मंगलवार, 17 अगस्त 2010

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता ....

कल की खबर थी की सुप्रीम कोर्ट  में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया की उनको उत्तर प्रदेश में हो रहे स्मारकों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं है| खबर सुन कर थोड़ी देर सोचों में पड़ गयी,और फिर समझ आया की भाई उन्हें आपत्ति हो भी तो क्यूँ कर हो|

केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता की मायावती जी नॉएडा को या लखनऊ के  हरे भरे बागों को पत्थर के हाथियों से पाट दें, अथवा अपनी और अन्य   महापुरुषों की मूर्तियों से सजा कर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दे| जी हाँ उन्हें फर्क भी पड़े तो क्यूँ पड़े,वे तो आकर रहने वाले है नहीं वहां|  उनके लिए तो नयी दिल्ली के विशिष्ट स्थान घने पेड़ों की छाँव में आरक्षित है| उन्हें फर्क पड़ता है तो बस इस बात से कि,कहीं मायावती जी रूठ गयी तो अगले चुनावो में  मुश्किलें बढ़ जाएँगी...

फर्क पड़ता है तो हम जैसे आम लोगों को पड़ता है| जिनकी मेहनत कि कमाई टैक्स के रूप में लेकर ये पत्थर के मसीहा  खड़े किये जा रहे है| फर्क पड़ता है तो हमे पड़ता है जिनके बच्चों के घूमने और खेलने कि जगह छिन  कर ये पथरीले लोग बैठा दिए गए है|

अब भी कल कि सी बात लगती है,जब दुल्हन बन  नॉएडा आई थी......यहाँ कि हरियाली, खुला सा माहौल, बड़े बड़े उद्यान,पक्षी विहार और प्रदुषण से मुक्त हवा....यूँ लगा जैसे सपना जी रही हूँ| हाँ ये ठीक है कि सुविधाए थोड़ी कम थी लेकिन, वो इतना नहीं खलती थी| सुबह कि स्वच्छ हवा,साँझ  की ताज़ी पवन , किल्लोल करते रंग बिरंगे पंछी....मोर उड़ कर घर की मुंडेरों पर बैठ जाते थे|

जब बच्चे हुए तो उन्हें लेके अक्सर हम नंदन कानन, चले जाते थे वहां बने शेर ,चीतों के आकार देख कर बच्चे खूब खुश होते थे| इतने सुंदर और बड़े उद्यान में घूमते, खेलते वक़्त कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था|सुंदर फूलों की छठा अदभुद  अहसास जगाती थी|कभी कभी हम कालिंदी कुञ्ज भी जाया करते थे|कल कल करती यमुना और खुबसूरत नज़ारे|अब सब यादों में ही रह गया लगता है|
अब तो जैसे ही सेक्टर -१५ के करीब आईये ,शक सा होने लगता है की आप नॉएडा में है या जयपुर की सैर पर निकले है| लाल पत्थरों  की चारदीवारी में घिरा नंदन कानन अपने खंडित रूप पर लज्जित सा चुपचाप सर झुकाए दिख जाता है| बड़ी बड़ी मूर्तियाँ आवरण ओढ़े  खड़ी दिखती है| हालाँकि शिल्प कला का अदभुद दर्शन है ये स्मारक |

पत्थर के अनगिनित खम्भों पर अशोक की लाट के शेरों  की तरह हाथी दिखते है| बच्चो ने पूछा तो कह दिया बेटा ये बहन जी की लाट है| अब और कहूँ भी तो क्या कहूँ? 
इस जगह से निकलते हुए नाक पर रुमाल रख लेती हूँ ......अरे नहीं बदबू नहीं है...ये तो वो धूल है जो पत्थरो की कटाई और इमारती सामान से उठ रही है| आस पास के पेड़ भी अपनी आन सी खो रहे है| और इसके ठीक पीछे जो पक्षी विहार है,वह भी इसके दुश्प्रवाभव्  से अछूता नहीं है| हर सर्दी में हजारों विदेशी पंछी मीलों की यात्रा पूरी  करके यहाँ आया करते थे,और उस समय यहाँ की छठा ही निराली होती थी| तरह तरह के पक्षियों का कलरव मन मोह लेता था|देशी विदेशी पंछियों की चहचाहट से पक्षी विहार गूंजता रहता था| घंटो बीत जाते थे पर मन नहीं भरता था| अक्सर हमलोग वहां घूमने जाया करते थे|
लेकिन इस सब धूल-धक्कड़ ,प्रदूषण के चलते वर्ष दर वर्ष उनकी संख्या भी घटी ही जा रही है| कितनी मधुर यादे है,अब भी कभी जाते है तो वहां का सूनापन  अजीब सी उदासी भर जाती है मन में|पर्यावरण विद लाख शोर मचाये,इस नक्कार खाने में उनकी आवाज किसको सुनाई दे रही है|  
  
अब इस दर्द को कोई और कैसे समझ सकता है.....ये तो हमारा दर्द है जिसे हम चुपचाप सह रहे है| केंद्र हो या राज्य सरकार, कोई भी कैसे इन भावनाओ को समझ पायेगे...क्यूंकि ये भाव तो किसी अपने की टूटन को बेबस हो के देखते रहने की मज़बूरी वाले है, और सरकारे कभी मजबूर नहीं हुआ करती.....   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें