बुधवार, 4 अगस्त 2010

ओ मेरे प्रिय !

प्रिय तुम हो आधार मेरा
बांसुरी सी खोखली हूँ..
फूंख तेरी प्राण मेरा...
निष्प्राण तुम बिन मै पड़ी हूँ
तुम अचल हो गिरी उतंग
अत्यंत ऊँचे तुम खड़े हो..
मै धरा की धूल हूँ प्रिय
चरणों में पड़ी लोटती हूँ...
अग्नि का है तेज तुम में
सूर्य सम प्रिय तुम प्रखर हो
हिमाद्री की शीतल लहर मै
शीत निंद्रा में घुली हूँ..
जलधि सम गाम्भीर्य तुम में
ओज की प्रतिमूर्ति तुम हो
मै चपल चंचल सरित सी
सतत इत- उत डोलती हूँ
तुम पवन का प्रवाह हो प्रिय
संजीवनी हो तुम ह्रदय की
मै निरंतर तुम में समाहित
अस्तित्व अपना खोजती हूँ..
प्रिय तुम हो आधार मेरा
बांसुरी सी खोखली हूँ..
फूंख तेरी प्राण मेरा...
निष्प्राण तुम बिन मै पड़ी हूँ....

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय तुम हो आधार मेरा
    बांसुरी सी खोखली हूँ..
    फूंख तेरी प्राण मेरा...
    निष्प्राण तुम बिन मै पड़ी हूँ....
    bahut komal rachna, badhai Asha ji.

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  2. प्रिय तुम हो आधार मेरा

    neh se bhari ek khoodsurat rachna jismein bas pyar hi pyar hai, bahut achhi lagi.

    shubhkamnayen

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