मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सावन तुम्हारी नक़ल करता है..

घनघोर घटा,सुरमई उजाला
धीमा सा माहोल,हलकी सी खुमारी
मौसम की रग़ रग़ में नशा है..
वैसे ही जैसे तुम अपनी मीठी मुस्कान
खामोश प्यार,और बेताब निगाहों से
भर देते हो मेरी रग़ रग़ में नशा
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर की
सावन तुम्हारी नक़ल करता है..
हलकी फुहारे जब भिगोती है तन
तपन हर लेती है तन और मन की
तेरी हर अदा मिलाती है सावन से
तू भी तो भिगोता है मुझे धीमे धीमे
अपने प्यार की बरखा में हर बार
और मै खोयी रहती हूँ बेहोश.....
सच कहो ना,ऐसा क्यूँ लगता है
जैसे तुम बादल बन के छाये हो मुझ पर
और मै प्यासी धरा तुम को पी रही हूँ
तुम में ही खो कर खुद को जी रही हूँ
जब से मिले हो रिमझिम फुहार
बन तेरा प्यार हर पल मुझे भिगोता है...
पल भर को भी हो दूर तू गर
सिसक सिसक मेरा दिल रोता है..
तेरी ठंडी हथेलियों की छुवन महसूस करती हूँ
जाऊ कहीं भी तेरी छाँव में ही चलती हूँ
जैसे सावन इस धरा का रूप खिलाता है
तू भी तो मुझको प्यार से यूँही सजाता है
अब कह दो एक बार दिल पे रख के हाथ
तुमने सावन से सीखा है ये हुनर कि
सावन तुम्हारी नक़ल करता है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुमने सावन से सीखा है ये हुनर कि
    सावन तुम्हारी नक़ल करता है.
    अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति -----इशारों - इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तुमने सिखा कहाँ से की याद ताज़ा कराता यह गीत बहुत आकर्षक लगा

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