शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मेरे सूरज चाँद हो तुम......

तुमसे ही दुनिया मेरी रोशन
चाँद और सूरज हो तुम मेरे
कहीं भी रहो तुम चाहे
मुझ तक पहुँच ही जाती है,
चमक तुम्हारी और पल में
रोशन हो जाता है मन आँगन
दमकने लगती है दुनिया मेरी

तुम्हारी खिलखिलाहटें ही
तो मेरी संजीवनी बूटी हैं
और तुम्हारा एक आँसू भी
मुझे सौ मौतें मार देता है

दे देना चाहती हूँ
सारे जहाँ की ख़ुशियाँ
ले लेना चाहती हूँ
तुम्हारी हर एक बला
और करना चाहती हूँ
वसीयत तुम्हारे नाम
अपने सपने तमाम

तुम दोनों कभी कभी
झल्ला जाते हो मुझ से
लेकिन जानते हो तुम्हारा
यूँ रूठ जाना भी भाता है
और शरारती हो जाती हूँ
साथ बच्ची बन जाती हूँ

अब तू बड़े हो रहे हो
ऊँची उड़ान के लिए
तौलते हो पंख अपने,
सामने फैला है तुम्हारे
सम्भावनाओं का असीम
आकाश,और मैं, खड़ीहूँ
उम्मीदों का दिया जलाए

चाहत तो यही होती है
रहो मेरे आँचल के तले,
पर ये ठीक नहीं होगा
उड़ो,ख़ूब ऊँचे उड़ो,
छूलो नए आसमान
अपने हुनर को दो
नयी धार,बनाओ,
दुनिया में अपना
अलग मुक़ाम,

ये ना सोचना अगर
गिर पड़े तो क्या ?
फिर से सँवारो पाँखें
देखो हवा का रूख
और भरो उड़ान,
ये दुनिया क्या कहेगी
ये तुम मत सोचो,उसे
जवाब देने को मैं हूँ ना...(आशा)










मंगलवार, 5 सितंबर 2017

मोहब्बत....

आँखे है समंदर आप इनमे डूब जाइये...
मोहब्बत का मोती वहाँ से ढूंड लाइए..

आंसू  गिरे मेरे तो आप क्यों तड़प उठे
अब इनकी पाकीजगी पे शक न खाइए

डूब गयी अश्कों में जाने कितनी सल्तनतें
मोहब्बत से बढ़के है कोई दौलत  बताइए

तख्तो ताज छोड़ दिए शहनशाहों ने कई
महबूब के दामन से बड़ी सल्तनत दिखाइए

सब लोग एक है मोहब्बत की नज़र में
 ऐसा खुदा के सिवा कोई है तो बताइए...

शीत निंद्रा...


खुद को छुपा के खोल में
घोंघे की मानिंद बैठ गयी
समेत लिया सब कुछ
अच्छा बुरा खरा खोटा
और एक अजीब सी
ख़ामोशी को ओढ़ लिया
जैसे अक्सर कई जीव
चले जाते हैं शीत निंद्रा में....
और अनजानी अनसुनी
एक भ्रम की दुनिया बना ली
सबको समझाने भी लगी
भुलावा दिया दिलको
ऐसी ही हूँ मैं "क्रिएटिव ".....
एक दिन यूँ ही अचानक
सरका के दूर कर दी
हाथों की कलम,किताब
और बांध ली आँखों पर
रेशमी पट्टी गांधारी सी
और मान लिया के बस
अब यही सच है मेरा
पर ये सच नहीं था....
भीतर ही भीतर ख़ुद
मैं भी जानती थी के
झूठ है ये,केवल छलावा
पर खुद को ही बहला रही थी
या फिर क़त्ल कर रही
अपनी संवेदनाओं का
ये घुटन बढती ही जा रही थी....
फिर बारिश हुयी
भीगती रही पहरों उसमे
और फिर सूरज दमका
हाथ पकड़ कर खींच लिया
एक भूली सी नज़्म ने
अब पट्टी उतार कर
देख रहीं है आँखे नया सवेरा
लौट आयी हूँ फिर उन्हीं
ख्वाबों की दुनिया में
कलम भी खुश,किताब भी और मैं भी(आशा)



शनिवार, 2 सितंबर 2017

हम आज सच कहें......

क्या सच में चाहते हो कि हम आज सच कहें
सच से तो दूर दूर तक नाता नहीं तुम्हारा.....

तनहाइयों से गहरा नाता जुड़ा हमारा...
जिक्र कही भूले से भी आता नहीं तुम्हारा.
.
अब ज़िन्दगी में कोई दखल नहीं तुम्हारा

बदले है रास्ते जो,अब फिर न मुड़ सकेंगे 

इंतज़ार


कुछ कहना चाहते पर सुनते नहीं वो बात
हम दिल की कह रहे वो है जाने किस ख़्याल में
आँखे तरस गयी मेरी के उनको देख लूँ
उनको नहीं परवाह के हम है किस हाल में
सवालों ने हम को घेरा है इस कदर ऐ दोस्त
के जिंदगी निकल गयी जवाबो की तलाश में
साँसे हमारी डूब रही है फ़िक्र में उनकी
वो मस्त है कहीं दूर दुनियादारी के बवाल में

नक़ाब......

दर्द की हद को जब चाहा महसूस करें
चुनके गुलशन से एक गुलाब तोड़ लिया
लोग समझे के हमने फूल चुने अपने लिए
वो क्या जाने काँटों से नाता जोड़ लिया
दिल के रिसते हुए ज़ख़्म कब दिखाये हमने
रूख-ऐ-रोशन पे लिबास-ऐ-हँसी ओढ़ लिया।(आशा)    

दुनियादारी....

इम्तिहान वक़्त के हज़ार,
हज़ार सितम दुनिया के,
फिर भी टूटती नहीं, 
जाने किस मिट्टी से बनी है ।
कोशिशें लाख की समझाने की,
समझती ही नहीं,
जाने क्यूँ इतनी ढीठ,
इतनी ज़िद्दी, के फिर भी तनी है।
चाहती क्या है आख़िर,
कुछ समझ नहीं आता,
रस्सियाँ जल गयी 

लेकिन बल नहीं जाता,
आज़माती है रोज़ 

क़िस्मत को नए तरीक़े से,
नासमझ है, 

जाने कब समझेगी दुनियादारी!!! (आशा)