गुरुवार, 26 मई 2011

आओ चुगली चुगली खेलें ....

आओ चुगली चुगली खेलें 
जिसके मुकाबिल आना मुश्किल  
चुगली में उसकी जां लेलें 
आओ चुगली चुगली खेले

मन को भाए,खुस पुस बाते
गुप चुप अँखियाँ मुस्काएं 
सिरा पकड़ ले एक छोटा सा
पूरी रामायण लिख जाए

मन भावन अति लगे बुराई
जब दूजे की हो टांग खिंचाई
मधुरस बरसे चुगली में ऐसा
ज्यूँ मुंह में घुल जाए खताई

निंदा रस का स्वाद निराला
नशा अनोखा चढ़ता
जीभ चलाना शगल सलोना
अब इसमे अपना क्या घटता
क्यूँ वो इतना ऊँचा हमसे
खींचो टांग गिराओ धम्मसे
उसकी कमीज सफ़ेद क्यूँ भाई
आओ ढंग से करे धुलाई

खुद को बदलना मुश्किल भईया
क्यूँ ना दूजे की परत उधेड़े
अज़ब ठण्ड सी पड़े कलेजे
जब बातों में उसे थपेड़े

आओ मिलकर बैठे यारो
दिल के जख्मो को सेले
आओ चुगली चुगली खेले
आओ चुगली चुगली खेलें








3 टिप्‍पणियां:

  1. badi pyari lagi aapki chugli...par sach me jab chhip chhip kar kisi dusre ki burani karte hain,...to pata nahi kyon bahut maja aata hai...syad ye humane nature hai...
    ek pyari se kriti..:)

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  2. निंदा रस का स्वाद निराला
    नशा अनोखा चढ़ता
    जीभ चलाना शगल सलोना
    अब इसमे अपना क्या घटता...

    बहुत रोचक प्रस्तुति..शायद इसी लिये कहा गया है निंदक नियरे राखिये...बहुत सुन्दर

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  3. acchi hai apaki ye rachna!
    kameej khoob dhoyi hai aapne,
    kash logo ke man ka mail bhi dhul jaye!

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