शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

,ना जानू........

संग बरखा के मैं भी बरसी
जाने कब से थी यूँ तरसी
नयन लगाये होड़ मेघ संग
नयनो से क्यूँ बरसा निर्झर,
उमड़ी घटा क्यों सावन की, ना जानू


मन चूर नशे में डोल रहा 
चहुँ ओर फिरूँ बहकी-बहकी 
पवन करे सरगोशी मुझसे 
बिन बात रहूँ लहकी-लहकी 
दीवानापन तारी ये कैसा,ना जानू....

सादी सी,बेरफ्तार जिंदगी
क्यूँकर इतनी तेज़ हुयी?
सुलझी,सीधी सी लट मेरी
काहे  लोहे की ज़ंजीर हुयी
इनमे उलझी कितनी बाते,ना जानू...

सावन बरसे रिम-झिम आँगन
मन मदहोश, शीतल हर धड़कन
पवन चले धीमे से छूकर तन 
महका कैसे सारा मौसम,ना जानू...

भीगी रुत में भीगे नैना
दिन गीले से,सीली रैना
क्यूँ ना मन ये पाए चैना
बना पपीहा किसे पुकारे,ना जानू.......

2 टिप्‍पणियां:

  1. सावन बरसे रिम-झिम आँगन

    मन मदहोश, शीतल हर धड़कन

    पवन चले धीमे से छूकर तन
    महका कैसे सारा मौसम,ना जानू...
    Bahut sundar bhaw Asha ji...Sadhuwad apko.

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  2. barsa ritu kaise kaviyon ko apne aur aakarshit karta hai..:)
    भीगी रुत में भीगे नैना
    दिन गीले से,सीली रैना
    क्यूँ ना मन ये पाए चैना
    बना पपीहा किसे पुकारे,ना जानू.......

    wah :)

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