गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

अक्सर सोचती हूँ...

स्वप्न कब सार्थक होते है?

अक्सर सोचती हूँ

हर बार प्रश्न अनुत्तरित ही रहता है

क्या तुम बता सकते हो?

कोई तरकीब इन स्वप्नों को

सार्थक करने की...

जो अनघड विचार घूमते है

अंतर्मन की कैद में,

स्वच्छन्द विचरण करने देने की

कोई भी एक तरकीब यदि हो

बताओ ना

बहुत आभारी रहूंगी...



उन्हें रिहा करके

नए ढंग, नए आकार में

फिर ढाल नयन में भर लूंगी

तुम भी चलना चाहो तो चल सकते हो

मेरी अनवरत स्वप्न यात्रा पर

साथ साथ मेरे

लेकिन शर्त एक है

ना रोकना,ना टोकना

बस होके मौन,विचरना

महसूस करना उनकी

कोमल संवेदनाओ को

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

यादों के ऊँचे बबूल.....

यादों के ऊँचे बबूल उग आये है दिल की पथरीली जमीन पर
साया ढूँढती  हसरते,तड़पते जज़्बात,चुनते है ख़ार अब दिन रात

जिक्रे मोहब्बत जो कभी होता है कहीं,ख़ामोश लौट आते है बज़्म से
सिहरा सा गुजरता है वो दिन,बहुत थर्राती है वो रात

खुद ही बना लिया नामालूम सा जहान,भटकते रहते है हर पल
खोजते फिरते है खुद को,अजनबी हर है शै,उलझी हुयी हर बात

एक खुदा हो तो इबादत करे कोई, उलझन बड़ी है समझे कहाँ कोई
किसको अब सजदे करे किसको खुदा कहे,बड़े मुश्किल से है हालत

तू बेवफा है की बावफा,क्यूँ सोचूं रात दिन,पालू क्यूँ ये फितूर
मेरी मोहब्बत की तासीर अलग,सनम तेरे जुदा से है हालत

तन को बनाया मोम,और खुद को गला दिया
जलते रहते हैं सनम, शम्मा की मानिंद सारी रात

तू अपनी धुन में मस्त,हम तेरी फिकर में हैं  गुम
तन्हा यहाँ है हम तू जाने कहाँ बसर करके आया रात

दस्ताने मोहब्बत अपनी बस इतनी सी है ऐ सनम
तू जहर दे तेरी ख़ुशी,चाहे पिला दे आब-ऐ-हयात....

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

मेरा प्यारा सा कमरा……..

पहाड़ी नदी सी,गुनगुनाती


मुस्कुराती,थोडा शर्माती,

अल्हड,नखरीली सी,थोड़ी हैरान

जब मै उससे मिली थी बरसों पहले

लगा जैसे वो धीरे से मुसकाया था

जब छुआ था होले से उसे मैंने

उसमे नया सा एक रंग नज़र आया था

किया था उससे वादा कभी छोड़ के न जाउंगी

खुशियों के हरेक रंग से उसको सजाउंगी

उसने भी ली थी सौगंध उस दिन

हर पळ साथ निभाऊंगा

खुशियाँ हो या ग़म

तेरे साथ ही बिताऊंगा

हम दोनों थे हमराज,दिन रैन के थे साथी

मेरा वो प्यारा कमरा,जैसे दिया और मै बाती…….

बरसों बिताये संग संग,हमराज वो मेरा था

मल्लिका थी उसकी मै,वो मेरी सल्तनत था.

दिल की हरेक बात,हरेक आह,हरेक चाह

सबसे छुपा कर,चुपके से उसको ही तो बताया

और उसने भी सब कुछ अपने में ही छुपाया

फ़िर तोड़ सारे वादे मै उसको छोड़ आई

एक नए से घर में दुनिया नयी बसाई

वो फ़िर भी रहा मेरा,मै उसकी न रह पाई………

आज बरसों बाद फ़िर याद वो आरहा है

मेरा प्यारा सा कमरा मुझ को बुला रहा है

दिन आखरी वो अपने घर में बिता रहा है

मेरे बचपन के पलों को थपकी दे सुला रहा है

कल टूट जायेगा वो,नामोनिशां भी न रहेगा

पर करती हूँ सच्चा वादा,दिल के कोने में सदा जियेगा…

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

मै एक इमारत.........

मै एक इमारत ना नयी,ना बहुत पुरानी
निस्पंद खड़ी हूँ निबड़ अकेले निर्जन में,

अपने वजूद को तलाशती सी,

खुद को ही कब से पुकारती सी…

अपनी नींव से गहरे जुडी हूँ मै,

या यूँ कह लो बन्धनों में पड़ी हूँ मै..

न कही आ-जा सकती हूँ,न चाहती हूँ

अपने में ही गुम खुद को तलाशती हूँ.

आते जाते हुए लोगों को देखा करती हूँ

हर दिन नए सपने तराशती हूँ..

रोज ख़त्म हो रही है मियाद मेरी

सुनता नहीं कोई फरियाद मेरी..

अपने को ही किसी तरह संभालती हुयी

गुजरे वक़्त को यादों के आईने में निहारती हुयी

खड़ी हूँ जाने कब से तनहा,अलसाई सी,उकताई सी

वक़्त की हर अदा को देखती और सराहती हुयी..

जो थे वाशिंदे मेरे,बहुत ही प्यारे थे,

मै उनकी पसंद थी या….., जानती नहीं

पर वो सारे ही मेरे दुलारे थे.

