शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मैं एक कीमती झाड़-फानूस............



मैं एक कीमती  झाड़-फानूस

हैडिल-विद-केयर का टैग लगाये

बड़े से महल में अकेली खड़ी हूँ

सजाये बदन पर लाखो सितारे

बहुत ऊँचे आसमाँ पर  चढ़ी  हूँ 

बहुत नाज़ुक हूँ, शीशे की बनी हूँ
ज़मी से दूर, बहुत ऊँची टँगी हूँ
चमकती हूँ झिलमिल रोशनी से
जहाँ तक जाये नज़र बस मै ही मै हूँ.....

सभी तकते हैं बड़ी ही आरज़ू से
सभी की चाहतों में बसी हूँ
फ़क़त एक बार छूना चाहते है
मैं इंसा हूँ या कोई परी हूँ

बड़ी शिद्दत से संभाला गया है
बहुत नजाकत से ढाला गया है 
बहुत सा इंतजाम-ऐ-अहतियात 
खातिर मेरी माँगा गया है

घिरी हूँ तामिरगारों की भीड़ में
साँस भी लूँ तो घबराते है
ज़रा सी जुम्बिश से थर्राते है
सारा दिन सर पे मंडराते है 

आह गर निकले कभी जो भूल से 
दौड़ पड़ते हैं सारे,मैडम कुछ लाये  क्या ?
तबियत ठीक है या डॉक्टर बुलवाये क्या?
अजब सी ख़ामोशी से जब ताकती हूँ तो ,
डर जाते हैं, और सीधा साहब को फ़ोन लगाते हैं ..........आशा 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

यूँही आज कल

यूँही आज कल पता नहीं कहाँ हूँ खोई सी
अलसायी सी जिंदगी उबासी ले रही है ।
क्यों उँगलियाँ इतनी अशक्त लगने लगी हैं
कलम भी उठाना भारी  हो गया आज कल ।
सोचों पर भी पड़े हैं ताले, सन्नाटे गूंज रहे है
किसी अनजान सी राह पर डगमगाते कदम ।
दिमाग में बज रहा कोई अधूरा गीत बेआवाज़
धुंध सी छायी हैचारों ओर, उलझा सा है  मन । 
धुंधलायी सी नज़रें गुमनाम ख़ामोशी लबों पर
यूँ के जैसे मदहोश दीवानगी के आगोश में गुम
कोई मुसाफिर भटकता फिर रहा हो वीराने में ।
मन की अँधेरी गुफा में गुर्राते हैं अनगढ़ ख्याल
और भागती  फिर रही हूँ कान में उंगली दिये।
ऐसा क्यों है मत पूछना, मुझे खुद नहीं पता ।
तुम समझ पाओ तो मुझको भी बताना प्लीज। … आशा