रविवार, 10 अक्तूबर 2010

मेरा प्यारा सा कमरा……..

पहाड़ी नदी सी,गुनगुनाती


मुस्कुराती,थोडा शर्माती,

अल्हड,नखरीली सी,थोड़ी हैरान

जब मै उससे मिली थी बरसों पहले

लगा जैसे वो धीरे से मुसकाया था

जब छुआ था होले से उसे मैंने

उसमे नया सा एक रंग नज़र आया था

किया था उससे वादा कभी छोड़ के न जाउंगी

खुशियों के हरेक रंग से उसको सजाउंगी

उसने भी ली थी सौगंध उस दिन

हर पळ साथ निभाऊंगा

खुशियाँ हो या ग़म

तेरे साथ ही बिताऊंगा

हम दोनों थे हमराज,दिन रैन के थे साथी

मेरा वो प्यारा कमरा,जैसे दिया और मै बाती…….

बरसों बिताये संग संग,हमराज वो मेरा था

मल्लिका थी उसकी मै,वो मेरी सल्तनत था.

दिल की हरेक बात,हरेक आह,हरेक चाह

सबसे छुपा कर,चुपके से उसको ही तो बताया

और उसने भी सब कुछ अपने में ही छुपाया

फ़िर तोड़ सारे वादे मै उसको छोड़ आई

एक नए से घर में दुनिया नयी बसाई

वो फ़िर भी रहा मेरा,मै उसकी न रह पाई………

आज बरसों बाद फ़िर याद वो आरहा है

मेरा प्यारा सा कमरा मुझ को बुला रहा है

दिन आखरी वो अपने घर में बिता रहा है

मेरे बचपन के पलों को थपकी दे सुला रहा है

कल टूट जायेगा वो,नामोनिशां भी न रहेगा

पर करती हूँ सच्चा वादा,दिल के कोने में सदा जियेगा…

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