छोड़ गये जाने क्यूँ मुझ को सभी

क्या बेवफा वो सारे थे??????

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

बताओ ना..

रोज सुबह जब सूरज उगता है

याद आता है मुझे तुम्हारा शरारत से मुस्काना
धीरे से कहना मेरे कानो में,सुनो
तुम जो भी रंग पहनती हो
झलकता है तुम्हारे चेहरे पर

जब पहनती हो गुलाबी साड़ी
जानती हो, तुम खुद गुलाब हो जाती हो
और उस दिन में बाग़ में नहीं जाता...

जिस दिन तुम पहनती हो पीली साड़ी
सूरज मुखी सी दिखती हो
और मै सूरज की तरह दमकता हूँ

नीली साड़ी में तुम
सावन की बदरी लगती हो
और मै आसमान बन के
समेट लेता हूँ,बांहों में तुम्हे

धानी रंग में तुम
हरी भरी धरती हो जाती हो,
मेरा घर आँगन महकता है तुमसे
तुम से ही जीवन में रंग है मेरे...

तुम्हारी ये बाते मुझे जाने क्यूँ
बहकाती आई है हमेशा,और मै
लहकती फिरती हूँ
तुम्हारे प्यार की खुमारी में

कोई भी रंग चुनने से पहले देखती हूँ
तुम्हारी आँखे आज
क्या देख कर नशीली होंगी

क्या पहनू की तुम
बेसाख्ता बाहों में भर लो मुझे
और कहो फिर से
मेरी मौसम परी तुम ही से बहार है

मै खुद ही ये सोच कर
शर्मा जाती हूँ,और फिर
अचानक मेरा हर रंग
जाने कैसे सिंदूरी हो जाता है
क्या तुम जानते हो इस राज़ को?
बताओ ना..

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ज्वालामुखी..........

जब कभी लगने लगता है

बस अब सब ठीक है

शांति है चारो ओर

ना कोई कोलाहल

ना कोई बैचैनी

ना कोई शोर,

तभी अचानक

जाने कैसे फट पड़ता है

कोई सुप्त ज्वालामुखी

और बहा ले जाता है

हर ख़ुशी,हर हंसी

अपने उबलते लावे से

झुलसा देता है,सब

कलियाँ कुम्हला जाती है

पंछी भूल जाते है उड़ना

रन-बिरंगी तितलियाँ भी

फिर कहाँ नज़र आती है

आज फिर सब ओर शांति है

ना कोई कोलाहल,ना कोई शोर

खिली है कलियाँ,तितलियाँ भी है

पंछी उड़ रहे है डाल डाल

लगता है फिर कहीं दूर

धरती की कोख में

अंगडाईयां ले रहा है

खौल रहा है कोई,ज्वालामुखी..........

सोमवार, 27 सितंबर 2010

कल बदल तो नहीं जाओगे??

तुम सदेव रहोगे पास,
दे कर ये विश्वास,सच कहो,
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?
मेरे ह्रदय की वीणा के तार
...करते है मधुर पुकार

प्रेम की मीठी गुंजार
पायल की झंकार
सब तुम से है प्रियतम
सच कहो आज इक बार
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?
संदेह का ये बादल
बन नाग डसे हर पल
जाने क्या होगा कल
क्यूँ जीवन में है हलचल
सच कहो आज इक बार
कहीं छल तो नहीं जाओगे,
कल बदल तो नहीं जाओगे?

रविवार, 26 सितंबर 2010

चुपके से ...........

धूप का इक उजला सा टुकड़ा 
आंगन में उतरा चुपके से 
आँख का आंसू मोती बनके 
गालो पर ढलका चुपके से 
फूलों की खुशबु ले हवा चली,  
चली मगर बिलकुल चुपके से 
भवरो ने भी रस की गागर  
छलकायी लेकिन चुपके से 
मन का पंछी दूर गगन में 
उड़ता फिरता,पर चुपके से
मेरे नैना तुझको तकते,
बने चकोर मगर चुपके से
तेरी यादे रहती संग में
हरदम करती तंग चुपके से
राते तारे गिन-गिन काटी   
चाँद जला संग में चुपके से
बादल के संग आँखे रोई
सावन भी रोया चुपके से 
हमने तेरी हर बात कही
रातो में तकिये को चुपके से
तू क्या रातों को सोता है?
जाग रही हूँ मै चुपके से
नींद अगर आएगी मुझको 
तुम तब ख्वाबो में आना,सुनो मगर आना चुपके से....

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

विरह वेला……………


स्वप्न सजे जिन आँखों में,तुम कैसे उनको मून्दोगी
प्रिय जब मै समीप न हूँ,सच कहना क्या तुम रो दोगी?
मोती जो ढलके गालों पर,उनका तुम हार बना लेना
जब वापस लौट के आऊं,जयमाल सा मुझे पहना देना
तेरी सारी पीड़ा को मै,ह्रदय में अपने छुपा लूँगा
अधरों पर तेरे बरबस ही मुस्कान के फूल खिला दूंगा..
तुम विरह को समझो तप अपना मै वरदानों सा आऊंगा
आंचल में तेरे दुनिया भर की खुशियाँ मै रख जाऊंगा…
बस कुछ दिन और प्रिये तुम को ये विरह की पीड़ा सहनी है
फिर तो जीवन भर जीवन में मधुमास की वेला रहनी है..

