगा, तू तो ऐसा न था.....
एक बार कह के देख,तेरे जानिब न आयेंगे
पर बात कब से बनाने लगा,तू तो ऐसा न था...
दिल तेरा दुखा है,कसक मुझ को भी हुयी है
पर अश्क भी छुपाने लगा,तू तो ऐसा न था..(आशा)

घुटन

जब घुटन बढ़ जाती है, 
थम जाती है हवा, रुक 
जाती है थिरकन पत्तों की
घिर जाती है घनघोर घटा
सारी कायनात थम सी जाती है
ज्यूँ साज़िशन किसिने तोड़ दिया
धरती का असमां से रिश्ता
तब बरस जाती है बदरी
लरज़ गरज के झमाझम
और धुल जाती है फ़िज़ा
घुल जाती है घुटन
लहक उठती है धरती
झूम जाता है गगन
ऐसा सावन में अक्सर होता है(आशा

मैं...

  खुद में मस्त हूँ,मलँग हूँ मैं मुझको बहुत पसंद हूँ बनावट से बहुत दूर हूँ सूफियाना सी तबियत है रेशम में ज्यूँ पैबंद हूँ... ये दिल मचलता है क...