सोमवार, 6 सितंबर 2010

तुम बिन ………

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन


एकाकी,अधूरी सी,मुरझाई सी,श्रापग्रस्त

अप्सरा सी जो अपना बनवास काट रही है..

तुमको सोचती तुमको महसूस करती हुयी

तनहा स्याह रातों के अकेलेपन से लडती

अपनी नियति को कोसती,किसी तरह

अपना समय बिताती हूँ,दिन तो कट जाता है

पर रात से डर जाती हूँ ,स्वप्न में देखती हूँ प्रिय तुम को

कल्पनो में तुम को लाती हूँ,तुम पास लगते हो

कभी समझ के तकिये को तुम,शर्मा जाती हूँ

तो कभी झगड़ने लगती हूँ इस कदर की मत पूछो

सारे गिले शिकवे उसे सुनती हूँ,और कभी

समझ के तुम्हारा चौड़ा सीना,उसमे सिमट जाती हूँ

पर जब टूटता है स्वप्न,नयन भर जाते है

कुछ अटक सा जाता है,साँस भी रुकने लगती है

दिल की धड़कन बहुत जोर से बजती है

तनहाइयाँ बन के नाग मुझ को डसती है और मै,

फिर से खो जाती हूँ विरह की गहरी कन्दरा में क्यूंकि,

तुम उस पार रहते हो,मै हूँ इस पर प्रिय तुम बिन ………

1 टिप्पणी:

  1. Bahut sundar likha didi.

    Kuch main likhu:-

    "Sochta hu tumko kuchh aur uphar du..!
    Jab dekha tumko pehli baar
    Tum bahut hi achchi lagi,
    Is jhuthi farebi dunia mein
    Ek tum hi to suchchi lagi
    Hath badhakar sneh ka jeevan tumhara swar du..!
    Sochta hu tumko kuchh aur uphar du..!
    Vada karke na nibhau
    Aisa main swarthi nahi
    Prem karna janta hu
    premi hu main prarthi nahi
    Mann ki umang bankar tumhe bahut pyar du..!
    Sochta hu tumko kuch aur uphar du..!

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