ये ही तो प्यार होता है…




जानते हो तुम जब भी रूठ जाते हो
उस वक़्त मेरा क्या हाल होता है
साँस चलती है पर,जीते जी मर जाती हूँ
पर सच कहो क्या तुम को करार होता है.
दम सा घुटता है, हर पल बेक़रार रहती हूँ
तुमको भी तो अज़ब सा खुमार होता है
सारी कोशिशे होती है तुम्हे मानाने की
तुम को भी तो इसका ही इंतजार होता है
रात को जो नींद मेरी उड़ाती है तो
सपनो पे तुम्हारे भी तो वार होता है
मौन की कैद में गर मै छटपटाती हूँ
मूक उस वक़्त तुम्हारा भी तो संसार होता है
तेरी हलकी सी हंसी से मै खिल उठती हूँ
मेरे मुस्कुराने का तुम्हे भी तो इंतजार होता है
जब जानते हो सब तो रुठते क्यूँ हो?????
लोग कहते है की ये ही तो प्यार होता है…

सोमवार, 20 सितंबर 2010

जिंदगी मान लिया तुझको ऐ यारा हमने ....


बेसबब नही तेरे साथ वक़्त गुज़ारा हमने
लम्हा लम्हा अपना ऐसे भी सँवारा हमने


माना की बेवफा है तू फिर भी जाने क्यूँ
जिंदगी मान लिया तुझको ऐ यारा हमने 


दोस्त बनके वफादार हो जाये ये मुमकिन है...
यही सोच कर तुझे फिर से पुकारा हमने 


प्यार के नाम पर दुनिया करती है सौदा...
इसलिए दोस्ती के रिश्ते को संवारा हमने 


तू हमेशा सोचता है बस  खुद की ही तरह 
सोचने को तेरे एक नया अंदाज़ उभारा हमने 


जानते है कि हम नहीं मिलेंगे कभी फिर भी 
 क्यूँ किया वस्ल का सौ बार इशारा हमने 


दिल ही तो है आखिर, कर बैठा  नादानी 
बड़ी मुश्किल से  इसे, मुश्किलों से उबारा हमने 


आइने में भी दिखता है हमे अक्स तेरा अब तो... 
मुद्दतों  से कहाँ खुद को निहारा हमने....
.

वृक्ष तुम ऐसे क्यूँ हो?

वृक्ष तुम ऐसे क्यूँ हो? बोलो ना,

जैसे समाधिस्त कोई जोगी

झूमता भक्ति के रस में

या फिर कोई भोगी

लहकता रहता मद में



अपनी ही धुन में रहते हो

कोई सींचे तुम्हे प्यार से

तुम निस्पृह खड़े रहते हो

मार के पत्थर कोई राह में

तोड़ डाले फल तुम्हारे

उसको भी कहाँ कुछ कहते हो



काट डाले शाखे तुम्हारी

छिन्न -भिन्न कर दे

ख़ाल तुम्हारी नोच ले

तुम को जख्म दे

चुप चाप सहे जाते हो

कोई विरोध,जरा सा भी क्रोध

क्यूँ नहीं आता तुम्हे

बेपरवाह खड़े रहते हो



काट दे गर तन को तुम्हारे

फिर से क्यूँ उग आते हो

देने को इन नाशुक्रो को

फिर से फल, औषधि,छाया

जाने क्या है तुम्हारे दिल में

अब तक समझ न आया

क्यूँ इतना परोपकार करते रहते हो



सुनो वृक्ष ये जग बड़ा स्वार्थी

नहीं समझेगा तुम्हारा प्रेम

तुम्हारी भावना,व्रत और नेम

सुनो थोड़े से स्वार्थी हो जाओ

वरना ये सब मिल कर

अस्तित्व तुम्हारा मिटा देंगे

भूल जायेंगे तुम्हारे उपकार

तुम्हे जड़ से ही मिटा देंगे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

दूब

सुनो मै दूब हूँ,हरी भरी
धरती की गोद में,सुरक्षित
तुम रोज़ मुझे रोंदते हो
अस्तित्व मेरा मिटाने
 को जाने कितनी बार
जड़ मेरी खोदते हो
पर मै फिर उग आती हूँ
तुम क्यूँ नहीं समझते
पेड़ों  को काटना आसान
दूब को मिटाना नामुमकिन
तुम जितना मिटाओगे
मै फिर से  उग आउंगी
नयी आभा,नया रूप लिए
सहने को तुम्हारी नफरत
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित
अभिमान नहीं मुझ में तनिक भी
सब के सामने झुक जाती हूँ
पर अपने मन की व्यथा
कहाँ किसी को बताती हूँ
चुप रहना, सब कुछ सहना
नियति मेरी, स्वाभाव मेरा
लेकिन फिर भी सुनो नादाँ
सह नहीं पाओगे अभाव मेरा
मै तपस्विनी, तप मेरा जीवन
परोपकार से ही खुश रहती हूँ
जितना चाहे काटो छांटो मुझको
कुछ कहाँ किसी को कहती हूँ
पर सुनो जितना भी काटोगे
उतनी तेजी से उग आउंगी
तुम लाख करो जतन मिटाने का
छोड़ कभी ना जाउंगी
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित
धरती मेरी माँ जैसी
हर सुख दुःख की साथी है
सब रोंद गए और छोड़ दिया
पर माँ क्या छोड़ के जाती है?
तन से मन से हम जुड़े हुए
तुम कैसे मुझे मिटाओगे
प्रयत्न तुम्हारे सब निष्फल
हर और मुझे ही पाओगे
क्यूंकि मै दूब हूँ हरी भरी
धरती की गोद में सुरक्षित.......

