बुधवार, 2 मार्च 2011

मेरी बिटिया....

सूने से आँगन में बैठी
जाने क्या देख रही थी मै
ठहरे पानी की झील में ज्यूँ 
कंकड़  फ़ेंक  रही थी मै

छम से आई एक परी
चमका एक सितारा धीरे से 
मीठी सी बोली में उसने
माँ मुझे पुकारा धीरे से 

उसकी मुस्कानों के मोती
जब बिखरे मेरे जीवन में
चटकी कलियाँ खुशियों की
मेरे मन के उपवन में

अज़ब गज़ब सी एक सिहरन
ठंडक सी पहुची सीने में
हलचल,हड़कंप मचा घर में
रफ़्तार सी आई जीने में

जादू था उसकी पलकों में
मै मन्त्र मुग्ध हो बैठ गयी
वो स्वांस समीर समाहित हो 
ह्रदय में गहरे पैठ गयी

दिन भर उसको तक कर भी
ह्रदय नहीं भरता मेरा
उसकी छवि देख अचंभित
इस जग का चतुर चितेरा

मधुर गीत सी किलकारी
झरनों सी कलकल करती
उसकी सरल मधुर हंसी
जीवन में नव रंग भरती

वो ठुमक ठुमक जब चलती 
रुनझुन सी बजती आंगन में 
उसकी काली काली आँखे
ज्यूँ भंवरे डोले मधुबन में

अब दिन भर उसको तकती हूँ
बस उसकी सुनती रहती हूँ
उसमे खुद को फिर पाया है
अब सपने बुनती रहती हूँ


.

3 टिप्‍पणियां:

  1. जबरदस्त अभिव्यक्ति ,कोमल भावनाओं से लबरेज उत्कृष्ट रचना

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  2. जादू था उसकी पलकों में
    मै मन्त्र मुग्ध हो बैठ गयी
    वो स्वांस समीर समाहित हो
    ह्रदय में गहरे पैठ गयी

    ni:shabd kar diya aapne to..

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  3. मन की भावनाओं को ही कलम रूपी चम्मच से कागज रूपी थाली पर बिखेर देने को ही कविता कहते है.........बहुत आच्छा प्रयाश है, मने भी बचपन पर कुछ शव्द बिखेरे हैं सोचा की कविता बन जाये .............
    कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
    मुझको कुछ भी याद नहीं
    क्या मांगू अब किसे पुकारूँ,
    सुनता कोई फरियाद नहीं
    नादानी थी ऊपर मेरे,
    चाँद की मै हठ कर बैठा
    रूठ गया है बचपन मुझसे,
    तब से खोया सा मै रहता
    रिमझिम बादल बरस पड़ते थे,
    नौका कागज की मैं खेता
    तितली जुगनू खेल खिलाते,
    थक हार कर तब मैं सोता
    कब छोड़ चला वो बचपन मुझको,
    मुझको कुछ भी याद नहीं
    क्या मांगू अब किसे पुकारूँ,
    सुनता कोई फरियाद नहीं
    ..............
    राजेंद्र सिंह कुंवर 'फरियादी'
    ग्राम - सिरसेड ( कड़ाकोट ),
    पोस्ट - कफना, (कीर्ति नगर )
    जिला - टेहरी गढ़वाल
    उतरांचल -249161

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