गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

बताओ ना..

रोज सुबह जब सूरज उगता है

याद आता है मुझे तुम्हारा शरारत से मुस्काना
धीरे से कहना मेरे कानो में,सुनो
तुम जो भी रंग पहनती हो
झलकता है तुम्हारे चेहरे पर

जब पहनती हो गुलाबी साड़ी
जानती हो, तुम खुद गुलाब हो जाती हो
और उस दिन में बाग़ में नहीं जाता...

जिस दिन तुम पहनती हो पीली साड़ी
सूरज मुखी सी दिखती हो
और मै सूरज की तरह दमकता हूँ

नीली साड़ी में तुम
सावन की बदरी लगती हो
और मै आसमान बन के
समेट लेता हूँ,बांहों में तुम्हे

धानी रंग में तुम
हरी भरी धरती हो जाती हो,
मेरा घर आँगन महकता है तुमसे
तुम से ही जीवन में रंग है मेरे...

तुम्हारी ये बाते मुझे जाने क्यूँ
बहकाती आई है हमेशा,और मै
लहकती फिरती हूँ
तुम्हारे प्यार की खुमारी में

कोई भी रंग चुनने से पहले देखती हूँ
तुम्हारी आँखे आज
क्या देख कर नशीली होंगी

क्या पहनू की तुम
बेसाख्ता बाहों में भर लो मुझे
और कहो फिर से
मेरी मौसम परी तुम ही से बहार है

मै खुद ही ये सोच कर
शर्मा जाती हूँ,और फिर
अचानक मेरा हर रंग
जाने कैसे सिंदूरी हो जाता है
क्या तुम जानते हो इस राज़ को?
बताओ ना..

5 टिप्‍पणियां:

  1. उफ़ ,अदभुत कविता ,एक ऐसे वक्त में जब समकालीन कविता में प्रेम के दृश्य ,शब्दों की तिक्दाम्बाजी में विलीन हो गए हैं ,ये कविता नए प्रतिमान स्थापित करती दिखती है ,सीधे कहें तो इस कविता को बार बार पढने को दिल चाहता है

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  2. bahut hi sunder dampatay ki 1 madhur jhalak ...badhi romantic kavita hae di :)

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  3. मै खुद ही ये सोच कर
    शर्मा जाती हूँ,और फिर
    अचानक मेरा हर रंग
    जाने कैसे सिंदूरी हो जाता है
    क्या तुम जानते हो इस राज़ को?
    बताओ ना..
    asha ji,
    bahut kamal aur gazab ki rachna. haan, ye raaz saarwajanik na karen lekin mujhe zarur bataayen... prem aur usase spandit mann ka sundar chitran. baaki baaten to awesh ji ne kah hin diya hai. bahut badhai.

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  4. uff!! itna pyar...........wo bhi saariyon ke rango se chhalakna..........")

    rango ka bahut hi romantic chitran kiya aapne!!
    sach me badhai.......

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