सोमवार, 13 सितंबर 2010

मेरी कविता...जीवन मेरा




कवितायेँ मेरी जीवन मेरा,
कविताओ में ही जीती हूँ
शब्द पहनती,ओढ़ती हूँ
भावो को खाती पीती हूँ

सुख, दुःख की संगी साथी
कविताये मेरी सब कुछ है 
ये जीवन की गति मेरी
आधार न मेरा अब कुछ है  

मेरे आंसू,मेरी आहे
मुस्काने,मेरी चाहे
सब कविताओ में ढलते है 
सब खट्टे मीठे पल मेरे  
कविताओ में ही पलते है

जब टीस कोई तडपाती है
एक कविता बन जाती है
आंसू के मोती चुन चुन के 
सुन्दर माला गूँथ जाती है

खुशियों के फूल जो खिलते है
कविताओ में ही चुनती हूँ
जो भी जी में आजाये बस
कविताओ में ही बुनती हूँ

मेरे सुन्दर कोमल सपने
बेलोस यहाँ पर बढ़ते है
मेरे सारे अनघड अरमां
परवान यहीं पर चढ़ते है

ढूंढे कोई मुझ को गर
कविताओ में ही मिलती हूँ
अपनी हर बिखरी याद को
कविताओ में ही सिलती हूँ

कविता मेरी धड़कन जैसी
रुक जाएँ, मै रुक जाउंगी
कविता मेरा अंतिम ठौर 
अब और कहाँ मै जाउंगी






सोमवार, 6 सितंबर 2010

दिल के शहर में आज………

दिल के शहर में आज


बरसी नयनो की बदरी

सूखा ख़तम हो गया

सब धुला धुला साफ़ साफ़

सब का किया धरा दिल से माफ़

काट छाँट रही हूँ,खरपतवार

चुन चुन के फ़ेंक रही हूँ सारे

गिले, शिकवे, शिकायतें

और तोड़ दी नफरतों की दिवार

अब हसरतों ने नयी शक्ल इख़्तियार की है

सपनों की नयी फसल हमने तैयार की है

एक नया आफताब टांग लिया

थोडा सा साफ़ आसमान मांग लिया

उजाले फिर से फैल गए

अब फूल खिलेंगे…….क्यूंकि,

दिल के शहर में आज

बरसी नयनो की बदरी

सूखा ख़तम हो गया

तुम बिन ………

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन


एकाकी,अधूरी सी,मुरझाई सी,श्रापग्रस्त

अप्सरा सी जो अपना बनवास काट रही है..

तुमको सोचती तुमको महसूस करती हुयी

तनहा स्याह रातों के अकेलेपन से लडती

अपनी नियति को कोसती,किसी तरह

अपना समय बिताती हूँ,दिन तो कट जाता है

पर रात से डर जाती हूँ ,स्वप्न में देखती हूँ प्रिय तुम को

कल्पनो में तुम को लाती हूँ,तुम पास लगते हो

कभी समझ के तकिये को तुम,शर्मा जाती हूँ

तो कभी झगड़ने लगती हूँ इस कदर की मत पूछो

सारे गिले शिकवे उसे सुनती हूँ,और कभी

समझ के तुम्हारा चौड़ा सीना,उसमे सिमट जाती हूँ

पर जब टूटता है स्वप्न,नयन भर जाते है

कुछ अटक सा जाता है,साँस भी रुकने लगती है

दिल की धड़कन बहुत जोर से बजती है

तनहाइयाँ बन के नाग मुझ को डसती है और मै,

फिर से खो जाती हूँ विरह की गहरी कन्दरा में क्यूंकि,

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन ………

सूरज ……

एक दिन रोक के रास्ता सूरज का,धीमे से

मैंने कहा,एक बात कहूँ बुरा तो न मानोगे

क्यूँ नहीं थोडा बैठ लेते इस बरगद कि छाँव

थोड़ी ही दूर पे है मेरा भी गाँव,रुको

कुछ देर बतिया लो बहुत चलते हो

थक गए होगे,न हो तो थोडा सुस्ता लो

सूरज हंसा और बोला,तुम्हारा शुक्रिया

पर रुक नहीं पाउँगा,मैने फिर से पूछा,

सूरज क्या थकता नहीं कभी तू

कभी नहीं चाहता तेरा मन कि,

आज घर बैठूं थोडा सुस्ता लूँ

चलो आज छुट्टी मै भी मना लूँ??

कभी तो थकता होगा तू भी

अपनी इस अनवरत यात्रा से

कभी तो तेरे घोड़े भी देखते होंगे

आशा भरी दृष्टि से तेरी ओर…

थोडा सा रुकने सुस्ताने को मन नहीं करता क्या?

सुन क्या तेरे घरवाले कभी नहीं चाहते

के तू उनके साथ बिताये पल चार

कोई बात कहे मीठी सी,बच्चो को करे प्यार

सुन के सूरज मुस्काया और बोला

मन कि छोडो,उसकी तो अपार है माया

उसकी लगा सुनाने तो कुछ नहीं हो पायेगा

इतने सालो से जो चल रहा है,मेरा तप टूट जायेगा.

