मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विभूति....

       विभूति....

आज तुम अट्ठारह की हो जाओगी
एक नया दौर है जीवन का ये भी
अब नए अधिकार, और कर्तव्य 
नया आकाश उड़ने को पाओगी


तुम बढ़ी हो,बदला है समय,
और साथ ही बढ़ी है ये माँ भी,
तुम्हारे साथ साथ बढ़ता रहा है 
मातृत्व मेरा,परिपक्व हुआ है...

तुम्हारे जनमते ही,जन्मी थी 
एक स्त्री से माँ बनी थी
जैसे पर्वतों से गिरता झरना 
नदी बन जाता है,गहरा जाता है....

नन्ही परी सी तुम आई 
और मै बदल गयी थी
जैसे सूरज की पहली किरण
पड़ते ही रात बदल जाती है दिन में.....

समय का भान ही कहाँ हुआ
कल की बात लगती है
जब तुम ठुमकती रहती थी
आँगन में चहकती थी,

पकड़ उंगली मेरी चलती थी
या इशारों पर मुझको चलाती थी...
कितने सवाल होते थे तुम्हारे
और उन सवालों से मैं 
कितना हैरान हो जाती थी..

सवाल आज भी है पर अब 
जवाब तुम स्वयं ढूंढ़ लेती हो
हैरान आज भी होती हूँ मैं
जब तुम मेरे सवालो को भी हल कर देती हो...

युवा होती तुम्हारी पीढ़ी से डरती हूँ....
बहुत तेज रफ़्तार है,तुम्हारी
आज भी तुम्हे रखना चाहती हूँ
बाँध कर आँचल में अपने
पर नयी मंजिल है अब तुम्हारी....

एक नयी दिशा मिली है तुम्हे
उसी राह पर बढ़ती जाओ, 
स्वप्न जो भी हो तुम्हारे पूरे हों,
एक नया विस्तार पाओ..........

4 टिप्‍पणियां:

  1. ek dam sampoorn kavitaa prem kaa sagar liye huye bahut hee achee hai tumhree mamataa sada jawan rahe

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  2. bahut sunder sneh bhari rachna.

    Vibhuti ko janamdivas ke dher sari badhaii, tum din duni raat chauguni unnati karo, par apne pankhon se udte huye jameen ko na bhulna.

    Shubhkamnayen

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आशा जी ऐसे ही लिखती रहे
    समय मिले तो हमारे ब्लॉग पर जरूर पधारे
    ....आदर मुस्कुराने की ....
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

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  4. मन के भावों का सुन्दर शब्द चित्रण
    आपकी हर मनोकामना पूरी हो ..आमीन

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