बुधवार, 6 जुलाई 2011

ये बादल......

बहुत दिनों बाद बरसा ये बादल
बड़ा ही ढीठ है मनमर्जी करता है
लाख मनाया कितनी अर्जी दी
पर किसी के कहे ये कुछ करता है....

अपनी धुन में उडाता फिरता है
आवारगी में अपनी खुश रहता है
बिगड़े तो दुनिया उजाड़ कर रख दे
वरना कब किसी से कुछ कहता है

सावन में रिमझिम झूम के बरसे
भादो में खाली झीलें भरता है
धरती की प्यास बुझे एक पल में
यूँही जी भर के जब बरसता है

मनमोजी है ये जोगी की तरह
कभी यहाँ तो वहां डेरा 
बांध सकता है कौन इसको कहीं
शाम दिल्ली की तो अवध का सवेरा




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