अगर मै रुक गया तो धरती भी रुक जाएगी

रुक जायेंगे ये रात दिन,मौसम,ऋतुये

तब तुम सब कहाँ ठोर पाओगे

अपने लिए नहीं सदैव तुम्हारे लिए चलता हूँ

सर्दी हो या गर्मी बस परोपकार के लिए ही जलता हूँ

सूरज हूँ मै, चलना और जलना यही मेरी नियति है

हम सब को जो चलाती है,सबकी माँ प्रकृति है

अपनी मा के नियम नहीं तोड़ सकता

कुछ भी हो चलना नहीं छोड़ सकता……

रविवार, 5 सितंबर 2010

तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………


तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ


जानती हूँ ये सुनते ही रूठ जाओगे

नज़र चुरा के मुह फेर लोगे चुपचाप

भीतर ही भीतर कहीं टूट जाओगे

सुनो,जानते क्यूँ नहीं मिलना चाहती?

मेरी इस जिद का कारण भी तुम ही हो

तुम से मिलूंगी तो खुद को रोक नहीं पाऊँगी

और दुनियादारी की रिवायते भी तो तोड़ नहीं पाऊँगी

लाख छुपाऊ अपनी बेकरारी, दुनिया वालों से

इन मुई आँखों को कैसे समझाउंगी

दिल की धड़कन अगर छुपा भी लूँ

इन आँखों को कहाँ छुपाउंगी

और तुम भी तो बेकरारी का दरिया हो क्या रोक पाओगे

अपने बेलोस जज़बातों की बाड़ को आने से

जानती हूँ अच्छे से की रोक नहीं पाओगे

खुद को भी रुसवा करोगे,और मुझ को भी बदनाम करके जाओगे

इसीलिए फिर से कहती हूँ मिलने की जिद न करो

तुम से मिलाना नहीं चाहती हूँ………

मेरा महबूब ..

इश्क करने का दम भरते है वो जोर शोर से
पर महबूब की इक नज़र भी सह नहीं पाते…


राहे इश्क आसाँ नही समझाया था कई बार
पर इश्क की गलियों से दूर वो रह नहीं पाते

शमा की मानिंद जले उनकी याद में शब भर
अब जाने क्यूँ हाल-ऐ -दिल उनसे कह नहीं पाते.


उनके बिना जीना है नामुमकिन मेरे दोस्त
ये जानते है फिर भी उनसे कह नहीं पाते…
राहे वफ़ा पे चल तो पड़े है शौक से
पर छोटी सी भी ठोकर वो सह नहीं पाते..
रुसवाइयों को इश्क का इनाम जानिए
दीवानगी हमारी ये लोग सह नहीं पाते…
दिल दर्द से भरा है पर आँखे नहीं गीली,
उन्हें देखने की चाह में अश्क  भी बह नहीं पाते.
वो सामने आजाये तो उठती नहीं नज़रे
गर दूर हो तो बिन 
उनके हम  रह नहीं पाते….

.

जाने किस मोड़ पर खडी है मौत……


 अब घर से निकलना हो गया है मुश्किल,

जाने किस मोड़ पर खडी है मौत…… 

दस्तक सी देती रहती है हर वक्त दरवाजे पर,
पलकों के गिरने उठने की जुम्बिश भी सिहरा देती है….
धड़कने बजती है कानो में हथगोलों की तरह,
हलकी आहटें भी थर्राती है जिगर ……
लेकिन जिन्दगी है की रुकने का नाम ही नहीं लेती,
दहशतों के बाज़ार में करते है सांसो का सौदा….
टूटती है, पर बिखरती नहीं हर ठोकर पे संभलती है,
पर कब तक ??? कहाँ तक???????
क्यूंकि अब घर से निकलना हो गया मुश्किल 
जाने कौन से मोड़ पे खडी है मौत……..
डर से जकड़ी है हवा,दूर तक गूंजते है सन्नाटे…
खुदा के हाथ से छीन कर मौत का कारोबार, 
खुद ही खुदा बन बैठे है लोग….
मुखोटों के तिल्लिस्म में असली नकली कौन पहचाने
अपने बेगानों की पहचान में ख़त्म हो रही है जिन्दगी …
अब लोग दूजों की ख़ुशी में ही मुस्कुरा लेते है,
घर जले जो किसी का तो,दिवाली मना लेते है….
खून से दूजों के खेल लेते है होली,
ओढ़ा कर नया कफन किसी को वो ईद मना लेते है……..
क्यूंकि घर से निकलना हो गया है मुशकिल 
जाने कौन से मोड़ पर खड़ी  है मौत…..


बुधवार, 1 सितंबर 2010

ये बूढा ........

कोमल कली,सुंदर फूल
सोंधी माटी,महकती धूल
मनहर वसंत,शीतल बयार
कोयल की कूक, अपनों का प्यार
सब पास था कि अचानक.........

धमाको कीजैसे घटा घिर गयी,
जीवन से खुशियाँ क्यूँ फिर गयी,
नया सिंदूर, श्रृंगार क्यूँ रूठ गया
माओ की गोदी उजड़ गयी.......

नीरवता अब चीत्कार रही
रोते सियार,गंधाता रक्त
दो शीर्षों की लोलुपता में
लुटा चमन, हुआ सब ध्वस्त...

दो नाली चलती वहां दनदन
माँ की छाती यहाँ छलनी,
तोपों के गोले वहां गिरे,
लुट गयी यहाँ नवेली घरनी....

