बुधवार, 6 अप्रैल 2016

मंज़िल तुम हो

जाने कितने अधूरे ख्वाबों की पोटली
कबसे थामे चलती रही सुभो-शाम ,
कहती भी क्या,और किससे कहती
कौन देता इन्हे नए आयाम।

सो चुप रहना ही श्रेयकर था
लेकिन मन की गहरी कन्दराओं में
गहरे कहीं वो ख्वाब पलते रहे
खुद ही  नए आकारों में ढलते रहे।

कभी कभी बड़ा सताते थे
मन को मथते थे दिमाग झन्नाते थे
खुद ही खुद को देती थी दिलासा
"इट्स  नॉट माय कप ऑफ़ टी"
कह के थपकी देके फिर सुला देती थी।

फिर तुम आई  जिंदगी में मेरी
मैं फिर से मुस्कुराने लगी
सपने जाने क्यों फिर सजाने लगी
खोल के बैठ गयी पोटली अपनी।

झाड़ पोंछ के सारे ख्वाब
करीने से फिर सजाने लगी
मुद्दते बीती सहेजते समेटते
कभी कभी घबराई भी
पर थमने नहीं दिया।

अब कुछ ख्वाब मंज़िल के करीब
नज़र आने लगे हैं मुकम्मिल से
गले में आला लटकाए जो तुम खड़ी
हो , वो मैं ही तो हूँ,हाँ वो मैं ही हूँ...
चहकती खिलखिलाती मुस्कुराती।





शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मैं एक कीमती झाड़-फानूस............



मैं एक कीमती  झाड़-फानूस

हैडिल-विद-केयर का टैग लगाये

बड़े से महल में अकेली खड़ी हूँ

सजाये बदन पर लाखो सितारे

बहुत ऊँचे आसमाँ पर  चढ़ी  हूँ 

बहुत नाज़ुक हूँ, शीशे की बनी हूँ
ज़मी से दूर, बहुत ऊँची टँगी हूँ
चमकती हूँ झिलमिल रोशनी से
जहाँ तक जाये नज़र बस मै ही मै हूँ.....

सभी तकते हैं बड़ी ही आरज़ू से
सभी की चाहतों में बसी हूँ
फ़क़त एक बार छूना चाहते है
मैं इंसा हूँ या कोई परी हूँ

बड़ी शिद्दत से संभाला गया है
बहुत नजाकत से ढाला गया है 
बहुत सा इंतजाम-ऐ-अहतियात 
खातिर मेरी माँगा गया है

घिरी हूँ तामिरगारों की भीड़ में
साँस भी लूँ तो घबराते है
ज़रा सी जुम्बिश से थर्राते है
सारा दिन सर पे मंडराते है 

आह गर निकले कभी जो भूल से 
दौड़ पड़ते हैं सारे,मैडम कुछ लाये  क्या ?
तबियत ठीक है या डॉक्टर बुलवाये क्या?
अजब सी ख़ामोशी से जब ताकती हूँ तो ,
डर जाते हैं, और सीधा साहब को फ़ोन लगाते हैं ..........आशा 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

यूँही आज कल

यूँही आज कल पता नहीं कहाँ हूँ खोई सी
अलसायी सी जिंदगी उबासी ले रही है ।
क्यों उँगलियाँ इतनी अशक्त लगने लगी हैं
कलम भी उठाना भारी  हो गया आज कल ।
सोचों पर भी पड़े हैं ताले, सन्नाटे गूंज रहे है
किसी अनजान सी राह पर डगमगाते कदम ।
दिमाग में बज रहा कोई अधूरा गीत बेआवाज़
धुंध सी छायी हैचारों ओर, उलझा सा है  मन । 
धुंधलायी सी नज़रें गुमनाम ख़ामोशी लबों पर
यूँ के जैसे मदहोश दीवानगी के आगोश में गुम
कोई मुसाफिर भटकता फिर रहा हो वीराने में ।
मन की अँधेरी गुफा में गुर्राते हैं अनगढ़ ख्याल
और भागती  फिर रही हूँ कान में उंगली दिये।
ऐसा क्यों है मत पूछना, मुझे खुद नहीं पता ।
तुम समझ पाओ तो मुझको भी बताना प्लीज। … आशा


शनिवार, 21 दिसंबर 2013

माँ की दुविधा

सोच रही हूँ तुमसे कुछ कहूँ,सुनोगे बेटा
माँ हूँ,पर डरती हूँ नए ज़माने के नए सलीकों
नए सवालों से,थोडा तुम्हारी उठती उम्र और
अपनी पुरानी पड़ती सोच का भी डर है.....

