शनिवार, 22 दिसंबर 2012

            मैं नारी हूँ


सुनो,मैं एक नारी हूँ,सदैव मौन ही रही हूँ,
मेरे इस मौन को कुछ और न समझना
शांत अवश्य हूँ किन्तु मूक- बधिर नहीं हूँ
एक दिन मैं भी बोलूंगी सोच रही हूँ कबसे
आज कुछ कह ही डालूं,क्या सुन पाओगे?
है सामर्थ्य मेरे भीतर उठते झंझावत को झेलने की?
कितनी सदियाँ बीत गयी ऐसे मौन,निशब्द,
जिसने भी जो कहा चुप-चाप मानती रही
अपने मन की कब किसीसे कही .............
 तुम्हारी इच्छायें, आकांक्षाये,सपने,
सदैव सरोपरी रहे,और मेरी इच्छाएं,
आकांक्षाएं,संवेदनाये,आगे बढ़ने की
सारी सम्भावनाये,मेरी कोमल भावनाए
दब गयी,दबा दी गयी,या दबी रह गयी............
बिना कोई शिकायत,मैं चलती रही
तिनका-तिनका जोड़ सपन बुनती रही
धरती सी दृढ़ता से पाया हर मुकाम
बिना मांगे तमसे कोई सहयोग,सुझाव,
स्वयं में बन सशक्त,रचना की नये युग की
सब कुछ सह कर भी मौन रही निशि-याम
और तुम समझे मैं पाषाण हूँ,निष्प्राण हूँ
भोग्या हूँ तुम्हारी,सहज उपलब्ध साधन .........
तुम जब भी चाहते हो रौंद डालते हो
करके  मेरे अस्तित्व को तार-तार
कर देते हो मुझे क्षत-विक्षत,
मेरी अस्मिता को मिटा देते हो पल में
बहुत गर्व होता है तुम्हें अपने पुरुषत्व(?)पर........
किन्तु क्या मिटा पाते हो मुझे?
नहीं ये सामर्थ्य नहीं है तुममे.......
मैं तुम्हें रखती हूँ अपनी कोख में
पिलाती हूँ ह्रदय का रक्त,पालती हूँ
ताकि एक दिन बनके सशक्त
बनो महान,विद्वान्,सदाचारी पुरुष
और तुम!!मुझे ही निकृष्टता की हद
पर लाते हो,स्वयं को श्रेष्ठ आखिर किस
कसौटी पे पाते हो??
हाँ,मानती हूँ मैं अशक्त हूँ,कोमल गात है
नहीं खेल सकती किसी की अस्मिता से
और ना ही दे सकती हूँ मर्मान्तक पीड़ा
किसी का क्रन्दन  मुझे कभी सुख नहीं देता
अपने क्षणिक सुख के लिए
व्यभिचारिणी बन नहीं कर सकती
किसीके तन-मन को लहूलुहान
नहीं है मुझमे तुमसी पैचाशिक शक्ति
और चाहती भी नहीं तुमसी होना ......
नहीं चाहिए तुमसी पशुता मुझे
नहीं चाहती अपना नारीत्व खोना ...........(आशा)






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