अब पूछो उन हत्यारों को
देश के कर्णधारों को
कौन माँ कहके बुलाएगा?
कौन राखी का मोल चुकायेगा,
उजड़ी मांगे ये सवाल करे,
उन्हें फिर से कौन सजायेगा...

गीध खड़े चौराहों पर
शाखों पर उल्लू बोल रहे,
इन स्वार्थ के पुतलों की
सच्चाई हम पर खोल रहे...

छै फुट का था लम्बा चौडा
क्या खूब था सजता वर्दी में,
दुलहन ले कर वो आया था
अभी तो पिछली सर्दी में..

छाती पर घाव है गोली के
सो गया भूल हर एक धंधा,
बेटे की अर्थी बूढा कन्धा
दो देशों का गोरख धंधा
आँखे फूटी रो रो करके
भटके दर दर बूढा अँधा

माँ की उजड़ी गोदी पूछे,
मेरा लाल कहाँ से आएगा
दुल्हन की आँखे खाली है
स्वप्न कौन दिखलायेगा
बहनों की राखी रोती है,
भाई अब नहीं आएगा
पिता का एक सवाल खडा
मुखाग्नि देगा कौन मुझे
क्यालावारिस ही मर जायेगा???????????

सोमवार, 30 अगस्त 2010

पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?



पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?
भूल गयी मै तबसे हंसना
आँख रोज भर आती है
सच कहती हूँ पापा,एकदम
पंजीरी अब नहीं भाती है
मिल न पाऊ,मै अब तुमसे
हो कितने हम मजबूर गए
पापा क्यूँ तुम मुझसे दूर गए?
क्या याद नहीं आती मेरी
क्यूँ भूल गए अपनी लाडो को
देख नहीं सकते थे जिसको,गुमसुम
उसको रोता कैसे छोड़ गए
पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?
कोई नहीं सुनता मेरी ज़िद
जैसे पापा तुम सुनते थे
मेरी रहो के कांटे भी
तुम पलको से चुनते थे
क्यूँ छोड़ अकेला मुझे दिया
क्यूँ तोड़ के हर दस्तूर गए
पापा तुम मुझसे क्यूँ दूर गए?
कितनी सुन्दर दिखती थी माँ
बड़ा सा टीका एक लगाती थी
भर हाथ पहने थी चूड़ियाँ
तुम को वो कितना भाती थी
माँ की टूटी सभी चूड़ियाँ
ले माँ का क्यूँ सिंदूर गए
पापा तुम क्यूँ मुझसे दूर गए?

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता ....

कल की खबर थी की सुप्रीम कोर्ट  में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया की उनको उत्तर प्रदेश में हो रहे स्मारकों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं है| खबर सुन कर थोड़ी देर सोचों में पड़ गयी,और फिर समझ आया की भाई उन्हें आपत्ति हो भी तो क्यूँ कर हो|

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता की मायावती जी नॉएडा को या लखनऊ के  हरे भरे बागों को पत्थर के हाथियों से पाट दें, अथवा अपनी और अन्य   महापुरुषों की मूर्तियों से सजा कर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दे| जी हाँ उन्हें फर्क भी पड़े तो क्यूँ पड़े,वे तो आकर रहने वाले है नहीं वहां|  उनके लिए तो नयी दिल्ली के विशिष्ट स्थान घने पेड़ों की छाँव में आरक्षित है| उन्हें फर्क पड़ता है तो बस इस बात से कि,कहीं मायावती जी रूठ गयी तो अगले चुनावो में  मुश्किलें बढ़ जाएँगी...

फर्क पड़ता है तो हम जैसे आम लोगों को पड़ता है| जिनकी मेहनत कि कमाई टैक्स के रूप में लेकर ये पत्थर के मसीहा  खड़े किये जा रहे है| फर्क पड़ता है तो हमे पड़ता है जिनके बच्चों के घूमने और खेलने कि जगह छिन  कर ये पथरीले लोग बैठा दिए गए है|

अब भी कल कि सी बात लगती है,जब दुल्हन बन  नॉएडा आई थी......यहाँ कि हरियाली, खुला सा माहौल, बड़े बड़े उद्यान,पक्षी विहार और प्रदुषण से मुक्त हवा....यूँ लगा जैसे सपना जी रही हूँ| हाँ ये ठीक है कि सुविधाए थोड़ी कम थी लेकिन, वो इतना नहीं खलती थी| सुबह कि स्वच्छ हवा,साँझ  की ताज़ी पवन , किल्लोल करते रंग बिरंगे पंछी....मोर उड़ कर घर की मुंडेरों पर बैठ जाते थे|

जब बच्चे हुए तो उन्हें लेके अक्सर हम नंदन कानन, चले जाते थे वहां बने शेर ,चीतों के आकार देख कर बच्चे खूब खुश होते थे| इतने सुंदर और बड़े उद्यान में घूमते, खेलते वक़्त कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था|सुंदर फूलों की छठा अदभुद  अहसास जगाती थी|कभी कभी हम कालिंदी कुञ्ज भी जाया करते थे|कल कल करती यमुना और खुबसूरत नज़ारे|अब सब यादों में ही रह गया लगता है|
अब तो जैसे ही सेक्टर -१५ के करीब आईये ,शक सा होने लगता है की आप नॉएडा में है या जयपुर की सैर पर निकले है| लाल पत्थरों  की चारदीवारी में घिरा नंदन कानन अपने खंडित रूप पर लज्जित सा चुपचाप सर झुकाए दिख जाता है| बड़ी बड़ी मूर्तियाँ आवरण ओढ़े  खड़ी दिखती है| हालाँकि शिल्प कला का अदभुद दर्शन है ये स्मारक |

