सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

यादों के ऊँचे बबूल.....

यादों के ऊँचे बबूल उग आये है दिल की पथरीली जमीन पर
साया ढूँढती  हसरते,तड़पते जज़्बात,चुनते है ख़ार अब दिन रात

जिक्रे मोहब्बत जो कभी होता है कहीं,ख़ामोश लौट आते है बज़्म से
सिहरा सा गुजरता है वो दिन,बहुत थर्राती है वो रात

खुद ही बना लिया नामालूम सा जहान,भटकते रहते है हर पल
खोजते फिरते है खुद को,अजनबी हर है शै,उलझी हुयी हर बात

एक खुदा हो तो इबादत करे कोई, उलझन बड़ी है समझे कहाँ कोई
किसको अब सजदे करे किसको खुदा कहे,बड़े मुश्किल से है हालत

तू बेवफा है की बावफा,क्यूँ सोचूं रात दिन,पालू क्यूँ ये फितूर
मेरी मोहब्बत की तासीर अलग,सनम तेरे जुदा से है हालत

तन को बनाया मोम,और खुद को गला दिया
जलते रहते हैं सनम, शम्मा की मानिंद सारी रात

तू अपनी धुन में मस्त,हम तेरी फिकर में हैं  गुम
तन्हा यहाँ है हम तू जाने कहाँ बसर करके आया रात

दस्ताने मोहब्बत अपनी बस इतनी सी है ऐ सनम
तू जहर दे तेरी ख़ुशी,चाहे पिला दे आब-ऐ-हयात....

3 टिप्‍पणियां:

  1. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  2. तू बेवफा है की बावफा,क्यूँ सोचूं रात दिन,पालू क्यूँ ये फितूर
    मेरी मोहब्बत की तासीर अलग,सनम तेरे जुदा से है हालत


    kya baat hai!! bahut khub!! ab tu bewafa rah ya bawafa........kyun sochun!!

    bahut hi pyari rachna......dil ko chhuti hui!!:)

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  3. asha ji,
    shikwa shikayat bhi usi se, yaad mein bewafa wahi basa bhi,yahi hota hai...waah bahut khoob. mann ke kai parat kholti rachna, badhai aapko.

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