गुरुवार, 14 जुलाई 2011

बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं...........





बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं
कहीं उगती है,उखाड़ी जाती है
कही और लगायी जाती हैं
अपनी जमीन से जुदा हो के भी 
अपनी उर्वरता कहाँ खोती हैं
बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं
 
दूसरी जमीन को भी अपना लेती हैं
देके अपना सर्वस्व सब को सुख देती हैं
बस चाहती हैं थोडा सा स्नेह 
और कहाँ किसी से कुछ लेती हैं 
बेटियां धान की पौध जैसी होती हैं

दूजे घर में बस जाती है खुशबु जैसी
अपनी पहचान हंस के खोती हैं 
छोड़ती है जब अपना घर आंगन
हंसते हैं लब,आँख बहुत रोती है
बेटियाँ धान की पौध जैसी होती हैं.........

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

,ना जानू........

संग बरखा के मैं भी बरसी
जाने कब से थी यूँ तरसी
नयन लगाये होड़ मेघ संग
नयनो से क्यूँ बरसा निर्झर,
उमड़ी घटा क्यों सावन की, ना जानू


मन चूर नशे में डोल रहा 
चहुँ ओर फिरूँ बहकी-बहकी 
पवन करे सरगोशी मुझसे 
बिन बात रहूँ लहकी-लहकी 
दीवानापन तारी ये कैसा,ना जानू....

सादी सी,बेरफ्तार जिंदगी
क्यूँकर इतनी तेज़ हुयी?
सुलझी,सीधी सी लट मेरी
काहे  लोहे की ज़ंजीर हुयी
इनमे उलझी कितनी बाते,ना जानू...

सावन बरसे रिम-झिम आँगन
मन मदहोश, शीतल हर धड़कन
पवन चले धीमे से छूकर तन 
महका कैसे सारा मौसम,ना जानू...

भीगी रुत में भीगे नैना
दिन गीले से,सीली रैना
क्यूँ ना मन ये पाए चैना
बना पपीहा किसे पुकारे,ना जानू.......

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

अक्सर सोचती हूँ......

जब भी बरसे आब,आसमां से टप-टपा-टप
मन मेरा क्यूँ भीग जाता है,अचानक
मिट्टी से उठती हुयी सोंधी महक
क्यूँ मेरी साँसों को महकाती है बरबस

भीगती डालों से टपकता,थिरकता पानी 
क्यूँ  मेरी अल्को में ठहर सा जाता है
पत्तियों का धुला सा सब्ज़ आँचल
क्यूँ मेरी पलकों पे लहक सा जाता है

भीगते पंछी जब झटकते हैं अपनी पाँखे
टूटती मोती की लड़ियाँ क्यूँ देखती है आँखे
काले बादल ओढ़ कर आये जो परी आसमानी
झट से कैसे धरती ओढ़े चुनर धानी...

जादू अज़ब,बाते गज़ब,है कौन जो करता है सब
सोचती रहती हूँ पहरों अकेली,कोई तो सुलझाओ ये पहेली 
झड़ी सवालों की भी ज्यूँ बारिश की बूंदे
भीगती हूँ इनमे अक्सर नयन मूंदे 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

ये बादल......

बहुत दिनों बाद बरसा ये बादल
बड़ा ही ढीठ है मनमर्जी करता है
लाख मनाया कितनी अर्जी दी
पर किसी के कहे ये कुछ करता है....

अपनी धुन में उडाता फिरता है
आवारगी में अपनी खुश रहता है
बिगड़े तो दुनिया उजाड़ कर रख दे
वरना कब किसी से कुछ कहता है

सावन में रिमझिम झूम के बरसे
भादो में खाली झीलें भरता है
धरती की प्यास बुझे एक पल में
यूँही जी भर के जब बरसता है

मनमोजी है ये जोगी की तरह
कभी यहाँ तो वहां डेरा 
बांध सकता है कौन इसको कहीं
शाम दिल्ली की तो अवध का सवेरा