पत्थर के अनगिनित खम्भों पर अशोक की लाट के शेरों  की तरह हाथी दिखते है| बच्चो ने पूछा तो कह दिया बेटा ये बहन जी की लाट है| अब और कहूँ भी तो क्या कहूँ? 
इस जगह से निकलते हुए नाक पर रुमाल रख लेती हूँ ......अरे नहीं बदबू नहीं है...ये तो वो धूल है जो पत्थरो की कटाई और इमारती सामान से उठ रही है| आस पास के पेड़ भी अपनी आन सी खो रहे है| और इसके ठीक पीछे जो पक्षी विहार है,वह भी इसके दुश्प्रवाभव्  से अछूता नहीं है| हर सर्दी में हजारों विदेशी पंछी मीलों की यात्रा पूरी  करके यहाँ आया करते थे,और उस समय यहाँ की छठा ही निराली होती थी| तरह तरह के पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था|देशी विदेशी पंछियों की चहचाहट से पक्षी विहार गूंजता रहता था| घंटो बीत जाते थे पर मन नहीं भरता था| अक्सर हमलोग वहां घूमने जाया करते थे|
लेकिन इस सब धूल-धक्कड़ ,प्रदूषण के चलते वर्ष दर वर्ष उनकी संख्या भी घटी ही जा रही है| कितनी मधुर यादे है,अब भी कभी जाते है तो वहां का सूनापन  अजीब सी उदासी भर जाती है मन में|पर्यावरण विद लाख शोर मचाये,इस नक्कार खाने में उनकी आवाज किसको सुनाई दे रही है|  
  
अब इस दर्द को कोई और कैसे समझ सकता है.....ये तो हमारा दर्द है जिसे हम चुपचाप सह रहे है| केंद्र हो या राज्य सरकार, कोई भी कैसे इन भावनाओ को समझ पायेगे...क्यूंकि ये भाव तो किसी अपने की टूटन को बेबस हो के देखते रहने की मज़बूरी वाले है, और सरकारे कभी मजबूर नहीं हुआ करती.....   

शनिवार, 14 अगस्त 2010

जाने क्यूँ बारिश की बूंदे

जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे
जैसे ही बादल घिरते है
पागल सी हो जाती हूँ
निकल पड़ती हूँ,जाने क्यूँ
सारे काम धाम भूल समेटने
आंगन में गिरती बूंदों को
और खो जाती हूँ रिमझिम फुहारों में
एक नशा सा तारी रहता है
भूल जाती हूँ सब कुछ
अच्छा-बुरा,सही-गलत,
झूम उठती हूँ,बौरा जाती हूँ..
जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे
सब कहते है अब क्या बच्ची हो?
उन्हें कैसे समझाउं,दिल का बचपना
जो कभी गया ही नहीं,या जाने नहीं दिया
आज भी वो अल्हड,नटखट लड़की
जीती है,दिल के किसी कोने में
जो भीगना चाहती है,तब तक
जब तक बादल का दामन खाली न हो जाये
छप-छप करना चाहती है,जमा हुए पानी में
कागज़ की नाव भी तैराना चाहती है
भरना चाहती है अपनी अंजुरी में आसमान
आँखों से पी लेना चाहती हूँ
जाने क्यूँ बारिश की बूंदे
दीवाना कर देती है मुझे..

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सावन तुम्हारी नक़ल करता है..

घनघोर घटा,सुरमई उजाला
धीमा सा माहोल,हलकी सी खुमारी
मौसम की रग़ रग़ में नशा है..
वैसे ही जैसे तुम अपनी मीठी मुस्कान
खामोश प्यार,और बेताब निगाहों से
भर देते हो मेरी रग़ रग़ में नशा
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर की
सावन तुम्हारी नक़ल करता है..
हलकी फुहारे जब भिगोती है तन
तपन हर लेती है तन और मन की
तेरी हर अदा मिलाती है सावन से
तू भी तो भिगोता है मुझे धीमे धीमे
अपने प्यार की बरखा में हर बार
और मै खोयी रहती हूँ बेहोश.....
सच कहो ना,ऐसा क्यूँ लगता है
जैसे तुम बादल बन के छाये हो मुझ पर
और मै प्यासी धरा तुम को पी रही हूँ
तुम में ही खो कर खुद को जी रही हूँ
जब से मिले हो रिमझिम फुहार
बन तेरा प्यार हर पल मुझे भिगोता है...
पल भर को भी हो दूर तू गर
सिसक सिसक मेरा दिल रोता है..
तेरी ठंडी हथेलियों की छुवन महसूस करती हूँ
जाऊ कहीं भी तेरी छाँव में ही चलती हूँ
जैसे सावन इस धरा का रूप खिलाता है
तू भी तो मुझको प्यार से यूँही सजाता है
अब कह दो एक बार दिल पे रख के हाथ
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर कि
सावन तुम्हारी नक़ल करता है.

