रविवार, 30 अप्रैल 2017

जमाना जाने क्या समझे

शेर लिखो,ग़ज़ल या कलाम लिखो
ख़ुद ही पढ़ो, ख़ुद ही दाद भी दो
ख़ुद ही ढूँढो ख़ामियाँ बनावट में
ख़ुद ही तारीफ़ के अल्फ़ाज़ कहो
क्यूँकि ज़माना ना जाने क्या समझे?

अगर लिखो मोहब्बत तो बताओ
कौन है वो जान- ए- जिगर
लिखे आँसू तो फिर कहो
कौन है वो सितमग़र
लिखा गर गम,कहीं भूले से
कहना होगा कौन है वो
किया किसने ये चाक जिगर।

इसलिए ताक़ीद ये करते हैं
भई हम तो सवालों से डरते हैं
कहना जो भी हो ख़ामोश कहो
ना हो आवाज़ ना कोई जुंबिश

काग़ज़ का सीना चाक करो
पर सुनाने से हमें माफ़ करो
तुमको लिखने का है रोग तो
ख़ूब लिखो, पर शउर इतना रखो
मत करो तंग तुम यूँ औरों को
क्यूँकि ज़माना ना जाने क्या समझे(आशा)