जानते हो, जब तुमने पहली बार मेरी कोख में
करवट ली थी,धीमे से कई अनदेखे ख़्वाब,
अनघड ख्वाइशों ने भी ली थी अंगड़ाई दिल में
और तबसे ही सपनो के ताने-बाने बुनती रही हूँ|

तबसे अबतक हर दिन कभी तुम्हेँ, डाक्टर,कभी
इंजीनियर,कभी आर्किटेक्ट तो कभी सीए  बनाती
कभी सजाती फ़ौजी वर्दी तो कभी पुलिस यूनिफार्म
तो कभी बना तुम्हे पाइलेट सपनो के जहाज उडाती,

और तुम अपनी तुतली जुबान से कहते हर बार
माँ जो तुम कहोगी कर जाऊंगा,एक बार बड़ा होने दो
फिर देखना तुमको राज करूँगा,मैं बस हंस देती.....

जानती हूँ तुम आज भी अपनी बात पर कायम हो,
मैं तुम्हारी पहली चाहत हूँ आज भी,हर बात पर
अब  भी तुम सबसे पहले "माँ"ही पुकारते हो.… :-)
और निहाल हो जाती हूँ तुम्हारी पुकार पर

फिर भी जाने क्यूँ एक अंजाना सा डर, डराता है
तुम कहीं भटक ना जाओ दुनिया कि चकाचौंध मैं
सोच के ही मन मेरा घबराता है......
आँचल से बांधे रखना चाहती हूँ तुम्हें। …।


तुम खड़े हो बचपन और जवानी की देहलीज़ पर
जहाँ एक खुला आसमान है उड़ने को
असीम सम्भावनाये बाँहे पसारे खड़ी हैं
पर साथ ही अनजानी  भूलभुलैयाँ भी है

तुम छूना चाहते हो अपना क्षितिज़
अपने ही प्रयासों से,गर्वित हूँ लेकिन
सशंकित भी हूँ,क्या तुम सही चुनाव कर पाओगे??
कहीं ठोकर तो नहीं खाओगे????






शनिवार, 18 मई 2013

तेरे जाने का ग़म ....


रात भर पिघलती रही आँखें 
टीस सी उठती रही रह-रह कर
रिसती रही पलके,छलकता रहा 
दर्द का दरिया .....
 
यादों का खंज़र कुरेदता रहा 
दिल की हर परत,तेरी शरारतें,
अठखेलियाँ,तेरी मुस्कान और 
धीरे से कहना चची- जान,
धड़कनों में बजती रही तेरी आवाज़......

खामोश सिसकियाँ,थर्राती रही  
मजबूर साँसे फिर भी चलती रही 
रात भी थोड़ी सहमी सी थी 
जैसे उसे भी डस गया था   
तेरे जाने का ग़म .....

जानता है क्या कितने दिन हुए 
तू सो गया बेखबर,बेसुध,और  
जगती रही कई जोड़ी आखें 
कई रातों तक तेरे जगने की 
राह देखती रही,आस का दिया जलाए ......

पर आज अजब रात आई है 
जाग तो आज भी रही हैं दर्ज़नो आँखें 
तेरे लिए रात भर लेकिन बिना कोई आस,
ख़त्म हो गया हर-एक- इंतजार .....

चमकीला  सूरज फिर आया 
लेकिन मेरे घर का अँधेरा 
जस का तस….बल्कि थोड़ा गहराया सा-----
और सुबह एक दम रीती खुरदरी ...... 
बिदाई की बेला जो है,आँख फिर पिघल रही है ..... (आशा)
 

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

ग्रहण

सम्भवतः आजकल मेरी सोच 
पर भी लग गया है ग्रहण 
अथवा थम  गयी है गति 
ह्रदय के स्पंदन की ....
मस्तिष्क का दिन-रात 
सोचना कहाँ गया ?
जम गयी है संवेदनाये 
तभी तो न कोई विचार
न कोई अभिव्यक्ति न ही 
कोई विरोध दर्ज कर रही हूँ 
जबकि कितना कुछ घट रहा है 
आस-पास ,बिलकुल मेरे सामने 
और मैं मौन हूँ ,
किस तरह हर बात पर 
भड़क उठती थी, कितने 
सवाल मथते थे,कितनी 
उन्मादिनी हो उठती थी 
शब्दों की नदी घुमड़ उठती थी 
किन्तु अब सब शांत है ,और 
मैं  उलझी हूँ इसी उहापोह में 
आखिर हुआ  क्या है ?
ठीक-ठीक पता नहीं चल रहा  
क्या कोई सुलझा पायेगा ये गुत्थी ......(आशा)



गुरुवार, 7 मार्च 2013

स्त्री दिवस

आज आप सब मिल कर
मना  रहे हैं स्त्री दिवस
मुबारक हो ये दिन आपको
लेकिन क्षमा करें ,
मैं नहीं मनाती, और ना ही
खुद को मोहताज़ मानती हूँ
किसी एक दिन के लिए
मैं स्त्री हूँ जन्म से और
मेरा हर दिन स्त्री दिवस है
हर दिन को मानती हूँ
पूरे हर्षोल्लास के साथ
फिर क्यूँ आप सब मानते हैं
स्त्री दिवस सिर्फ एक दिन ...........??