मेरी कविताये

मेरी कविताये मात्र कविता ही नहीं है,
आइना है मेरी उन भावनाओ का,
जो अब तक सारे जहाँ की आँखों से दूर
मेरे मन की अँधेरी कन्द्राओ में छुपी हुयी..
वो कामनाये जो हौले से मुझे छू जाती है.
छूना गर चाहू तो बन तितली उड़ जाती हैं....
वो भावनाए, कामनाये ढल के शब्दों में
इक नदिया सी बह जाती हैं...
लाख भरु मुट्ठी में बूंदों सी बह जाती है..
देख अजनबी अनजाना छुईमुई सी मुरझाती हैं..
मेरी कविताये मात्र कविता ही नहीं है.........
ये तो वो धरोहर है,अहसासों की
जो अब तक है अनजानी,अनकही
अनसुनी,कुछ सुलझी,कुछ उलझी,
कुछ अल्हड़,कुछ शर्मीली,
कुछ खुली हुयी,कुछ छुपी हुयी
कुछ डरी हुयी, कुछ विद्रोही,
कुछ अलसाई, कुछ सोई सी...
अपने आप में खोई सी..
ले रूप कवित का आई हैं
सब से मिलने खुल कर खिलने..
स्वीकार ये मै करती हूँ फिरसे
हर शब्द लिखा है दिल से क्यूंकि....
मेरी कविताये मात्र कविताये नहीं है....

वो खोयी सी बचपन की गलियां...






बालों में चांदनी सी छिटकने लगी है



उम्र की फसल हौले से पकने लगी है
पर दिल अब भी भटकता है
मुड मुड़ के देखता है पीछे
वो खोयी सी बचपन की गलियां...

अभी भी वो गुडिया है मुझ को बुलाती
जिसकी शादी करनी थी बाकी..
वो हाथी,वो घोडे,वो सारे बाराती
वो प्यारा सा भालू था ढोल वाला
वो छोटा सा बंदर था बाजा बजाता
यादों में अब भी सभी घूमते है
कानो में धीरे से पूछते है..

डूबी हो अपनी दुनिया में ऐसे
हमको भुलाया,तो बोलो कैसे
तुम से ही तो थी हस्ती हमारी..
तुम जो गयी उजड़ी बस्ती हमारी

कोठरी में है गठरी गठरी में है हम
किसी को हमारी जरुरत नहीं है
तुम लौट एक बार आओ, और देखो
मनो धूल की परते हम पर जमी है..

मै चुपचाप अपने को बहला रही हूँ
अपने खिलोनो को सहला रही हूँ
तुम ही तो मेरे साथी थे पहले
तुम संग ही मेरे दिन थे रुपहले
तुम संग ही रोई हंसी भी थी तुम संग
तुम भी बस रंग गए थे मेरे रंग

मेरी गुडिया मुझ को बुला रही है
पर बालों की सफेदी डरा रही है
हंसते है बच्चे मेरे बचपने पर
उनकी हंसी मन ही मन रुला रही है..
काश वो बचपन फिर लौट आये
एक बार आकर फिर से न जाए
काश............................

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ.........

आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..
वो जो छोटा सा वक्त बीतेगा नितांत एकाकी,
उस विरह की टीस,मन का खालीपन, बैचैनी
सब संभाल सहेज कर रखूंगी तुम्हे दिखने को
नयनो से जो गिरेंगे अश्रु,माला में गूँथ लूँगी
जब आओगे जयमाल सा पहना दूंगी
प्रति क्षण याद करुँगी तुम्हारी हंसी
और उस हंसी की गूंज में व्यर्थ हो जायेगा,
ये जो विरह है तिरोहित हो जायेगा..
तुम्हारी सुगंध जो बस चुकी है मुझ में
उसी में खोके तुम को पाऊँगी
आज तुम जाओ, पर जल्दी आना
बहुत अधिक प्रतीक्षा नहीं कर पाऊँगी..
अब जाओ नहीं तो......
मन कहीं फिर न पिघलने लगे
और बन जाऊं बेडी तुम्हारे पांवों की
आज नहीं कहूँगी तुम रुक जाओ
क्यूंकि यदि तुम जाओगे ही नहीं तो
प्रतीक्षा कैसे करुँगी तुम्हारे आने की..

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

mai aur tum

तू ही मेरी बात आज 
मान क्यूँ नहीं जाता?
जाने क्यूँ तेरी हर बात 
मै चुप हो के सुनती हूँ?
तू सोचने लगता है कि, 
चुप है तो सहमत है, लेकिन
मेरे दिल में उमड़ते,उठते
प्रतिरोध को समझ नहीं पाता है
क्यूँ चाहता है तेरी हर बात 
बिन कहे ही मेरी बात बन जाये
जबकि मेरे जज्बात कभी 
तू समझ भी नहीं पता
माहिर है बहुत तू दुनियादारी में
पर दिल को मेरे तो कभी तू पढ़ नहीं पाता
हर बार मेरी हार तेरी जीत होती है
तू जीत कर भी जश्न क्यूँ मुझसे ही है चाहता
जो ख्वाब तेरे है वो तेरी आँखों में है
पर क्यूँ तू मेरी हकीकत भी देख नहीं पाता
मै जोड़ती हूँ हर रिश्ता मोहब्बत की डोर से
तू हर बार इसी कमजोरी का फायदा है उठाता
ये नहीं कहती की संगदिल है तू,फिर भी
मेरी हालत क्यूँ कभी जान नहीं पाता.. ...
कहीं ऐसा तो नहीं जानना ही नहीं चाहता!!!!!!!!!!!