शुक्रवार, 20 मई 2011

माँ ...

जब कभी भी घेरते है अँधेरे हालातों के 
तू सूरज सी नज़र आती है अब भी माँ
उलझनों में अपनी जब भटकती हूँ
तू नयी राह दिखाती हैअब भी माँ 

तपती दोपहर में साए की तरह
छुपाती है आँचल में अब भी माँ 
ऊँची लहरों में किनारे की तरह
पास बुलाती है मुझे अब भी माँ 

मुश्किलों की आँधियों से सदा
तू मुझको बचाती हैअब भी माँ 
खो के धीरज जो घबरा जाऊं 
एक नया जोश दिलाती हैअब भी माँ


रात दिन दूर तुझसे हूँ बेशक 
तेरी दुआओं में हूँ अब भी माँ 
सहला जाती यूँही ख्यालों में 
तेरी ठंडी नर्म हथेली अब भी माँ

जब भी हो जाता उदास ये दिल
बहला जाती है तू अब भी माँ
नींद जब देर तक नहीं आती
याद आती है तेरी थपकी माँ 

जब देखती हूँ अपनी बिटिया को
खयालो में तू ही मुस्कुराती है माँ
इस तरह शामिल है मेरे वजूद में तू  
मुझमें में भी तू ही नज़र आती है माँ ....


3 टिप्‍पणियां:

  1. maa shabd par kuch likha jaye or usmein kashish na ho ...ye naamumkin hai

    aapne sare manobhaav shabdon mein piro diye

    ye duyaayen hamesha aapke sath rahengi

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  2. Asha ji aapki is kavita mein har beti ki bhavynayen chhupi hai.. har qadam par ham sab hi apni MaaN ko yaad karte hain.. bahut achcha laga aapki kavita padhna

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